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पंचम कुमार "स्नेही" ✍️

Others

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पंचम कुमार "स्नेही" ✍️

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अनंत क्षितिज

अनंत क्षितिज

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हाँ, वो दृश्यमान है,

शायद एक वहम है!

कोसों दूर है,

शायद एक फ़साना है।

हाँ, वो अम्बर में छिपे बादल,

हमसे मिलो दूर,

जमीं पे लहरा रही है,

जहाँ अनंत क्षितिज है।

हाँ, वो दृश्यमान है,

परंतु एक कल्पना दृश्य है!

रात के अँधेरों में चमकते सितारे,

हमसे मिलो दूर,

जमीं पे ठिठोलियाँ कर रही है,

जहाँ अनंत क्षितिज है।

हाँ, वो दृश्यमान है,

जो एक काव्य कि कल्पना है,

सत्य तो नहीं,

किंतु मन का वहम भी नहीं,

प्रातः बेला में,

सूर्य की स्वर्ण रूपी किरणें,

जो समुद्र कि लहरों को,

लालिमा दे रही है,

जहाँ अनंत क्षितिज है।


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