Kamini sajal Soni

Others


4.0  

Kamini sajal Soni

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शीर्षक-दुनिया बराबरी वाली

शीर्षक-दुनिया बराबरी वाली

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कितने दिन हो गए थे श्रेया को अपना लिखा हुआ आर्टिकल तक पोस्ट नहीं कर पा रही थी क्योंकि घर में सभी कामों के लिए श्रेया ही सबकी केंद्र बिंदु थी। सासू मां सुबह से नहा धोकर पूजा पाठ करके या तो पेपर पढ़ने बैठ जाती या फिर टेलीफोन लेकर अपने मायके वालो से बात करने बैठ जाती ।


बहू के आ जाने पर घर के कामों से तो जैसे उनका भी रिटायरमेंट हो गया था जबकि उनके स्वास्थ्य में कोई कमी नहीं थी उम्र का असर उनसे कोसों दूर था देखने में श्रेया की बिल्कुल बड़ी बहन के जैसी लगती पर मजाल है की घर की एक किसी काम को भी हाथ लगा दे।

छोटी ननद का भी यही हाल था जब देखो तब स्मार्ट फोन पर चिपकी रहती या फिर टीवी पर कोई ना कोई सीरियल या मूवी देखती रहती ।


सब अपनी अपनी दुनिया में मशरूफ थे श्रेया के प्रति किसी को भी जरा सी सहानुभूति नहीं थी । फिर भी श्रेया घर के कामों को अपना फर्ज समझकर बखूबी हंसी खुशी करती रहती। लेकिन उसे तब दुख लगता जब उसे अपने लिए कोई भी कार्य करने की आजादी नहीं मिलती।


जब से होश संभाला था श्रेया को लिखने पढ़ने का बहुत शौक था हमेशा जो बात दिल को छू जाती वह अपनी डायरी में जरूर लिखती और आजकल तो इतने अच्छे साधन हो गए थे अपनी बात एक-दूसरे तक पहुंचाना या लेखन को अपना कैरियर प्रदान करना घर बैठे ही श्रेया अपने लेखन कार्य को एक मजबूत स्तंभ प्रदान कर रही थी पर इस पर भी सभी की आपत्ति रहती। जरा सा उसने मोबाइल उठाया नहीं कि घर में कोहराम मच गया।


" तिनका तिनका समेट लाई थी

जिंदगी तेरे घर आंगन की छांव में

क्यों मेरे सपनों को मुकम्मल जहां

नहीं मिला तेरे गांव में।"


अक्सर इस बात को लेकर कभी-कभी श्रेया दुखी हो जाती।


एक ...दिन तो हद ही हो गई जब श्रेया अपना आर्टिकल लिखने बैठी ही थी की सासु मां की बड़बड़ाने की आहट उसके कानों में गूंज उठी बहुत ही जोर से चिल्ला कर बोला जा रहा था कि महारानी को तो घर के काम धाम से कोई लेना-देना नहीं जब देखो तब मोबाइल लेकर बैठी रहती हैं।

श्रेया को तो जैसे मानो काटो तो खून नहीं आज उसके मन में विद्रोह की तरंगे प्रवाहित होने लगी और उसका मन भी चीख उठा ना चाहते हुए भी उसने सासू मां से कहा की........


"हर वक्त मैं ही तो घर का सारा काम करती हूं ना तो आप और ना ही छोटी दीदी कोई काम में हाथ बंटाते , सारा दिन काम करने के बाद मुझे यह सुनना मिले यह मैं बर्दाश्त नहीं कर सकती ..... आखिर घर के काम सबके हैं और सबको बराबरी से सहयोग प्रदान करना चाहिए।"


श्रेया का इतना कहना हुआ कि घर में तो मानो जैसे तूफान आ गया हो सभी बहिष्कार पर उतर आए पर श्रेया ने भी कमर कस ली थी वह भी तंग आ गई थी रोज-रोज के तानों से आखिर वह कोई गलत काम तो नहीं कर रही थी सिर्फ अपने कार्य को अंजाम दे रही थी आखिर इस आभासी दुनिया में उसके लिखे आर्टिकल द्वारा उसका एक खुद का नाम और एक पहचान जो बन गई थी जिसको वह अनावश्यक बिना किसी गलती के तो नहीं छोड़ सकती थी और आखिर उसने कुछ गलत भी तो नहीं किया था।


दोस्तों जब एक लड़की अपना घर परिवार अपने माता पिता छोड़कर दूसरे परिवार में आती है तो उसके भी कुछ सपने होते हैं और अपनेपन की आस उसकी आंखों में सदैव रहती है। वह भी परिवार के सदस्यों से उसी अपनेपन की उम्मीद रखती है जिसको वह मायके में छोड़ कर आई और उसके लिए वह हर पल हर क्षण प्रयास करती है । और जब उसकी उसी प्रयास को नकार कर उसकी अवहेलना की जाती है तब उसका अंतर्मन टूट जाता है तथा कहीं ना कहीं विद्रोह एवं बगावत की चिंगारी फूटने लगती है


"हम किसी को गैर ना समझे

सबको दिल से स्वीकार करें

सबके हिस्से की ख़ुशियाँ

खुले दिल से प्रदान करें

तब बन सकती है यारों

दुनिया बराबरी वाली ........।"



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