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ठेला
ठेला
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© Ila Jaiswal

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अपनी गली में उन बाबाजी को मैंने बचपन से लेकर युवा होने तक ठेला लगाते ही देखा। अलग - अलग मौसम में अलग तरह का ठेला। गर्मियां हुई तो कुल्फी का, उसके साथ ही बर्फ का गोला भी उनके पास होता था। लाल, हरे, पीले, गुलाबी रंग का मीठा शर्बत कांच की बोतलों में भरा हुआ।


वह बड़ी सुर - ताल में गाते हुए आते थे ,"बढ़िया से बढ़िया खिलाऊंगा, तबियत खुश कर जाऊंगा।" आवाज़ सुनते ही एक या दो रुपए लेकर गली के हम सारे बच्चे भागते थे। सब चिल्लाते, सबकी अलग अलग पसंद।


किसी को लाल गोला चाहिए तो किसी को पीला, किसी को लाल - पीला मिला हुआ तो किसी को तिरंगा, उसमें भी अलग - अलग स्वाद मीठा, खट्टा, खट्टा - मीठा आदि।


उसी भीड़ में से कोई कुल्फी भी मांग लेता, वह फटाफट कुल्फी निकाल कर देते और साथ ही दुबारा भर के जमने के लिए भी रख देते। बड़े प्यार से सबको खिलाते और पैसे अपने कुर्ते की जेब में पन्नी में बांध कर बहुत संभाल कर रखते। एक - एक पैसा गिन कर देना और गिन कर वापिस रखना।


मैं यह सब अपनी खिड़की से देखती रहती। सर्दियां आतीं तो उनके ठेले का रंग भी गरमा जाता। गरमागरम मूंगफलियां, फुलियां, रेवड़ी, गजक...। उनके ग्राहक बड़े कम और बच्चे ज़्यादा थे। 'सर्दियों का बादाम, मूंगफली’ कहकर वह सबको अपनी ओर आकर्षित करते।


काग़ज़ के या अखबार के चौरस कटे टुकड़े बहुत करीने से एक डब्बे से दबाकर रखे होते थे। एक - एक टुकड़ा निकाल कर सामान बांध कर देते थे। बारिश में मट्ठी, बिस्किट, नमकीन, खट्टा - मीठा चूरन होता था। जो हम सब को सबसे ज़्यादा पसंद था। कभी स्कूल के आगे तो कभी गली में मिल ही जाते थे।


सब बच्चे पूछते ,"बाबाजी, आप ये चूरन, गोली पूरा साल क्यों नहीं रखते? हमेशा अलग - अलग सामान क्यों रखते हो?"


“बेटा, भगवान ने हर मौसम अलग बनाया है, वैसे ही हर मौसम में खान- पान भी अलग होता है। अगर सब कुछ हमेशा मिलेगा तो मज़ा नहीं आएगा।" कितना सही कहते थे वह बाबा जी, सचमुच हर मौसम की अपनी खास बात है। सब कुछ हमेशा रहेगा तो कोई अंतर ही नहीं पता चलेगा ।


इन सब के बीच में बस एक बात हमेशा एक जैसी रहती, वह थी उनकी पैसे वाली थैली। मैं सोचती, 'यह बाबा जी अपने पैसे थैली में क्यों रखते हैं, अपने लिए एक पर्स क्यों नहीं लेते? हर बार अपने पैसे गिनते क्यों रहते हैं? उनके बच्चों के कितने मजे होते होंगे, उनको तो हर चीज बिना पैसों के ही मिल जाती होगी?' यह प्रश्नों की श्रृंखला चलती ही रहती..।


मैंने भी युवावस्था में कदम रखा। विवाह हो गया। गृहस्थी की ज़िम्मेदारी सिर पर आ गई, जब हिसाब लगाने बैठी तो पता नहीं कैसे उन बाबाजी का ख्याल आ गया ? कैसे वह अपने पैसे उस पन्नी में संभाल कर रखते थे? हर बार गिनते रहते थे। अब मैं उनकी वास्तविकता को समझ पा रही थी, उनके उस पुराने कुर्ते की जेब फटी हुई थी, पैसे गिर न जाएं इसलिए पन्नी में बांध कर रखते थे। असल में वह पैसे नहीं अपने घर को, घरवालों की इच्छाओं को, जरूरतों को बांध कर रखते थे, सहेज कर रखते थे कहीं उनकी फटी जेब के किसी कोने से, बच्चों की भूख अधूरी न रह जाए, कहीं वो भूखे न रह जाएं।


जिन चीज़ो को देखकर मैं हमेशा सोचती थीं कि उनके बच्चों को सारी चीजें मुफ्त में और हमेशा ही मिल जाती होंगी। असल में, उन बच्चों ने वो चीजें कभी चखना तो दूर देखी भी न होंगी। वो चीजें उनका घर चलाने का साधन जो थी, वह ठेला नहीं था, उस ठेले के हर मर्तबान में, हर शीशी में, हर थैली में, उनके घर का राशन, ईंधन, भूख - प्यास और कुछ अधूरी इच्छाएं बन्द थीं और उनकी फटी जेब इन सब का भार संभाल रही थी।

भगवान कुल्फी गोला थैली ठेला बिस्किट मट्ठी चूरन मूंगफली मर्तबान

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