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गम दूर भाग जाता
गम दूर भाग जाता
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© Hasmukh Amathalal

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गिरना, फिर उठना और काम करना

यही तो है, इसे कहते हैं आगे बढ़ना

जीना दुश्वार हो तो भी हंसी को कायम करना

सब के साथ हिलमिलकर रहना।

 

यदि बढ़ने की चाह नहीं है

तो रौनक भी जीने में नहीं है

हर चीज़ बेकार लगती है और

मायूसी का आभास कराती है

सर शर्म से झुका रहता है और

अपमानित होने का बहस कराती है।

 

कोई मदद को नहीं आता है तो मायूसी छा जाती है

जीवन के प्रति रूखापन और चेहरे पर मुर्दनी छा जाती है

"कोई हो तो अपना" ये चीज़ का आना पहली ज़रुरत हो जाती है

आदमी सोचता है "आखिर यही तो रिश्ते की पहचान होती है"

 

गिरने पर यदि कोई  मदद करता है तो आत्मविश्वास बढ़ता है

ग्लानि का पलायन होना ही मित्रता बढ़ाता है

सब के साथ रहने का मनसूबा पक्का हो जाता है

यदि समय पर कोई साथ नहीं देता है तो आदमी हक्का- बक्का रह जाता है।

 

यदि आपने बबुल बोये है तो गुलाब की आशा मत रखे

सूरज की रौशनी में मनसा का पूरा होना मत सोचे

अपने ही करम अपनों से धोखा दे देते हैं

लोग भी कन्नी काटकर विदा ले लेते हैं।

 

ऐसे में अपनी सोच को कायम करना है

सब से दोस्ती और अपने को साबित करना है

बाँटने से गम दूर भाग जाता है

पानी छिड़कने से आग बुझ जाती है।

गम दूर भाग

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