आजादी के परवाने
आजादी के परवाने
आजादी के उन परवानों ने लम्बी लड़ी लड़ाई थी,
लाखों ने लगा प्राण की बाजी आजादी ये पाई थी ।
आये थे करने व्यापार छल-बल से गद्दी हथियाई थी,
आपस में डाल फूट, राज करो , सिद्धी अपनाई थी ।
लाल-बाल-पाल ने इसको स्वरक्त, तब सींचा था,
तुम मुझे दो खून मैं तुम्हें आजादी नारा ये चीखा था।
हिमालय जिसका मुकुट मणि उस देश से मेरा नाता ।
सागर जिसके चरण पखार, मधुमयगीत धरा में गुंजाता ,
गंगा यमुना सी पावन नदियां और कहां मतवाली ?
गिरि-कंदरा-खोह यहां सजग प्रहरी सम करें रखवाली ।
षडॠतुओं का पावन महोत्सव घर-घर ईद दीवाली ,
हिन्दू-मुस्लिम ,सिख-ईसाई फुलवारी के ये माली ।
जय जवान ,जय किसान के शौर्य-स्वेद की ये लाली,
देश हेतु कर प्राणोत्सर्ग, रचती धरा अखंड अंशुमाली।(सूर्य)
त्रिसेना का जज्बा हाड़तोड़ ठंडी या आग की लपटें,
लेह-लद्दाख हो या थार का रेगिस्तान, सब मिल निपटें ।
नभ-जल-थल में भारत वीरों की ,फैल रही दुहाई
स्वगाथा खुद न गा,कर्मों से विजय ध्वजा फहराई
