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Ram Chandar Azad

Others

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Ram Chandar Azad

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एक विचार : जीवन सार

एक विचार : जीवन सार

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स्वाभिमान अभिमान द्वै मनहिं बसेरो लेत।

इक गिरने नहीं देत है इक उठने नहीं देत।।


अपनी इच्छा से नहीं मरघट कोई जात।

मुर्दे को भी बाँधकर देखो जग लै जात।।


कबिरा पीएचडी नहीं मीरा एम. फिल नाहिं।

पर अज़ाद जो कहि गए भूल सकत जग नाहिं।।


कहि आजाद जब दुखित मन, माँगहु हंसी उधार।

इससे पुनि खिल जाएगा, खुशियों का संसार।।


कहि आजाद न अस गिरौ, नज़र न सकौ मिलाय।

गिरना है तो असि गिरहु, सब तोहिं लेहिं उठाय।।


चिंता की सँकरी गली, जो कोई घुसि जाय।

कहि आजाद बिरला कोई, वापस फिर आ पाय।।


अपनी सुनि तारीफ़ मैं, फूला नहीं समाय।    

सुनि आजाद जब और की, मुझसे रहा न जाय।।


मुझसे लई आपन कहत, मौको रह्या दिखाय।

कहि आजाद असि लोग से बचि के रहियो भाय।।


पर सोना पीतल कहै, निज पीतल को स्वर्ण।

पड्यौ जौहरी सामने, धूमिल हो गयौ वर्ण।।


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