STORYMIRROR

Savita Gupta

Others

2  

Savita Gupta

Others

लम्हे ज़िंदगी के…

लम्हे ज़िंदगी के…

1 min
58


    फुनगियों पर झूला झुलते परिंदों को देख मुझे याद आया माँ के द्वारा दी गई शगुन के चावल की और दौड़ कर किचन से मुट्ठी भर चावल लाकर आँगन में छींट दिया। एक संतुष्टि की अनुभूति हुई।

कितनी अच्छी है ना! इनकी ज़िंदगी सब संग संग शाख़ों पर फुदकते चीं चीं करते। कितना अच्छा होता अगर इनकी भाषा समझ पाती तो तन्हाई नहीं कचोटती। क्या बातें करते होंगे? क्या ये भी आपस में लड़ते होंगे? ना पढ़ाई की चिंता, ना घर गृहस्थी चलाने के लिए घर से दूर पर देश जा कर कमाई की चिंता। सब एक साथ मिल -जुलकर रहते हैं।


फ़ोन की घंटी सुन कर दौड़ी …चलो किसी को तो याद आई मेरी कुछ देर बात कर अच्छा लगेगा। अरे! अननोन नंबर है।किसी विज्ञापन या किसी एजेंट का होगा। वापस चिड़ियों के साथ हो ली और फ़ोन पर वहीं बैठे -बैठे उसने वर्षों बाद एक कविता लिखा शीर्षक दिया ”परिंदे "और मेल कर दिया अनमने से अख़बार में प्रकाशनार्थ।


आज छह महीने बाद अपनी कविता अख़बार के पन्नों पर देख ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। ज़िंदगी का यह लम्हा मुझे जीने का एक नया रास्ता दे गया।रेत सी फिसलती ज़िंदगी को एक किनारा दे गया।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन