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Deepak Kaushik

Others


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पहला जन्मदिन

पहला जन्मदिन

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श्रुति की आंख आज अपने तय समय से कुछ पहले ही तब खुल गई जब उसके नथुनों ने ताजे फूलों की खुशबू का अनुभव किया। उसने देखा उसके पलंग के सिरहाने की तरफ रखे स्टूल पर ताजे फूलों का एक गुलदस्ता रखा हुआ था। जो निश्चित रूप से उसी के बगीचे से तोड़े गए फूलों से बनाया गया होगा। अन्यथा इतनी सुबह बाजार से कैसे आ सकता था। गुलदस्ते पर निगाह जाते ही उसकी निगाह एक और चीज पर पड़ी। ये चीज थी- गुलदस्ते में अटका हुआ एक ग्रीटिंग। उसने ग्रीटिंग को निकाल लिया। खोलकर पढ़ा- "हैप्पी बर्थडे, श्रुति"। अरे! आज तो उसका जन्मदिन है। कार्ड में लिखा शब्द 'श्रुति' निश्चित रूप से उसकी आया, नहीं! नहीं!! आया नहीं, उसकी धाय मां, नहीं! नहीं!! धाय भी नहीं, सिर्फ मां, यदि वो न होती तो शायद श्रुति भी आज इस दुनिया में न होती, के हाथ का लिखा हुआ था। आज उसका जन्मदिन था। यह सोचकर उसकी आंख भर आई। नहीं! ये खुशी के आंसू नहीं थे। ये आंसू विषाद के थे। आज यदि उसका जन्मदिन था तो उसकी मां की पुण्यतिथि भी थी। उसने अपनी मां को सिवाय फोटो के कभी भी- कहीं भी नहीं देखा था। उसकी मां का निधन उसी दिन हो गया था जिस दिन उसका जन्म हुआ था। अपने जन्म के साथ ही श्रुति ने अपने जीवन की वो यात्रा शुरू कर दी जिसमें सिवाय दर्द, तिरस्कार और अपमान के और कुछ नहीं था। श्रुति के हाथ में कार्ड था और आंख में आंसू और मन में प्रतिकार की भावना। प्रतिकार अपने पिता से, अपने परिवार से, अपने समाज से और शायद खुद अपने आप से भी। 

"हैप्पी बर्थडे, बेबी।"

उसी समय पार्वती ने कमरे में प्रवेश करते हुए कहा। श्रुति ने पार्वती को देखा और पार्वती ने श्रुति को।

"अरे, ये क्या? तुम रो रही हो? वो भी आज के दिन।"

श्रुति ने कोई जवाब नहीं दिया। जैसे मूक वाणी में कह रही हो ' क्या तुम जानती नहीं कि आज ही मेरी मां का निधन हुआ था। जिसमें मेरा कोई दोष नहीं था। मगर जिसका दण्ड मैं भोग रही हूं और शायद पूरी जिंदगी भोगूंगी।' मगर पार्वती भी उसके मन के दर्द को समझती थी। समझे भी क्यों ना। आखिर पार्वती ने उसे अपना दूध पिलाकर, अपनी छाती से लगाकर पाला था। दरअसल पार्वती इस घर में अशोक बाबू के पिता के समय से ही इनके घर में काम करती थी। पार्वती का विवाह भी अशोक बाबू के पिता ने ही करवाया था। संयोग की बात थी कि पार्वती और श्रुति की मां लगभग एक साथ ही गर्भवती हुईं थीं। श्रुति के जन्म से एक सप्ताह पहले ही पार्वती ने एक बेटे को जन्म दिया था। जब श्रुति की मां श्रुति को जन्म देते समय शरीर के बंधन से मुक्त हो गई और श्रुति का पूरा परिवार श्रुति को मनहूस मानकर उस नवजात बच्ची का तिरस्कार कर रहा था तब पार्वती ने बिना किसी के कहे, बिना किसी से पूछे, भूख से बिलख रही श्रुति के मुंह में अपनी एक छाती दे दी। पार्वती के इस कर्म ने और किसी को खुश किया हो या दुखी, मगर श्रुति के दादा जी ने पार्वती की सराहना की और नवजात बच्ची को पार्वती की गोद में डाल दिया। उस दिन पार्वती एक साथ दो बच्चों की मां बन गई। गनीमत यह थी कि घर में अशोक बाबू के पिता की ही चलती थी। इसलिए न तो पार्वती को नौकरी से निकाला गया और न ही श्रुति का त्याग किया गया। अशोक बाबू अपनी पत्नी से बहुत प्यार करते थे। इसलिए जहां एक ओर वो अपनी बेटी से घृणा करते थे वहीं उन्होंने घरवालों के बहुत दबाव डालने पर भी पुनर्विवाह नहीं किया। हां! वे शराब में अवश्य डूब गए। उनका दिन तो फैक्ट्री के काम में निकल जाता और शाम होते ही वो बोतल खोलकर बैठ जाते। यही उनकी दिनचर्या हो गई थी। 

"ना बेटी! उदास नहीं होते। तुम उदास हो जाओगी तो ये महल जैसा पूरा घर उदास हो जाएगा।"

इस पूरे घर में केवल पार्वती ही थी जो श्रुति की हमदर्द थी। वैसे भी अब इस घर में बचा ही कौन था? कुछ ही तो प्राणी थे इस विशाल भवन में। एक वो स्वयं, दूसरी पार्वती, तीसरे अशोक बाबू। श्रुति के पिता। और कुछ नौकर। श्रुति के दादा-दादी कबके गुजर चुके थे। एक बुआ थीं, उनकी शादी हो गई और वो अपने घर चली गईं।

"देखो तो, तुम्हारे लिए एक उपहार और भी रखा हुआ है।" 

कहकर पार्वती ने उंगली से एक तरफ इशारा किया। वहां एक पैकेट पड़ा था। बहुत ही खूबसूरत पैकिंग में लिपटा हुआ था। लेकिन उस पर कुछ भी लिखा नहीं था। ना कोई विश और ना भेजने वाले का कोई नाम। श्रुति ने पैकेट खोल डाला। हरे रंग का एक बहुत सुंदर सलवार सूट था।

"कैसा है?"

"बहुत सुंदर।"

"जानती हो किसने भेजा है?"

"मैं कैसे जानूं? किसी का नाम तो लिखा नहीं है, इस पर।"

"तुम्हारे पापा ने भेजा है।"

पापा का नाम सुनते ही श्रुति ने वो पैकेट वापस रख दिया। सच कहूं तो फेंक दिया। न जाने ये पापा के प्रति गुस्से की प्रतिक्रया थी या पापा की नफरत की प्रतिक्रिया में उपजी प्रतिक्रिया। 

"पापा से इतना गुस्सा ठीक नहीं बेबी।"

"मैं इसे कूड़े में फेंक दूंगी"

"क्यो? इसने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?"

"क्योंकि ये उन्होंने दिया है। और वो मुझसे नफरत करते हैं।"

"गलत। यदि तुम्हारे पापा तुमसे नफरत कर रहे होते तो तुम्हें गिफ्ट ही क्यों भेजते। बल्कि उल्टे उन्हें तुम्हारा जन्मदिन भी याद नहीं रहता। जैसे ही एक बार ये कपड़े पहन कर उनके सामने चली जाओगी वो तुम्हें अपने सीने से लगा लेंगे। बहुत प्यार करते हैं वो तुमसे।"

"वो तो मुझे पता है।"

कहते हुए श्रुति बाथरूम की तरफ बढ़ गयी जो उसी के कमरे में बना था। आधे घंटे बाद श्रुति नहा-धोकर बाहर आयी। इतनी देर में पार्वती चाय-नाश्ता लेकर श्रुति के कमरे में वापस आ गई थी और श्रुति के आने का इंतजार कर रही थी। श्रुति के निर्देशानुसार उसके कमरे में पार्वती के अतिरिक्त और कोई भी नहीं आता था। इसलिए जब श्रुति नहाने के लिए गई थी उसी समय रसोईये ने उसे आवाज देकर चाय-नाश्ते की ट्राली पार्वती के सुपुर्द कर दी थी। 

"पार्वती मेरी गुलाबी वाली स्कर्ट निकालो। मैं आज वही पहनूंगी।"

" नहीं बेबी! आज तुम यही हरा सूट पहनोगी। तुम्हें मेरी कसम है।"

यह सुनते ही श्रुति ने सूट को उठाकर फेंक दिया। सूट दरवाजे के सामने जा गिरा। 

"मतलब अब तुम्हें मेरी कसम का भी कोई लिहाज नहीं।"

"लिहाज है, इसीलिए फेंका।... अपनी कसम दी है तो पहनना तो पड़ेगा ही। कम से कम अपने मन की गुबार तो निकाल लेने दो।" 

श्रुति ने भले ही ये बात गुस्से और नफरत से कही हो मगर इस बात ने पार्वती को हंसा दिया और श्रुति को अकेला छोड़कर कमरे से चली गई। कुछ देर बाद जब पार्वती कमरे में वापस आयी तब तक श्रुति चाय-नाश्ता करके पिता के दिये हरे सूट को पहन कर बैठी थी। 

"ये हुई ना अच्छे बच्चों वाली बात।"

पार्वती ने कहा।

"अब मेरी एक बात और मानो। आज अपने पापा से भी जरूर मिलना। उनका आशीर्वाद लेना।" 

"मैं नहीं जाऊंगी।"

श्रुति ने धीरे से मगर निर्णायक स्वर में कहा।

"मेरी अच्छी बेटी! मां की बात मानती है।"

"बेटी बहुत बुरी है। किसी की बात नहीं मानती। बेटी अच्छी ही होती तो जनमते ही अपनी मां को क्यों खा जाती।" 

ये श्रुति का वो दर्द था जो उसके मन में बचपन से ही भरा जा रहा था। और जो अब विद्रोह के रूप में यदा-कदा छलक जाता था।

"किसने कहा। जैसे बेटी अच्छी है वैसे ही मां भी अच्छी थी। भगवान को अच्छी लगी उसने अपने पास बुला लिया।"

"तो मुझे क्यों नहीं बुलाया? तुम्हीं ने तो कहा, मैं अच्छी हूं।" 

इस बात का उत्तर तो पार्वती के पास भी नहीं था। वो लाजवाब होकर कमरे से बाहर चली गई। 


अशोक बाबू अपनी फैक्ट्री में अपने चैंबर में बैठे थे। उनके साथ फैक्ट्री के जीएम भल्ला साहब भी बैठे थे। भल्ला साहब अशोक बाबू के कर्मचारी कम दोस्त ज्यादा थे। फैक्ट्री के मामले में ही नहीं अशोक बाबू के घर परिवार में भी पूरा दखल रखते थे। अशोक बाबू के हर फैसले के पीछे कहीं ना कहीं भल्ला साहब अवश्य होते थे। इस समय दोनों फैक्ट्री की मजदूर यूनियन के बारे में विचार-विमर्श कर रहे थे। समाधान निकल आने के बाद दोनों घर-परिवार के बारे में बात करने लगे।

"श्रुति को गिफ्ट देकर तुमने बहुत अच्छा किया। इससे उसके मन पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा"

"अच्छा प्रभाव तो तब पड़ेगा जब वो उस गिफ्ट को स्वीकार करेगी। जैसे ही उसे पता चलेगा कि गिफ्ट मैंने दिया है वैसे ही या तो वो उसे किसी और को दे देगी या फिर उठा कर कचरे में फेंक देगी। आजकल बहुत बत्तमीज होती जा रही है।"

"हो सकता है। मगर मेरे दोस्त इसका कारण तो तुम स्वयं ही हो। आज वो तुम्हें वही सब लौटा रही है जो उसने तुमसे पाया है।"

"मैं क्या करता, निशा की मौत मैं आज भी हज़म नहीं कर पा रहा हूं।"

"तो इसका बदला तुमने उस निरीह प्राणी से लिया जो पूरी तरह तुम पर आश्रित थी और ..."

भल्ला साहब और कुछ कहते या अशोक बाबू कोई जवाब देते उससे पहले ही इण्टरकाॅम की घंटी बज उठी। फोन भल्ला साहब ने उठाया।

"हैलो!"

"... "

"क्या? क्या नाम लिया?"

"... "

"ठीक है, भेज दो।"

भल्ला साहब ने फोन रख दिया। 

"कौन है?" 

"अगर मैंने आने की अनुमति दी है तो कोई ऐसा ही व्यक्ति होगा जो यहां 'इस चैंबर' में आ सकता हो। इंतजार करो आता ही होगा।"

अशोक बाबू कुछ नहीं बोले। बस चुपचाप आने वाले का इंतजार करने लगे। कुछ ही देर में चैंबर का दरवाजा खुला। किसी ने चैंबर में झांक कर देखा। अशोक बाबू चौंक गए। ये श्रुति थी। आज तक तो कभी नहीं आई। फिर आज?... श्रुति वहीं खड़ी रही। अंदर नहीं आयी। शायद अंदर आते झिझक रही थी। 

"आओ बेटा, वहां क्यों खड़ी हो। यहां कोई गैर नहीं है।"

श्रुति चैंबर में आ गई। मगर दरवाजे के पास ही खड़ी रही। श्रुति उसी हरे सलवार सूट में थी जो आज सुबह ही उसे अपने पापा की तरफ से उपहार में मिला था। 

"बेटे! इस ड्रेस में तुम बहुत अच्छी लग रही हो। किसने दिया है।... लेकिन तुम वहां क्यों खड़ी हो। अंदर आकर कुर्सी पर आराम से बैठ जाओ।"

हालांकि भल्ला साहब अच्छी तरह जानते थे कि ये सूट उसे किसने दिया है और कितने का है। श्रुति फिर भी अंदर नहीं आयी। 

"अच्छा मैं समझ गया। जब तक पापा नहीं कहेंगे तब तक तुम अंदर नहीं आओगी।... अरे भाई! इसे कह दो ना कि ये आकर बैठ जाए।"

भल्ला साहब ने अशोक बाबू से कहा। अशोक बाबू ने श्रुति से कहा। 

"आ जाओ।" 

और कुर्सी की तरफ इशारा किया। श्रुति झिझकते हुए आयी और कुर्सी पर बैठ गई। 

"जरा तुम लोग बातें करो मैं अभी दस मिनट में आता हूं।" 

कहकर भल्ला साहब चैंबर से बाहर निकल गए। कुछ देर तक तो चैंबर में शांति छाई रही। फिर अशोक बाबू अपनी कुर्सी से उठकर श्रुति के पास आ खड़े हुए। 

"खड़ी हो।"

अशोक बाबू ने श्रुति से कहा।

श्रुति सहमते हुए उठ खड़ी हुई। अशोक बाबू ने श्रुति को अपने सीने से लगा लिया। 

"बेटी, मुझे माफ़ करना। मैंने तुम्हारी साथ बहुत अन्याय किया है।"

"पापा! मुझे भी आप माफ करें। मैं आपको हमेशा गलत ही समझती रही।"

"इसमें तुम्हारा दोष नहीं है। यहां भी मैं ही गलत था।"

इसी समय भल्ला साहब भी वापस लौट आए। आते ही उन्होंने ताली बजानी शुरू कर दिया।

"मुझे खुशी है कि तुम दोनो के बीच जो भी मलिनता थी वो आज खत्म हो गई। सही मायने में श्रुति का जन्म आज हुआ है।"

"भल्ला! आज अपनी बेटी को अपने सीने से लगाकर मुझे अहसास हुआ कि मैं कितना गलत था। मैंने अपनी पत्नी की मृत्यु तो देखी मगर ये नहीं देख पाया कि मेरी बेटी मेरी पत्नी का ही अंश है। और इसके साथ मैं दुश्मनों जैसा व्यवहार करता रहा।"


पिता-पुत्री और भल्ला साहब के बीच ना जाने क्या-क्या बातें होती रही। लगभग एक घंटे के बाद इण्टरकाॅम फिर बजा‌ इस बार भी भल्ला साहब ने ही फोन उठाया।

"ठीक है। आता हूं।"

भल्ला साहब अशोक बाबू और श्रुति को लेकर चैंबर से बाहर आये। इस एक घंटे में आफिस को हल्के-फुल्के ढ़ंग से सजा दिया गया था। एक केक भी लाकर रखा गया था। आफिस के सारे स्टाफ को श्रुति का परिचय दिया गया। श्रुति का पहला जन्मदिन आज मनाया गया जब वो अठारह साल की हो गई थी।



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