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मुक्तक

मुक्तक

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हैं निगाहें  ज़माने की  तन पर  गड़ी
और मेरी नज़र 'श्यामघन' पर अड़ी ।
लोग  कहने  लगे   बावरी  हो  गयी
कल्पना  भी  तुम्हारी  मधुर  है बड़ी ।।
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ये कुदरत के वसीले  हुस्न की सौग़ात करते हैं
मिलाकर शाम को दिन से नशीली रात करते हैं ।
क्षितिज के छोर पर  देखो  रंगोली  पूर सतरंगी
ज़मीं से आसमाँ भी तो मिलन की बात करते हैं ।।
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यूँ  तो  जहाँ में  कोई  फ़रिश्ता  नहीं  होता
पर माँ से  बड़ा  कोई  भी रिश्ता नहीं होता ।
है वक़्त की रफ़्तार को कब बाँधना मुमक़िन
पर माँ का प्यार  कभी  गुजिश्ता नहीं होता ।।
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रहे  चुपचाप  कोई  तो  कोई  कहता  ज़बानी  है
मगर हर एक के घर की यही बस इक कहानी है।
कभी दिल रूठता है तो कभी  मन मान  है जाता
इसी ग़म  के  ख़ुशी के खेल की  यह ज़िंंदगानी है ।।
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पूर्व  कार्य  आरम्भ  के , कर  लें  सोच - विचार
स्वस्थ तभी तन मन बने , उचित अगर उपचार ।
जब भी हो  निर्णय कठिन , आवश्यक  है  सोच
कठिनाई   मिट  जाय  सब ,  होगा   तीव्र  प्रहार ।।
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डॉ. रंजना वर्मा


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