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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Others Children

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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

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आजादी के परवाने

आजादी के परवाने

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आजादी के उन परवानों ने लम्बी लड़ी लड़ाई थी,

लाखों ने लगा प्राण की बाजी आजादी ये पाई थी ।


आये थे करने व्यापार छल-बल से गद्दी हथियाई थी,

आपस में डाल फूट, राज करो , सिद्धी अपनाई थी ।


लाल-बाल-पाल ने इसको स्वरक्त, तब सींचा था,

तुम मुझे दो खून मैं तुम्हें आजादी नारा ये चीखा था।


हिमालय जिसका मुकुट मणि उस देश से मेरा नाता ।

सागर जिसके चरण पखार, मधुमयगीत धरा में गुंजाता ,


गंगा यमुना सी पावन नदियां और कहां मतवाली ?

गिरि-कंदरा-खोह यहां सजग प्रहरी सम करें रखवाली ।


षडॠतुओं का पावन महोत्सव घर-घर ईद दीवाली ,

हिन्दू-मुस्लिम ,सिख-ईसाई फुलवारी के ये माली ।


जय जवान ,जय किसान के शौर्य-स्वेद की ये लाली,

देश हेतु कर प्राणोत्सर्ग, रचती धरा अखंड अंशुमाली।(सूर्य)


त्रिसेना का जज्बा हाड़तोड़ ठंडी या आग की लपटें,

लेह-लद्दाख हो या थार का रेगिस्तान, सब मिल निपटें ।


नभ-जल-थल में भारत वीरों की ,फैल रही दुहाई 

स्वगाथा खुद न गा,कर्मों से विजय ध्वजा फहराई



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