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Rajendra Prasad Patel

Others

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Rajendra Prasad Patel

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जीवन के दो फूल

जीवन के दो फूल

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जीवन के पथ में, खिले होते फूल दो।

ममता अरु प्यार, रूपी हैं मूल दो।।

दोनों के संयोग से, चपला चल पड़े।

मनोहरी मोती सी, मखमली है जड़े।।


होते हैं वो खिलौने, घर परिवार के।

दें चहल-पहल, मधुर संस्कार के।।

सत्य के प्रतिरूप, होते बूँद पावन।

हरित करें आंचल, जैसे करें सावन।।


दे रहे होते सदा, वो मधुर मुस्कान।

एकाकीपन में हैं, देते जीवन गान।।

थम गये को चला, जिंदगी का नाव जो।

बिखरे को समेटे, प्रेम रूपी भाव जो।।


उम्र के साथ चले, सांसारिक चक्र में।

मोह के जाल फँस, डूब जाता फक्र में।।

माया के जंजाल में, लिपटता है चला।

ममता को भूल वो, स्वार्थ में वह फला।।


जिसमें न बीज है, नहीं स्वाद एक भी।

जहाँ न श्रृंगार है, नहीं बीर नेक भी।।

अलंकार से परे, बेतुकी छंद बद्ध।

कविता रचते चले, कटु से हो संबद्ध ।।


याद कर फूल को, मूल को सींच प्यारे।

जिनके सुगंध से, फल गया किनारे।।

सूख रहे देख रे, झड़ रहे पंखुड़ी।

भूत वर्तमान से, वो भविष्य से जुड़े।।


कर सी फल मिले, खिले या झिले धरा।

भूत को याद कर, हो सके हम खरा ।।

छोड़ दें जिहाद को, जन्नत यहीं मिले ।

सत्य के सुराह में, राह रंगीन खिले ।।




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