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Himanshu Sharma

Others


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Himanshu Sharma

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रीढ़-विहीन भारत

रीढ़-विहीन भारत

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मैं इक दिन रास्ते से कहीं चला जा रहा था कि देखा इक आदमी पड़ा हुआ है वहाँ जो किसी वाहन से टकरा गया था! इक सभ्य नागरिक होने के कारण एक बार तो मैं पुलिस के डर से उसे वहीँ अधमरा छोड़ आगे बढ़ गया! परन्तु कहीं मन में इंसान और इंसानियत का अस्तित्व बाकी था कि मैं पलट-कर वापिस उसके पास आया और पूछने लगा,मैं: "भाई! कैसे हुआ ये एक्सीडेंट? हुआ क्या तुम्हें? ठीक तो हो न!" घायल (कहराते हुए): "आहहह! भाई, अमरीका सेटल हुआ, मेरा ग्रेजुएशन का दोस्त मुझे अचानक सड़क के उस पार दिख पड़ा, सड़क खाली देख मैं उस पार जा ही रहा था कि अचानक कहीं से इक ट्रक दनदनाता हुआ आया और मुझे टक्कर मार, भाग गया!"

मैं: "और वो तुम्हारा अमरीका रिटर्न दोस्त?"

घायल: "आहहह! मुझे बर्बाद हुआ देख, वो फ़ितरतन, मुझे मेरे हाल पे छोड़ गया"

मैं: "ओह्ह! वैसे तुम्हारा नाम क्या है?"

घायल: "मेरा नाम भारत है!"

मैं (घायल भारत की तरफ़ देखते हुए): "तुम्हें कहाँ चोट लगी है?"

भारत: "मेरी रीढ़ टूट चुकी है और किसी सभ्य नागरिक, जिसमें इंसान बाकी था, ने एम्ब्युलेंस को कॉल किया था क़रीबन घंटे भर पहले, अब तलक तो वो आई नहीं है, इंतज़ार कर रहा हूँ! आहहह!"

मैं: "एम्ब्युलेंस अभी आती ही होगी, आप इंतज़ार करें, मैं आपके लिए रीढ़ का इंतज़ाम करता हूँ!भारत ने कहराते हुए हामी में सिर हिलाया!"


मैं रीढ़ का इंतज़ाम की उधेड़बुन में था कि अचानक मुझे याद आया कि हमारे विधायक जी ने एक भाषण में कहा था कि भारत पे जब भी आक्रमण होगा या कोई उस पे प्रतिघात करेगा तो वो महात्मा दधीचि की तरह अपना देह, हाड, माँस सर्वस्व भारत को अर्पित कर देंगे!मैं उनके सरकारी आवास पे पहुँचा और बाहर उनके सुरक्षाकर्मियों ने मुझे रोका! हमारी बहस को सुन, बाहर बगीचे में बैठे विधायक साहब ने मुझे सुरक्षाकर्मी से बहस करते देखा तो उन्होनें सुरक्षा कर्मी को आवाज़ देकर मुझे भीतर भेजने का निर्देश दिया! मैंने विधायक जी नमस्कार किया और उन्होनें नमस्कार का प्रत्युत्तर नमस्कार से देते हुए, मुझे बैठने का निर्देश दिया और फिर वार्तालाप प्रारम्भ हुआ:


मैं: "नेता जी, सर्वप्रथम आशा करता हूँ इस महामारी के दौर में आप और आपका परिवार स्वस्थ होंगे और दूसरा कि मुझे आपकी रीढ़ चाहिए थी!"मेरी रीढ़-दान की बात पर नेता जी चौंकते हुए बोले,"क्या चाहिए आपको? रीढ़?"

मैं: "जी हाँ नेता जी! आपकी रीढ़ चाहिए!"

नेता जी: "क्यों भाई क्यों चाहिए आपको मेरी रीढ़?"

मैं: "आप ही ने तो कहा था कि जब भी भारत पे प्रतिघात होगा आप अपनी देह, हाड़ का दान कर देंगे!"

नेता जी:" अच्छा भारत पे प्रतिघात हुआ है क्या! एक काम कीजिये आप, कल मेरी रैली में आ जाइये, आपके लिए एक स्यूटेबल केंडिडेट का हम ऐलान उस रैली में करेंगे, नहीं तो फिर आप थ्रू प्रॉपर चैनल आईये!"

नेता जी ऐसा कह कर दिवास्वप्न में खो गए जो कि शायद इस महादान से प्राप्त वोटों से निर्णायक विजय से सम्बंधित था, ऐसा उनके चेहरे के हाव-भाव से मैंने अंदाजा लगाया था! मुझे अंदाजा हो गया था कि नेता जी में इतनी रीढ़ नहीं है कि वो ऐसा महादान कर सके, मैं उन्हें उसी सम्मोहित आवस्था में छोड़ पतली गली से निकल लिया! मैं अभी भी परेशान था कि भारत अभी भी रीढ़-विहीन घायलावस्था में सड़क पे पड़ा हुआ है और उसके लिए रीढ़ का कोई इंतज़ाम नहीं हो पाया है! चिन्तितावस्था में मैं आगे बढ़ा जा रहा था कि मैंने देखा कि इक कारख़ाने से सैंकड़ों कर्मचारी निकल रहे हैं और सब के सब पीठ झुकाकर निकल रहे हैं! उनमें से एक को रोक मैंने उससे पूछ-ताछ प्रारम्भ की:


मैं: "ये आप सभी की पीठ झुकी हुई क्यों है!"

कर्मचारी: "जी! हम लोग नौकरी-पेशा लोग हैं और सैंकड़ों ज़िम्मेदारियों का बोझ है हमारे सिर पे"

... मैं (उसकी बात बीच में काटते हुए): "परन्तु बोझ तो सिर पे है फिर पीठ क्यों झुकी है?"

कर्मचारी: "साहब! हम लोग विरोध न कर पायें, लचीले रहे, इसीलिए हमारी रीढ़ हमारे मालिक ने हमसे छीन ली है!"


ये सुनकर मैं तुरंत उनके मालिक के दफ़्तर पहुँच गया और उनसे वार्तालाप आरम्भ की:


मैं: "साहब! सुना बताये सभी कर्मचारियों की रीढ़ आपके पास है?"

मालिक: "हाँ भाईसाहब!मैं: साहब इक रीढ़ की अत्यंत आवश्यकता है, आपके पास कितनी सारी है मेरा इक मित्र जो घायलावस्था में है, उसे रीढ़ की शीघ्रातिशीघ्र आवश्यकता है!"

मालिक:" साहब आजकल जैसा बाज़ार का रुख़ है कई बार इसने मेरी कमर तोड़ी है और इस प्रतिस्पर्धा के युग में सीढ़ी कमर रखना बहुत ज़रूरी है, इसलिए चाहकर भी मैं आपको नहीं दे सकता!"

मैं अपना सा मुँह लेकर आगे बढ़ चला और रास्ते में मिलते हर आदमी से उनकी रीढ़ की माँग करने लगा, फिर अचानक याद आया कि ये और मैं आम जनता हैं, हमारे ख़ुद के पास रीढ़ नहीं है तभी तो चंद गुंडे हमारे सिर चढ़कर राजनीति में पहुँच हम पर विधिक रूप से शासन करते हैं! निराशा से भरा हुआ मैं भारत के पास पहुँचा तो देखा कि रीढ़विहीन भारत मरणासन्न हो चला है और कहीं दूर से एम्ब्युलेंस के पीं-पीं की आवाज़ गुंजायमान थी!


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