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Komal Tandon

Children Stories Fantasy Thriller

4  

Komal Tandon

Children Stories Fantasy Thriller

हीरामन तोता (The wonderful parrot)

हीरामन तोता (The wonderful parrot)

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1)साधु का आगमन

चंपकपुर (काल्पनिक) नामक नगर के राजा का नाम कारुणेन्द्रनाथ था। उनके तीन पुत्र थे सबसे बड़ा मानवेन्द्र , दूसरा राघवेन्द्र व तीसरा आरुणेन्द्र । दो बड़े भाई बहुत चपल व चापलूस प्रवृत्ति के थे । राजा उनकी योग्यता पर बहुत विश्वास करता था । तीसरा बेटा थोड़ा आलसी व राजा के मुँह पर सत्य बोल देने की प्रवृत्ति वाला था । अतः राजा उसे अयोग्य समझता था। राजा सभी महत्वपूर्ण कार्य अपने दोनों बड़े बेटों को देता था । छोटे वाले को यह कहकर टाल दिया जाता कि " तुम यह कार्य नहीं कर सकोगे । तुम्हें व्यवहारिकता का ज्ञान नहीं । कब क्या बोलना है यह न जानकर तुम कुछ भी बिना सोचे समझे बोल देते हो जिससे बात बिगड़ सकती है । " व्यवहारिकता का नाम लेकर झूठ के संसार में सत्य बोलने वालों का जो हाल होता है उससे हम सभी परिचित हैं। तो आरुणेन्द्र इस प्रकार की उलाहना सुन सुन कर मानो पक चुका था और कदाचित यही कारण था कि वह स्वयं भी राजकार्य में अधिक रुचि नहीं लेता था।

एक बार उसके नगर में एक साधु आया । साधु ने नगर के मध्य पीपल के वृक्ष के नीचे अपना आसन लगाया। नगर के लोग सन्यासी के प्रवचन सुनने और उससे अपनी समस्याओं का हल जानने आने लगे । साधु का नाम चिरानंद था । वह मुस्कुराकर लोगों की समस्याएं हल करने के रोचक और कारगर उपाय बताया करता । नागरिकों का आधा दुख तो उसके मुस्कुराते शांत चेहरे को देखकर ही दूर हो जाता ।

जैसे एक बार एक व्यक्ति साधु के पास अपनी समस्या लेकर आया । 

किसान – “साधु महाराज मैं जितना कमाता हूं सब खर्च हो जाता है एक रुपया भी नहीं बचता । मेरे माता पिता कहते हैं कि मुझे उनकी परवाह नहीं , पत्नी कहती है मैं उसकी चिंता नहीं करता बच्चों को लगता है मैं उन्हें प्रेम नहीं करता । मेरी कमाई पूरी भाप बनकर उड़ जाती है पर जिनके लिए मैं दिन रात मेहनत करता हूं उनमें से कोई भी प्रसन्न नहीं। और आप तो कहते हैं कि परलोक सुधारने के लिए दान दक्षिणा करते रहना चाहिए । बताइये मैं इस लोक की ही जरूरत नहीं पूरी कर पा रहा तो कैसे परलोक सुधारूं?”

संयासी मुस्कुराया- “बालक तुम्हारी समस्या धन नहीं बल्कि धन का अनुचित वितरण है । सुनो आज के बाद नियम पूर्वक अपनी प्रतिमाह की कमाई को पांच भागों में बांटो । 

पहला- बीते कल के लिये जो तुम्हारे माता पिता हैं। एक भाग उनके लिए सुरक्षित रखो। 

दूसरा- आज के लिए जो तुम और तुम्हारी पत्नी हैं । 

तीसरा -भाग इस लोक के खर्चो के लिए जिसमें तुम्हारी बचत व कारोबार आता है । चौथा अपने आने वाले कल अर्थात् बच्चों की पढ़ाई लिखाई व अन्य खर्चो के लिए । 

और पाँचवाँ -परलोक के लिए अर्थात् दान पुण्य के लिए । इस प्रकार यदि तुम अपनी कमाई का निश्चित हिस्सा सुनियोजित तरह से खर्च करोगे तो तुम्हारा सर्वांगीण भला होगा और तुम्हारी पत्नी और परिवार के अन्य जन भी अपने हिस्से के पैसे के अनुसार अपने खर्च नियंत्रित करके चलेंगे । ”

एक बुढ़िया –“महाराज मेरी बहू बहुत ही झगड़ालू है और मुझसे बहुत जुबान लड़ाती है । घर में रोज कलह मची रहती है । बताइये मैं क्या करूं ?“

संयासी ने उसे एक अभिमंत्रित सुपारी दी -“यह अभिमंत्रित सुपारी रखो जब तुम्हारी बहू बहस लड़ाए तो इस मुंह में रखकर मन ही मन ऊँ नमः शिवाय का जाप करने लगना वह स्वयं शांत हो जाएगी। घर के कलह क्लेश दूर हो जाएंगे । “

इस प्रकार संयासी बहुत ही सरल शब्दों में लोगों को लोक व परलोक सुधारने की युक्ति बताया करते थे। और घरेलू झगड़ों से निपटने के उपाय बताते । जब सास कोई जवाब न देती तो बहू को बहस लड़ाने का बहाना ही न मिलता । और जब घरवालों को पता है कि उन्हें अपने हिस्से के पैसे खर्च करने हैं तो वे फिजूल खर्ची न करते । 

धीरे धीरे सन्यासी के विषय में चर्चा राजमहल में पहुंची । 

राजा संयासियों में विशेष श्रद्धा रखता था वह स्वयं साधु से मिलने गया और उन्हें महल में ठहरने का आग्रह किया । साधु ने यह निमंत्रण स्वीकार कर लिया और राजमहल आया ।

जब साधु दरबार में आया तो राजा ने उसे अपना सिंहासन बैठने को दिया । 

राजा करूणेन्द्रनाथ ने अपना सिंहासन सौंपते हुए कहा –“ आइये महात्मन् आसन ग्रहण कीजिए । “

संयासी -” राजन यदि मैं तुम्हारे सिंहासन पर बैठा तो मैं राजा और तुम प्रजा बन जाओगे । सोच लो , क्या तुम अपना राज्य मुझे सौंप देना चाहते हो ? “

राजा – “जी महात्मन् इस बात से मैं भली प्रकार परिचित हूं कि जो इस सिंहासन पर आसीन होगा वही राज करेगा और यह भी जानता हूं कि आप संयासियों को राज पाठ का मोह नहीं होता । सच्चा सन्यासी मेरे सिंहासन को भी ठुकरा देगा । मैं नहीं चाहता की आपके सम्मान में कोई कमी रह जाए इसलिए राज्य का सर्वोच्च आसन आपको अर्पित कर रहा हूं।“

साधु - हंसकर बोला – “हा हा । सही कहा राजन मैं तुम्हारे राज्य के किसी भी श्रेष्ठ पुरुष का पद नहीं लेना चाहता बल्कि अपना एक अलग आसन चाहता हूं । “

राजा ने ताली बजाई और कुछ सेवक एक सुसज्जित सिंहासन लेकर आए । 

संयासी के लिए अलग आसन का प्रबंध किया गया । अगले कई दिनों तक सभी विद्वानों ने संयासी से चिकित्सा नक्षत्र व शासन व्यवस्था पर प्रश्नोत्तर किए और अपना ज्ञान वर्धन किया ।

राजा स्वयं साधु महाराज की आवश्यकताओं का ख्याल रखने लगा । उसके तीनों बेटे भी पिता का अनुसरण करते हुए संयासी की सेवा किया करते थे । संयासी ने जानलिया कि राजा अपने दो चाटुकार पुत्रों को अधिक महत्व देता है परंतु सत्यवादी होने के कारण आरुणेंन्द्र की आलोचना किया करता है । 

एक रात्रि संयासी राज उद्यान में बैठे थे तभी वहां आरुणेन्द्र आया । 

आरुणेन्द्र-“प्रणाम ऋषिवर ।“

संयासी –“सदा सुखी रहो पुत्र । तुम इस समय यहां क्या कर रहे हो ? सोने क्यो न गये ?”

आरुणेन्द्र –“महाराज मुझे पक्षियों की गतिविधियां देखना बहुत पसंद है परंतु मैं चाहे जितनी भी कोशिश करूं मैं रात्रिचर जीवों का अध्ययन नहीं कर पाता क्योंकि मुझे नींद आ जाती है । तो आप कोई ऐसा उपाय बतायें जिससे मैं रात भर जाग कर उद्यान में रहने वाले रात्रिचर पक्षियों का अध्ययन कर सकूं।“

संयासी मुस्कुराकर बोले –“अवश्य । सुनों एक रेशम की डोर अपनी शिखा (चोटी ) पर बांधों और उसका दूसरा सिरा किसी डाल पर बाँध दो जब तुम्हें नींद आएगी और तुम्हारी गरदन लुढ़कने लगेगी तो तुम्हें डोरी खिंचने से एक झटका लगेगा और तुम जग जाओगे । “

आरुणेन्द्र-“वाह गुरुजी आपने अच्छा उपाय बताया । धन्यवाद मैं आज रात्रि ऐसा ही करूंगा । “

सन्यासी " आरूणेंद्र तुम्हारा प्रिय पक्षी कौन सा है ?" 

आरुणेद्र ने तुरंत उत्तर दिया "तोता। क्युकी वह मनुष्य की भाषा की नकल कर सकता है। गुरुजी..... दूर देश में मोर के समान रंग बिरंगे पंखों वाले तोते पाए जाते हैं । ऐसा एक तोता मैंने एक व्यापारी से खरीदा था । वह मुझे बहुत प्रिय है । क्या आप उसे देखेगे ? मैं उसका पिंजरा यहीं ले आता हूं । "

सन्यासी "पुत्र तुम्हें जिससे प्रेम है क्या तुम उसे पिंजरे में कैद रखते हो ?"

आरुणेद्रा ने सिर झुकाकर कहा "क्षमा कीजिए गुरुजी । मैं अभी उसे स्वतंत्र करता हूं। "

संयासी ने मुस्कुराकर उसे आशीर्वाद दिया । आरूणेंद ने अपने कक्ष से उस तोते का पिंजरा मंगवाया और उसी समय उसे स्वतंत्र कर दिया । तोता एक पेड़ पर बैठ कर अरुणेंद्र का नाम पुकारने लगा । यह देखकर वह किशोर राजकुमार किसी बालक की भांति हंसने लगा । 

आरुणेन्द्र का व्यवहार निश्चय ही किसी राजकुमार के समान न था ।


एक दिन उद्यान में टहलते हुए कारुणेन्द्र नाथ ने संयासी से अपने बच्चों के भविष्य के विषय में जानना चाहा। 

कारुणेन्द्र नाथ –“महाराज आप तो देख ही रहे हैं कि मेरे तीन बेटे हैं। मैं उनका भविष्य जानना चाहता हूं । “

संयासी –“राजन मैं देखसंन्पायासी रहा हूं कि आपके दो बड़े बेटे आपका राज्य भली प्रकार संभाल लेंगे और इसे बढ़ाएंगे भी , परंतु आपके छोटे बेटे के भाग्य में कुछ और ही लिखा है । उसका भाग्य उसे इस राज्य से योजनों दूर ले जाएगा । “

कारुणेन्द्रनाथ –“मुझे तो पहले ही शंका थी कि वह अव्यावहारिक बालक अवश्य ही अयोग्य सिद्ध होगा । उसे जरा भी ज्ञान नहीं कि कब क्या बोलना है व कैसा व्यवहार करना है ? वह तो अपनी ही दुनिया में मग्न रहता है । उसे पक्षियों से विशेष प्रेम है । दिन रात उद्यान में बैठा पक्षियों की गतिविधियां देखा करता है । “

संयासी –“संसार में रहकर भी सांसारिक न होना निश्चय ही अव्यावहारिकता है । परंतु आप चिंता न करें वह जहां रहेगा प्रसन्न रहेगा । मेरा आशीर्वाद आप सबके साथ है। “

राजा ने संयासी को प्रणाम किया । 


2)स्वर्णाम्र की कथा

कुछ दिन ठहरकर संयासी अपनी यात्रा पर आगे बढ़ना चाहता था अतः उसने दरबार में यह इच्छा व्यक्त की । 

“महाराज मैं अब अपनी यात्रा पुनः प्रारंभ करना चाहता हूँ । आपने और आपके परिवार ने मेरी बहुत आवभगत की। मैं आपसे बहुत प्रसन्न हूं । मैं आपको एक बीज उपहार में देना चाहता हूं यह स्वर्णाम्र का बीज है । यह कोई साधारण आम का बीज नहीं बल्कि एक अद्भुत पेड़ पर फलने वाले आम का बीज है । यह कल्पवृक्ष पर उगने वाले सुनहरे आम का वृक्ष है । इसमें प्रत्येक अमावस्या व पूर्णमासी को अर्धरात्रि के बाद सोने का आम फलता है जो शुद्ध सोने से बना होता है । इसके भीतर पिघला सोना रस के रूप में भरा होता है जो मनुष्यों के बड़े से बड़े रोग को दूर कर सकता है , मरते हुए व्यक्ति को भी जिला सकता है । परंतु जिसकी आत्मा शरीर छोड़ चुकी हो उसे सिर्फ ईश्वर ही जिला सकता है । इसका बीज स्वयं एक अत्यंत मूल्वान रत्न है । यदि तुम इसे अपने बगीचे में बो दो इससे पेड़ निकल आएगा । परंतु यह तीन बार ही सोने का आम देगा । अन्य आम की गुठलियाँ पुनः बोकर तुम और पेड़ लगा सकते हो । इसके बाद स्वर्णम्र तो नही फलेंगे पर आम की एक नई प्रजाति अवश्य विकसित हो जायेगी जिनका स्वाद अद्भुत होगा। यह चमत्कारी बीज मेरी ओर से उपहार में स्वीकार करो । मैं स्वयं इसे तुम्हारे उद्यान में बोना चाहता हूं। “

“महाराज आप हमारे राज्य में रुके और हमें सेवा का अवसर दिया यही बहुत बड़ा उपहार है हमारे लिए। परंतु मैं आपको किसी बात के लिए मना कैसे कर सकता हूँ अतः मैं आपसे यह उपहार ले लेता हूं। बहुत बहुत धन्यवाद । और जिज्ञासावस जानने को इच्छुक हूं की यह अद्भुत फल क्या स्वर्ग लोक से आया है ? धरती पर तो ऐसे अदभुत वृक्ष का कोई प्रमाण नहीं मिलता ।  “


" सुनो राजन मैं इस स्वर्णाम्र की कथा कहता हूं । राजन लाखों वर्ष पूर्व धरती पर असुरो ने आक्रमण किया था जिन्होंने धरती की स्त्रियों पर अनेक अत्याचार किए । असुर स्त्रियों के गर्भ से अपनी संतान उत्पन्न कर पूरी धरती जीतना चाहते थे । जब उन्हें पता चलता की गर्भ में मादा संतान है तो वे इन स्त्रियों को मार देते । क्युकी उनके लोक में कोई स्त्री न थी अतः वे नर संतान को ही अपना उत्तराधिकारी मानते थे। धरती की स्त्रियों ने तब द्रवित होकर ईश्वर को पुकारा उनकी यह पुकार एक अन्य लोक में रहने वाली देवियों ने सुनी । स्त्रियों और देवियों में प्रगाढ़ संबंध है । ईश्वर की इच्छा से देवियां धरती पर आई और असुरों के अत्याचार से धरती को मुक्त कराया । कुछ देवियां मनुष्यों की भलाई के लिए नदी, वृक्ष और पर्वतों के रूप में सदा के लिए धरती पर ही रुक गईं । ऐसी ही एक देवी कल्पफला कल्पवृक्ष के रूप में संसार के सबसे घने व दुर्गम जंगल में आज भी निवास करती है। इस वृक्ष की हर शाखा पर भिन्न-भिन्न प्रकार के चमत्कारी फल उगते हैं । इन्हीं के बीजों से धरती पर अनेक फलों की प्रजातियां विकसित हुई। इस पेड़ के नीचे खड़े होकर जिस फल की कामना करो वह प्रकट हो जाता है और वह अद्भुत होता है । इस वृक्ष की खोज में में वर्षो भटका तब कहीं जाकर मुझे यह सौभाग्य मिला । एक स्थान पर मुझे एक अति प्राचीन वृक्ष दिखा जिसकी प्रत्येक डाल पर पत्तियां भिन्न आकार की थी मैं जान गया की मेरी खोज पूरी हुई। मुझे आम पसंद है इसलिए मैंने उस वृक्ष के नीचे खड़े होकर आम खाने की इच्छा व्यक्त की । एक डाल पर जिसपर आम की पत्तियां विकसित थी एक स्वर्णाम्र तुरंत ही प्रकट हुआ । इस स्वर्णाम्र को खाते ही मेरी सारी थकान उतर गई मैं पहले से अधिक युवा महसूस करने लगा । मेरी आयु मानो रुक गई । में पिछले पचास वर्षों से स्वस्थ जीवन जी रहा हूं और संसार भ्रमण का अपना सपना साकार कर रहा हूं । यह बीज मैंने संभाल कर रखा था । तुम मुझे इस बीज के योग्य लगते हो अतः मैं तुम्हें यह उपहार में देता हूं । यह बीज एक कीमती रत्न भी है । जिन मनुष्यों को यह ज्ञान नहीं था उन्होंने उस वृक्ष के बीजों को दोबारा बोने के स्थान पर उसे रत्न के रूप में प्रयोग किया । मैंने योग विद्या से इसे बोने का तरीका जान लिया । इन्हें बोने के लिए विशेष मंत्र का उच्चारण आवश्यक है।  "

"वाह महाराज देवियों की ऐसी अद्भुत कथा का वर्णन करने के लिए धन्यवाद । आपका सानिध्य पाकर हम धन्य हुए । जैसा कि आपने कहा की आप ही इसे बोने का तरीका जानते हैं तो कृपा करके इसे हमारे राज उद्यान में बोने का शुभ कार्य अपने कर कमलों से पूर्ण करें ।"

साधु ने वेदोच्चारण करते हुए बीज को बोकर उसपर गंगा जल छिड़का और राजा से विदा लेकर अपनी यात्रा पर निकल पड़ा । 

3)स्वर्णाम्र की चोरी

राजसी उद्यान में एक स्थान पर बीज बो दिया गया । दिन रात उसकी देखभाल की जाने लगी । वह पेड़ बड़ी तेजी से बढ़ने लगा । एक माह में ही पेड़ पर आम फलने लगा । हर आम मानों चाशनी से भरा था । यह आम का मौसम भी न था फिर भी आम फल रहे थे । राजा बहुत प्रसन्न हुआ । अमावस्या की रात्रि नजदीक थी । कुछ सिपाहियों सहित राजकुमार मानवेन्द्र को पेड़ की देखभाल का काम दिया गया था । उसे आज्ञा दी गयी कि जैसे ही सोने का आम फले तो राजा के पास तुरंत लाया जाए चाहे जितनी भी रात्रि हो राजा को तुरंत जगा दिया जाए । राजा उस आम के दर्शन करने को बहुत उत्साहित था । तीनों राजकुमार भी अत्यंत उत्साहित थे । राजा ने मानवेन्द्र को सुनहरे आम की रक्षा करने का काम सौंपा परंतु अफसोस अगला दिन निकल आया पर पेड़ पर सुनहरा आम नहीं फला । 

“पुत्र तुम्हें कल रात्रि सुनहरे आम की रक्षा का कार्य दिया गया था वह कहाँ है?”

“पिताजी मैंने पूरी रात प्रतीक्षा की व भोर में भी देखा पर वहाँ कोई सुनहरा आम नहीं फला था। अवश्य ही वह संयासी झूठा था।“ राजकुमार के साथ पहरे पर रहे सिपाहियों ने भी राजकुमार के समर्थन में हां हां की आवाज लगाई ।

“यह कैसे संभव है? साधू महाराज कैसे गलत बोल सकते हैं? जब एक रत्न से वृक्ष निकल आया तो यह कैसे संभव है कि स्वर्णाम्र न फला हो ?” राजा ने चिंतित होकर कहा । तभी महामंत्री ने सभा में प्रवेश किया ।

“पिताजी कदाचित भूमि में रत्न के साथ उस संयासी ने आम का बीज भी बो दिया हो?” राघवेन्द्र ने अपने बड़े भाई का समर्थन करते हुए कहा । तभी दरबार में महामंत्री का प्रवेश होता है ।

“महाराज सुनहरा आम फला था । मैंने स्वयं निरीक्षण किया है । वहाँ एक आम की डाल टूटी है जिसका सिरा शुद्ध सोने का है । अवश्य वह आम किसी ने हठात् तोड़ा है फलतः डाल पर कुछ सोना लगा रह गया है। सोना दूर से ही अपनी छटा बिखेर रहा है । आप स्वयं चलकर देख सकते हैं ।“

राजा उद्यान में गया तो पाया कि वाकई एक डाल से आम तोड़े जाने के चिन्ह साफ दिख रहे थे । जहाँ वह आम डाल से जुड़ा था वहाँ कुछ भाग सोने का था और चमक रहा था । 

“ मानवेन्द्र सच कहो वह आम कहाँ है ?” राजा ने डांटा तो मानवेन्द्र कांपने लगा । 

“पिताजी सच कहूँ तो मैं प्रतीक्षा करते करते सो गया था अतः मुझे नहीं पता कि कब आम फला और कौन तोड़कर ले गया ?” अन्य सिपाहियों ने भी यही बताया कि अचानक नींद आने के कारण कुछ भी पता नहीं चला।

“तुम्हारी लापरवाही के लिए तुम्हें युवराज के पद से हटाया जाता है । सैनिकों मैं तुम्हें झूठ बोलने के लिए बंदीगृह भी भेज सकता हूँ तो इससे पूर्व की मैं अपनी वाणी से मुकर जाऊं और कारागार या फांसी की सजा सुनाऊँ मेरी दृष्टि से दूर हट जाओ । “ राजा की आज्ञा से मानवेन्द्र तुरंत वहाँ से चला गया । अगली बार पूर्णिमा की रात्रि राजा ने राघवेन्द्र को इस कार्य पर रखा । परंतु अगले दिन उसने भी यही बताया कि वह रात में सो गया था जिसके कारण जब आँख खुली तो आम वहाँ नहीं मिला । फिर आखिर आरुणेन्द्र ने कहा । 

“पिताजी आज रात मैं जागकर देखूंगा कि कौन आम की चोरी कर रहा है ?“ सबसे छोटे पुत्र आरुणेन्द्र ने कहा । आरुणेन्द्र सबसे छोटा था अतः राजा व उसके भाई मानों बच्चा ही समझते थे । यद्यपि वह बीस वर्ष का यूवा था ।

“पुत्र तुम्हारे योग्य बड़े भाई भी सो गये जो राज काज में मेरा बराबर से सहयोग किया करते हैं। तो तुम कैसे जागे रह सकोगे ? तुम तो बहुत ही सुविधा पसंद हो । लगता है हमें साधारण आमों से ही संतोष करना होगा। ये आखिरी स्वर्णाम्र है इसके पश्चात पेड़ पर सामान्य आम ही फलेंगे ।“

“पिताजी आप और भैया कभी मुझपर विश्वास नहीं करते और मुझे कोई जिम्मेदारी वाला कार्य ही नहीं देते । इसीलिए मैं बच्चा ही बना रह गया । परंतु अब मैं भी आपको साबित कर देना चाहता हूं कि मैं भी महाराज करुणेन्द्र नाथ का पुत्र हूँ । मुझ पर विश्वास कीजिए पिताजी । अंतिम बार समझ कर एक अवसर दीजिए । “

“ठीक है तीन और सिपाहियों सहित आज रात स्वर्णाम्र की रक्षा करने का दायित्व तुम्हें सौंपा जाता है । मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है पुत्र, विजयी हो ।“ जब राजकुमार ने पिता के पाँव छुए तो राजा ने उसे आशीर्वाद दिया। 

4)हीरामन तोता से पहली भेंट


आरुणेन्द्र जानता था कि वह जो कोई भी है सिपाहियों के सोने के पश्चात ही सुनहरा आम चुराकर ले जाता है । अतः संयासी की दी हुई युक्ति के अनुसार राजकुमार ने एक डोरी से अपनी चोटी बाँधकर उसे पेड़ से बाँध दिया बैठ कर प्रतीक्षा करने लगा जबकि बाकी सिपाही खड़े खड़े पहरा देते रहे । यह प्रक्रिया कारगर रही । जब भी वह सोने को होता उसके बाल खिंचते और दर्द से कराहकर वह उठ बैठता । भोर से कुछ ही देर पूर्व राजकुमार को झपकी लगी पर चोटी खिंचने से वह उठ गया । इधऱ उधर दृष्टि डाली तो सिपाही भूमि पर गिरे सो रहे थे ।


 राजकुमार उन्हें उठाने को अग्रसर हुआ कि तभी उसे रात के सन्नाटे में पंख फड़फड़ाने की आवाज सुनाई दी । उसने ऊपर देखा तो उसे एक अद्भुत दृष्ट देखने को मिला । आकाश मार्ग से उड़ कर एक पक्षी आ रहा था जो देखने में तोते के समान था । उसकी लाल चोंच नीचे की ओर मुड़ी थी और रत्न के समान चमक रही थी , उसके पंख रंग बिरंगे थे और रात्रि में चांद की रोशनी से चमक रहे थे । वह साधारण तोते से आकार में चार-पांच गुना बड़ा था । वह मानो रत्न व माणिक्यों से बना हुआ था । उसका शरीर हीरे से बना था व पंखों पर पन्ना, नीलम , रूबी आदि रत्न जड़े थे । राजकुमार अपना उद्देश्य भूलकर उसे निहारता रह गया । वह तोता सुनहरे आम की डाल पर उतरा और चोंच से आम को काटकर डाल से अलग किया तब राजकुमार को होश आया उसने अपनी शिखा में फँसी डोरी तोड़ी और तलवार लेकर तोते की ओर बढ़ा पर तोता आकाश मार्ग से उड़ चला राजकुमार ने सोचा कि यह पक्षी भी आम से कम अद्भुत तो नहीं। उसका रहस्य जानने की इच्छा से उसने उसपर तीर नहीं चलाया बल्कि उसका पीछा करने लगा । 

इधर राजकुमार तोते का पीछा करता रहा उधर राजा को सुबह पता चला कि आम के साथ साथ उनका छोटा बेटा भी गायब है । वो बहुत पछताने लगे और राजकुमार की खोज में चारों दिशाओं में सिपाहियों को दौड़ा दिया । इधर राजकुमार पक्षी के पीछे-पीछे घने वन में प्रवेश कर गया जहां न जाने कैसे वह पक्षी उसकी आँखों से ओझल हो गया । राजकुमार ने चारों दिशाओं में देखा पर वह कहीं नहीं दिखाई दिया । निराश होकर वह घर लौटने को हुआ पर वह मार्ग भूल चुका था । जंगल में भटकते हुए वह एक कुटिया के पास पहुँचा जिसके बाहर नीम के पेड़ के चारों ओर बने गोल मिट्टी के चबूतरे पर एक संयासी बैठे तपस्यारत् थे । राजकुमार वहीं उनके समीप हाथ जोड़कर बैठ गया । वह थक गया था और भूखा था । वह रात भर का जगा था । जंगल की ठंडी हवा में उसे निद्रा ने जकड़ लिया और वह सो गया । जब वह उठा तो संध्या हो रही थी । उसे बहुत भूख लगी थी । उसने देखा संयासी चबूतरे पर नहीं थे वह उन्हें ढूँढता झोपड़ी में पहुँचा तो पाया कि वे संध्या आरती कर रहे थे । आरती के पश्चात उन्होंने राजकुमार को खाने के लिए फल दिये । और उसके आने का प्रयोजन पूछा । 

“गुरुजी मैं चंपकपुर के राजा करुणेन्द्रनाथ का सबसे छोटा पुत्र आरुणेन्द्र हूँ ।“ राजकुमार ने सारी बात ऋषि को बताई।

“ओह तो यह बात है । तुम मार्ग भटक गये हो तो सुनो दक्षिण दिशा में चलते चले जाओ तुम अपने राज्य पहुँच जाओगे । तुम आज विश्राम करो कल यात्रा प्रारंभ करना ।“

“गुरुजी क्या आप मेरी बातों पर विश्वास करते हैं कि संसार में सोने के आम देने वाला वृक्ष व हीरे माणिक्यों से बना तोता पाया जाता है ?”

“बिल्कुल मैं जानता हूँ । स्वर्णाम्रः का वृक्ष कल्पवृक्ष पर उगने वाले आम के बीज से बनता है । यह कल्पवृक्ष वास्तव में एक देवी थीं जो मानव जाति की भलाई के लिए वृक्ष रूप में धरती के एक अत्यंत दुर्गम स्थान पर विराजमान हैं। इस वृक्ष के नीचे खड़े होकर जिस फल की इच्छा करोगे वह उग आयेगा । यह वृक्ष स्वयं अद्भुत है तो उसके फलों के बीज तो अद्भुत होंगे ही । इस वृक्ष के दर्शन ही दुर्लभ मनुष्यों को होते हैं । जिन्होंने तुम्हें यह बीज दिया वो अत्यंत ज्ञानी व परोपकारी ऋषि रहे होंगे । “

“सत्य वचन गुरुदेव । और उस तोते के विषय में आप क्या जानते हैं?”

“वह हीरामन तोता है । उसे इसी नाम से जाना जाता है । हीरामन तोता सुनहरे आम से ही पोषण प्राप्त करता है । इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं खाता पीता । मुझे तो लगता है कि ऋषि ने वह बीज तुम्हारे लिए नहीं बल्कि हीरामन के लिए ही दिया था। वह बीज किसी ऐसे स्थान पर ही बोने पर फलता है जो पवित्र हो । मैं देख पा रहा हूँ कि तुम्हारा उद्यान जिस स्थान पर है उसके नीचे एक प्राचीन शिवलिंग दबा हुआ है । भूकंप आदि प्राकृतिक आपदाओं के कारण वह भूमि के भीतर समा गया होगा और सैकड़ो वर्षों बाद लोग उसे भूल भी गये होंगे । शिवलिंग आसपास के क्षेत्र को सकारात्मक ऊर्जा से भर देते हैं । उनकी संरचना ही कुछ ऐसी होती है । “

“अवश्य ही ऐसा हुआ होगा । गुरुदेव आप तो अत्यंत ज्ञानी हैं । क्या आप मुझे हीरामन तोते का निवास बता सकते हैं? मैं वचन देता हूँ कि यदि वह आम उसके लिए बोया गया है तो वही उसका उपभोग करेगा परंतु मैं उस तोते को दर्शन करने व उसके विषय में और भी बहुत कुछ जानने को इच्छुक हूँ । ” राजकुमार ने अधीरता से कहा । 

“किसी भी अन्य युवा के समान तुम भी अत्यंत जिज्ञासु हो । परंतु अधिक जिज्ञासा जीवन को संकट में डाल सकती है। “

“गुरुजी अपने जीवन मरण के लिए मैं स्वयं जिम्मेदार होऊँगा । यदि आपको कोई समस्या नहीं तो मुझे उसका स्थान जानना है । “

“तो फिर उत्तर की ओर यात्रा करो । हिमालय पर एक ऐसा पर्वत है जिसपर प्रकृति ने ऊँ लिखा है । इसी पर्वत पर एक अत्यंत तंग कंदरा है । जिससे होकर एक रास्ता जाता है तुम जब इसमें प्रवेश करोगे तो लगेगा कि यह इतना तंग है कि इसमें प्रवेश संभव ही नहीं परंतु यदि तुम्हारा विश्वास पक्का है और तुम दृढ़निश्चयी हो तो उसमें प्रवेश कर सकोगे । भूमि के भीतर ही एक अद्भुत नगर बसा है जहां एक देव का राज्य है । वह तोता उसी का पालतू पक्षी है और तोते के समान असुर स्वयं भी बहुत सुंदर है । उसका शरीर सोने के समान चमकता है और पीले रंग का है। उसके बाल घने भूरे चमकदार हैं । आँखें तो मानोंहीरे से बनी हैं मानोंकिसी ने रत्नों को मानव आकार देकर उन्हें जीवित कर दिया हो। देव सोने का बहुत ही बड़ा लालची है वह संसार का सारा सोना चुरा लेना चाहता था । और वह चुरा भी लेता पर देवी ने उसे धरती के गर्भ में कैद कर दिया । वह अपने स्वर्ण भंडार की रक्षा करता वहीं रह रहा है । वह हीरामन तोता उसे कैसे मिला यह तो मैं नहीं जानता पर वह सदा से उसके साथ है कदाचित वह उसका वाहन पक्षी है । देवी देवता जानवरों और पक्षियों को ही अपने वाहन व संदेशवाहक के रुप में प्रयोग करते थे । देवी के प्रताप से वह देव उस गर्भ ग्रह से कभी बाहर नहीं आ सकता । यदि तुम उपहार में उसे स्वर्ण दो तो वह तुम्हारा मित्र बन सकता है परंतु मुझे नहीं लगता कि वह हीरामन तुम्हें दे देगा । हीरामन तो उसे प्राणों से भी ज्यादा प्रिय है । “

“सहायता के लिए धन्यवाद । आगे क्या करना है यह वहाँ पहुँच कर ही पता चलेगा । मुझे हीरामन सिर्फ इसलिये चाहिए ताकि मैं अपने पिता का विश्वास जीत सकूँ । वरना कदाचित वो हीरामन तोते के अस्तित्व पर विश्वास ही न करें । यदि मैं स्वयं अपनी आँखों से न देखता तो मैं भी नहीं करता । मैं उस तोते को कैद नहीं करना चाहता। बस अपने पिता की दृष्टि में योग्य सिद्ध हो जाऊं फिर उसे स्वतंत्र कर दूंगा। अब तो राजमहल तभी लौटूंगा जब हीरामन के दर्शन कर लूंगा और उस देव के भी । “ राजकुमार ने अपना गन्तव्य स्पष्ट किया तो ऋषि ने उसे कुछ बीज दिये । 

“पुत्र यह रखो । मेरे पास यह कुछ बीज हैं जो बंजर जमीन पर भी फलते हैं । इन्हें फलने के लिए बहुत कम पानी की आवश्यकता है । इन्हें बोने से ऐसी फसल खिलेगी कि तीन वर्षों तक के लिए किसी बड़े से बड़े नगर की भोजन की समस्या दूर हो जाएगी । यह गेहूँ के बीज मुझे मेरे गुरुजी ने दिये थे । वे उत्तम बीज पर शोध किया करते थे ताकि मानव जाति के भले के लिए ऐसे बीज विकसित कर सकें जिनसे अच्छी पैदावार हो । गुरुजी की अकस्मात् मृत्यु के पश्चात मैं इस प्रकार के बीजों को पुनः विकसित करने में असफल रहा । मैं स्वयं कभी-कभी इन बीजों का प्रयोग करता हूँ । परंतु मुझे जाने क्यों ऐसा आभास हो रहा है कि तुम्हें इनकी आवश्यकता पड़ने वाली है इसलिए यह तुम्हें दे रहा हूँ । अब मैं समाधि लगाने जा रहा हूँ मुझे अब इनकी आवश्यकता भी नहीं रही । मार्ग में मेरी एक सलाह याद रखना वह यह कि यदि कोई संकट में दिखे तो उसे अनदेखा न करना । आशा करता हूँ तुम्हारी यात्रा सफल हो । “ राजकुमार ने ऋषि को प्रणाम किया और अगली यात्रा पर निकला । 


5)देव के स्वर्ण नगर में


कई दिनों की यात्रा के पश्चात वह एक सुंदर झील के किनारे खड़ा था जिसके दूसरे ओर एक पर्वत जिसपर बनी आकृति व पानी में पड़ता उसका प्रतिबिंब मिलकर ऊँ का चिन्ह बना रहे थे । राजकुमार ने आजतक ऊँ पर्वत के विषय में सुना था परंतु यह पहला अवसर था जब वह इस अद्भुत पर्वत के सम्मुख खड़ा था । झील का जल अत्यंत स्वच्छ व पारदर्शी था । हिमाच्छादित अद्भुत हिमालय को प्रेम से निहारता वह आगे बढ़ा। ठंडी हवा मानो रक्त को भी जमा देने को आतुर थी । परंतु राजकुमार नहीं रुका । झील के उस पार पहुंचकर उसने पर्वत पर चढ़ना शुरू किया उसने अपना अश्व वही बांध दिया । ऋषि के बताये रास्ते पर चलकर उसे तंग गुफा मिली । कुछ विश्राम करने व जलपान करने के बाद राजकुमार गुफा में घुसा गुफा पहले तो पर्याप्त लंबी और चौड़ी थी पर थोड़ा आगे बढ़ा तो लगा कि वह फँस जाएगा पर वह हिम्मत नहीं हारने वाला था । वह लेट कर केंचुए की तरह रेंग रेंग कर गुफा में आगे बढ़ने लगा । भीतर अत्यंत ठंड व अँधेरा था । राजकुमार के हाथ कई जगह से छिल गये पर वह बढ़ता रहा । कभी इस करवट कभी उस करवट वह रेंगता चला जा रहा था कई बार तो लगा कि वह अब और आगे न जा सकेगा और न ही बाहर नहीं निकल सकेगा । कोई भी ऐसे में घबराकर हार मान लेता परंतु आरुणेन्द्र आगे बढ़ता रहा । जाने कितने घंटे बीत गये , आखिर वह उस संकीर्ण स्थान से निकलकर एक ऐसे स्थान पर पहुँचा जहाँ वह खड़ा हो सकता था । यह एक अद्भुत नगरी थी । चारों और स्वर्ण के आभूषणों का अंबार लगा था । सोने के भंडार से पीला प्रकाश निकल कर इस स्थान को प्रकाशित कर रहा था । यहाँ चारों ओर सोने के अंबार थे । नगर में न कोई महल था न कोई मकान न पेड़ न पौधे न जीव न जन्तु बस जगह जगह सोने के ढेर लगे थे । आगे बढ़ने पर उसे एक सोने की रेत से बनी झील दिखाई दी मानो स्वर्ण नदी हो । तभी एक गर्जना सुनाई दी पूरी गुफा कांप उठी । 

“कौन है वहाँ ? “ सोने के रेत की नदी से निकलकर एक सुनहरा देव स्वरूप पुरुष जिसकी लंबाई ताड़ के पेड़ से कम न थी आरुणेन्द्र की ओर बढ़ा । उसकी त्वचा मानो सोने से बनी थी । उसकी हीरे सी आँखों में लाल रूबी की पुतलियां थीं । बाल भूरे मगर चमकदार थे । उसके शरीर से आभा निकल रही थी । वह स्वयं जीता जागता रत्न समान था । उसके शरीर से रेत के स्वर्ण कण गिर रहे थे और वह धीरे – धीरे आरुणेन्द्र की ओर बढ़ रहा था । आरुणेन्द्र उसकी आभा देखने में व्यस्त था । असुर के भाव उसे हिंसक नहीं दिख रहे थे पर फिर भी राजकुमार सावधान हो गया था । 

“प्रणाम देव मैं आरुणेन्द्र नाथ हूँ । मेरे पिता करुणेन्द्रनाथ चंपकपुर के राजा है । मेरा प्रणाम स्वीकार करें ।“ 

“तुच्छ मानव तू यहाँ किस उद्देश्य से आया है मैं जानता हूँ । परंतु मेरे सोने का एक कण भी तू अपने साथ ले गया तो वह कण ही तेरी मृत्यु का कारण बनेगा । सुन एक बार तेरे समान एक लालची मनुष्य यहाँ आया था मैंने दया दिखाकर उसके प्राण नहीं लिये और इस शर्त पर उसे जाने दिया कि वह मेरे स्वर्ण को हाथ नहीं लगाएगा । पर वह धूर्त चुपके एक सिक्का अपने साथ ले जाने लगा । वह सिक्का उसने अपने मुँह में छिपा रखा था । मैं जान गया और वही सिक्का अपनी शक्ति से उसके कंठ में फंसा दिया । उसका मृत शरीर इसी स्वर्ण रेत की नदी में कहीं दबा पड़ा है । तेरा भी वही हाल होने वाला है । “ देव ने राजकुमार को धमकी दी । 

“देव । आप मुझे गलत समझ रहे हैं । आपके स्वर्ण की मुझे कोई चाह नहीं है मेरे पास स्वयं मेरे राजमहल में स्वर्ण का एक बड़ा भंडार है । यद्यपि मेरा भंडार आपके स्वर्ण भंडार से बहुत कम है परंतु फिर भी उस छोटे से भंडार मैं कुछ लाया हूं जो आपको भेंट स्वरूप देना चाहता हूं ।“ यह कहकर राजकुमार ने अपने स्वर्ण आभूषण में से सबसे कीमती आभूषण उसे भेंट में दिया । 

“माता के श्राप के कारण मैं अब तभी स्वर्ण को हाथ लगा सकता हूँ जब कोई मुझे स्वेच्छा से दे । मैं तुमसे प्रसन्न हूँ । प्रायः लोग मेरे स्वर्ण भंडार से चोरी करने आते हैं पर तुम पहले हो जिसने मुझे स्वर्ण भेंट किया है। कहो क्या चाहते हो?” 

राजकुमार ने पूरी बात देव को बताई । 

“ओह तो यह बात है । इसमें मेरे हीरामन की कोई गलती नहीं वह तो स्वर्णाम्र का प्रेमी है । वह इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं खाता । हजार वर्षों बाद अब स्वर्णाम्र उसे मिला है तो वह प्रत्येक स्वर्णाम्र का स्वाद चखना चाहता है । यह स्वर्णाम्र सिर्फ कल्प वृक्ष पर उगता है । मनुष्य इसे खाकर सभी रोगों से मुक्त व चिरायु हो जाते हैं। हर हजार वर्ष में किसी न किसी को इस फल के दर्शन होते हैं और ईश्वर की इच्छा से वह इसका पेड़ लगाता है । ईश्वर की ही इच्छा से जब तक पेड़ पर स्वर्णाम्र फलते हैं वे हीरामन को ही मिलते हैं । कल्पवृक्ष के बीज से उगे पेड़ पर बस तीन ही स्वर्णाम्र निकलते हैं इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं। इससे पहले की कोई स्वर्णाम्र तक पहुंचे हीरामन उसे ले कर उड़ जाता है । प्रायः साधारण मनुष्य अज्ञानतावश स्वर्णाम्र की बात को भ्रम मानकर ऐसे ऋषिओं को कोसते हैं, उन्हें झूठा मानकर संतोष कर लेते हैं और स्वर्णाम्र के विषय में भूलकर पेड़ पर लगने वाले सामान्य आमों का स्वाद लेते हैं। स्वर्णआम्र के बीज यहीं मेरे पास इकट्ठे होते रहते हैं । ऋषि ने तुम्हें बीज बोने का और इससे और भी अधिक स्वर्णाम्र के पेड़ लगाने का लालच जरूर दिया पर वो बस हीरामन के भोजन का प्रबंध करने हेतु था । यह पेड़ किसी पवित्र स्थान पर उगता है और ऐसा स्थान ऋषि ने तुम्हारे महल में देखा तो वहीं इसे बोने का विचार किया । इस प्रकार वे अपनी इस जिम्मेदारी से मुक्त हुए । उन्हें आशा थी कि जब स्वर्णाम्र तुम लोगों को नहीं मिलेगा तो अधिक से अधिक तुम सब उन्हें कोसोगे, झूठा कहोगे और स्वर्णाम्र के विषय में भूल जाओगे, परंतु तुम तो बहुत ही ढीठ दिखाई देते हो । तुमने सोचा भी कैसे कि मैं तुम्हें हीरामन सौंप दूँगा ? तुम जानते भी हो कि वह मेरे लिए कितना मूल्यवान है । जो स्वर्णाम्र वह लेकर आया है उनके बीज से और वृक्ष नहीं लगाये जा सकते । वह बीज स्वयं में एक रत्न है । भला रत्नों से पेड़ उगते हैं कहीं । स्वर्णाम्र तो बस कल्पवृक्ष के ही बीज से उगते हैं। जाओ बालक लौट जाओ इसी में तुम्हारा हित है ।“ देव ने मुँह से सीटी बजाई तो हीरामन तोता कहीं से उड़ता हुआ आया और देव के कंधे पर बैठ गया । यह दृश्य ही अद्भुत था एक अद्भुत देव के कंधे पर बैठा एक अद्भुत तोता । 

“देव यदि वह फल ही इस दिव्य तोते का आहार है तो बहुत अच्छी बात है कि उसे वह मिल गया वह चाहे तो आगे उगने वाले सारे स्वर्णाम्र ले ले । परंतु यदि मैं हीरामन को लेकर अपने पिता के पास न गया तो उनकी दृष्टि में सदैव अयोग्य ही रह जाऊँगा । कृपया अपनी बात सिद्ध करने के लिए कुछ समय के लिए मुझे वह हीरामन तोता दे दीजिए ।“

“उस वृक्ष पर तीन स्वर्णाम्र उग चुके अब वह एक साधारण आम का पेड़ है। हीरामन का पेट भी अगले तीन हजार वर्षों के लिए भर गया । वह कम से कम तीन हजार वर्ष इस धरती पर बिना कुछ खाये पिये जी सकता है। और फिर स्वयं को सत्य सिद्ध करके कौन सा तुम जग जीत लोगे? भला अपने पिता को अपनी सच्चाई सिद्ध करना क्यों आवश्यक है ? उनसे कहो कि तुम चोर को ढूँढ नहीं सके बस। एक बार और लज्जित हो लो। कम से कम मेरे हाथों मरने से पिता के सामने लज्जित होना बुरा सौदा तो नहीं है।”

“देव मैं पिता की दृष्टि में सही होकर भी गलत कहलाने से आपके हाथों मरना अधिक पसंद करूंगा। आप यह नहीं समझ सकेंगे । मेरे दो बड़े भाई सदैव पिताजी की दृष्टि में अधिक योग्य रहे हैं । वे पिताजी की सही गलत हर बात पर उनकी प्रशंसा करते हैं और मैं सत्य वादी होने के कारण पहले ही उनकी दृष्टि में हीन हूँ । आज भी मैं अपने पिता से झूठ नहीं बोलूँगा । परंतु वे मेरी बात को न मानकर मुझे झूठा ही जानेंगे । वे सोचेंगें कि मैं स्वर्णाम्र की रक्षा न कर सका अतः बहाने बना रहा हूँ । मैं आपसे पुनः निवेदन करता हूँ कि मुझे इस लज्जा से बचा लीजिए । “


6)देव से अनुबंध

“देव इस बालक की बात मान लीजिए । मेरी आपसे यही प्रार्थना है कि मुझे इसके साथ जाने दीजिए मुझे इसकी कहानी रोचक लगी और यह वास्तव में बहुत गंभीर है वरना इतना कष्ट उठाकर यहां तक नहीं आता । इससे पूर्व तो कोई साधारण मनुष्य यहां नहीं आ सका । सिद्ध पुरुष ही यहां तक आ सके हैं। “ हीरामन तोते ने भी राजकुमार के पक्ष में बात की अब राजकुमार को पता चला कि यह तोता मनुष्य के समान बोल सकता है । 

“ओह तो यह भाषा का ज्ञान भी रखता है । “

“मैं संसार की सभी भाषाओं का ज्ञान रखता हूँ चाहे नई हो या प्राचीन सभी भाषाओं का उद्गम ऊँ से हुआ है । ब्रह्मांड की पहली ध्वनि जिससे सभी ध्वनियाँ उत्पन्न हुईं है वो ऊँ ही है । ईश्वर ने ऊँ का उच्चारण किया और ब्रह्मांड की रचना शुरु की । ईश्वर अनन्त काल से ऊँ का उच्चारण जारी रखे है जब वह उच्चारण बंद करेगा तो चारों ओर पुनः अंधकार का राज होगा । ऊं के साथ ही ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई है और ऊँ के साथ ही इसका अन्त होगा। ऊं से ही प्रारंभ होने का कारण ही भविष्य में जितनी भी भाषाएं विकसित होंगी वे सभी मैं बोल सकूँगा ।  “

“वाह कितनी सुंदर बात कही तुमने । अवश्य तुम ऐसा कर सकोगे । तो देव अब तो हीरामन भी मेरे साथ जाने को तैयार है । अब आप क्या कहते हैं?”

दानव ने ठंडी सांस छोड़ी “सुनो मानव मैं तुम्हें एक कथा सुनाता हूँ । बात लाखों वर्ष पूर्व की है तब जब का इतिहास पृथ्वी व मानव शरीर सभी जगहों से मिटा दिया गया है परंतु फिर भी वह इतिहास ईश्वर की इच्छा से घटित हुआ था । सतयुग में जब मनुष्य मेरे जितने ऊंचे हुआ करते थे और ईश्वर भक्ति में समय व्यतीत करते थे । उस समय मनुष्य हजारों वर्ष जीते व तपस्या करते थे तब धरती पर असुर आये वे धरती पर राज करना चाहते थे । मनुष्य अल्पायु थे जबकि असुर करोड़ों करोड़ वर्ष जीने वाले थे । असुर उस समय के मनुष्यों से भी कहीं ऊँचे, बलवान व दिव्य शक्तियों के स्वामी होते थे । फलतः असुरों ने सोचा कि वे अल्पायु और दुर्बल मनुष्यों पर राज कर सकते हैं। तब उन्होंने मनुष्यों पर मुख्यतः स्त्रियों पर अत्याचार किये । असुर लोक में स्त्रियां न थीं अतः वे स्त्रियों को हीन समझते थे । परंतु वे स्त्रियों के गर्भ में अपने पुत्र को जन्म देने को सदा इच्छुक रहते थे और नर संतान को अपना उत्तराधिकारी मानते थे । मादा संतान का गर्भ में ही पतन कर दिया जाता था।

मनुष्यों ने तब असुरों के अत्याचार से दुखी होकर ईश्वर को पुकारा उनकी पुकार पर एक दूसरे लोक में रहने वाली देवियाँ धरती पर आईं और यहाँ देवासुर संग्राम छिड़ गया । जहां असुर देवारि नामक आकाशगंगा के निशि व शनि नामक जुड़वां ग्रहों से आये थे वहीं देवियां देवगंगा नामक आकाशगंगा के अनुनाका नामक ग्रह से आईं थीं। उन्हीं मेंसे एक असुर देवी शर्मिष्ठा पर मोहित हो गया और अनेक प्रयासों के पश्चात् वह उनके हृदय में अपने लिये प्रेम जगाने में सफल रहा । उसने कठोर तपस्या की और देवी का नाम लेते हुए साधना करने लगा । वह सहस्त्रों वर्षों तक उनके नाम का जाप करता रहा । उसने देवी की स्तुति में अनेक श्लोक बनाए । अंततः देवी ने उसे दर्शन दिये व उसका प्रणय निवेदन स्वीकार किया । उन दोनों ने एक पुत्र को जन्म दिया । जो इस समय यहाँ तुम्हारे सम्मुख खड़ा है । मैं स्वर्ण पर मोहित होकर धरती से सारा स्वर्ण अपने लिए चुरा लेना चाहता था । देवियां इस स्वर्ण से चमत्कारी यंत्र व आयुध बनाया करती थीं । अतः देवी शर्मिष्ठा को मजबूरन मुझे यहाँ बंद करना पड़ा । यह हीरामन तोता मुझे बचपन में मेरी मां ने दिया था तब से यह मेरे साथ है । यह धरती से नहीं देवलोक से आया है। देव और असुर अपने पांचवे जन्मदिवस पर अपना वाहन चुनते हैं मैंने इसे चुना । मैं आज भी स्वर्ण के प्रति अपनी लालसा को रोक नहीं पाता । परंतु थोड़े से स्वर्ण के लिए मैं अपना प्रिय पक्षी तुम्हें नहीं दे सकता ।

तो इस प्रकार मुझे यहां कैद करने हेतु माता ने इस स्थान को अभिमंत्रित कर दिया । सुनो यदि तुम्हें यह तोता चाहिए तो तुम्हें मेरा एक काम करना होगा । जब मेरी माता मुझे यहाँ कैद कर रहीं थीं तो मेरे पिता ने उनका विरोध किया फलतः दोनों आपस में लड़ पड़े । अब कहना न होगा कि जीत किसकी हुई ? पुरुष का हित इसी में है कि वह अपनी पत्नी की जीत व अपनी हार स्वीकार कर ले । अन्यथा उसे तीन लोकों में कहीं भी शान्ति नहीं मिल सकेगी । तब से मेरे पिता एक विशाल चट्टान के भीतर कैद हैं । मां के प्रभाव से वह चट्टान जितनी तोड़ो उतनी बढ़ती जाती है । फलतः उसे तोड़ना है और पिताजी को बाहर निकालना है तो उसे एक ही वार से तोड़ना आवश्यक है । सुनो यहाँ से पश्चिम दिशा की ओर एक राज्य है जहाँ का राजा वर्षों से यह कार्य करवा रहा है परंतु आज तक सफल नहीं हुआ । इस चट्टान के कारण उसके राज्य का अत्यंत उपयोगी भूभाग निष्क्रिय पड़ा है। वहाँ न खेती की जा सकती है न कोई अन्य कार्य हो सकता है । तुम यदि उसका यह कार्य सिद्ध कर दो तो वह तुम्हें पुरस्कार देगा और मेरे पिता स्वतंत्र होकर अपने लोक वापस जा सकेंगे । तब मैं अपने तोते को कुछ समय के लिए तुम्हें दे सकता हूँ ।“


7)अनुत्तम खेती का उपचार

“हे देव मैं अवश्य ही यह दुष्कर कार्य करने का प्रयत्न करूँगा ।“ राजकुमार ने देव से आज्ञा ली और पश्चिम दिशा की ओर जाने हेतु गुफा से बाहर आ गया । उसने देव से कह तो दिया कि वह उसके पिता को स्वतंत्र करा देगा परंतु वह सोच में पड़ गया कि आखिर यह कार्य वह करेगा कैसे ? जितना तोड़ो उतनी ही बढ़ जाने वाली चट्टान को एक वार में कैसे तोड़ा जाए ? यह तो बहुत से लोग मिलकर भी नहीं कर सकेंगे । परंतु फिर भी उसने ईश्वर से प्रार्थना की । जिस प्रकार ईश्वर ने उसे यहाँ तक पहुँचाया उसी प्रकार आगे का मार्ग प्रशस्त करें । पश्चिम में कई दिनों की यात्रा के पश्चात राजकुमार एक नगर में पहुंचता है । नगर के चारों ओर घने जंगल हैं जो भयानक जंगली जीवों से भरे हैं । इनसे सुरक्षित रखने के लिए नगर को चारों ओर से ऊंची दीवारों से घेरा गया है । राजकुमार कुछ दिन इस छोटे से नगर में रहने के लिए जाता है। नगर की दशा बता रही थी कि वहाँ बहुत दुर्दिन चल रहे थे । चारों ओर दुबले कमजोर व कुपोषित मनुष्य दृष्टिगोचर हो रहे थे । वह आसरे के लिए एक नजदीकी झोपड़ी पर गया।


 “कोई हैं ?” राजकुमार ने द्वार पर पुकारा । 

“कौन ?” एक वृद्ध बाहर आया वह अत्यंत कमजोर था उसका पेट मानो उसकी पीठ से चिपका हुआ था । सारे शरीर से हड्डियाँ झांक रही थीं।

“बाबा कुछ देर विश्राम करना चाहता हूँ मुझे अभी बहुत दूर जाना है । यदि कुछ खाने को मिल जाता तो ?”

“बेटा हमारे राज्य में कई वर्षों से खेती बहुत कम फल रही है आओ जो कुछ रूखा सूखा है तुम भी उसी में खा लो ।“

राजकुमार भीतर गया तो पाया कि वहाँ पहले ही एक रोटी के चार टुकड़े हो चुके थे । और परिवार में वृद्ध माता पिता के अलावा दो युवा बेटे थे। 

“यह क्या आप इतने से भोजन से कैसे जी रहे हैं ? कृपया मुझे बताइये मैं आपकी किस प्रकार सहायता कर सकता हूं ? मैं चंपकपुर का राजकुमार आपको अपने समस्त आभूषण देने को इच्छुक हूँ कृपया इन्हें बेचकर भोजन खरीद लीजिए ।“

“पुत्र हमारे राज्य में पांच वर्षों से देवी का कोप पड़ रहा है । यहाँ खेतों में अन्न ही बहुत कम उग रहा है । समय पर खाद पानी सब करते हैं परंतु खेतों में प्रतिवर्ष अनाज की पैदावार घटती जा रही है । हम भोजन के लिए मांसाहार , जंगली फलों व थोड़े से अनाज पर निर्भर हैं। हमारा परिवार मांसाहार नहीं खाता हमारे राजा स्वयं शाकाहारी हैं अतः इस गांव के अधिकतर मनुष्य शाकाहार को महत्व देते हैं। सीमित अन्न के कारण एक व्यक्ति को दिन में दो बार बस इतना ही भोजन मिल पाता है कि वह मुश्किल से जीवन हेतु आवश्यक ऊर्जा प्राप्त कर सके । यह आदेश राजा की ओर से है । स्वयं हमारे महाराज इस नियम का पालन करते हैं । वे भी एक दिन उपवास व एक दिन भोजन कर रहे हैं । और हम गरीब तो एक बार भी भर पेट भोजन नहीं कर सकते । यदि ऐसा किया तो अन्न भंडार समाप्त होते देर न लगेगी । सबको नियम से अन्न राजा द्वारा प्रतिदिन प्रदान किया जाता है। हमें भी यही नियम मानना है आज हमें उपवास रखना था परंतु आज शायद तुम्हें आना था सो हमने थोड़ा भोजन बना ही लिया। यह भोजन ईश्वर की इच्छा से तुम्हारे ही लिए बना है । तुम यह खा लो और हमें आतिथ्य ऋण से मुक्त करो। हमारे राज्य में अतिथि को बिना भोजन कराये नहीं जाने दिया जाता । “ वृद्ध ने अनुरोध करके कहा ।

“ओह तो यह बात है । परंतु कोई तो कारण होगा कि इतने वर्षों से यहां खेती ठीक से नहीं हो रही । यदि वर्षा आदि समय पर हो रही है तो कहीं आपके बीज ही तो खराब नहीं हैं। जिनके कारण अगली फसल खराब हो जाया करती है । उत्तम बीजों का प्रयोग करने से फसल अच्छी होगी । “ राजकुमार ने सुझाया । 

“बेटा बात तो तुमने सही कही । यदि बीज ही खराब होंगे तो फसल कैसे ठीक होगी । मैं तुम्हारी बात से सहमत हूं। कदाचित यही कारण हो कि हमारा राज्य इतनी त्रासदी झेल रहा है । यही सोचकर राजा ने कुछ सिपाहियों को दूसरे राज्यों में भेजा और वहां से बीज मंगवाये पर फिर भी फसल कुछ खास अच्छी नहीं हुई । विदेशी बीजों के कारण ही हम जीवित हैं वरना शाकाहारी होने के दंड स्वरूप तो हमें मर जाना ही श्रेयस्कर था । जो लोग मांसाहारी हैं वे तो जंगल से जानवरों का शिकार करके अपनी भूख शांत कर लेते हैं। कई लोगों ने तो मजबूरी में मांसाहार अपना लिया । परंतु हमारे राजा ने स्वयं एक दिन भोजन करना और एक दिन भूखा रहना चुना है तो बताओ हम प्रजा होकर कैसे भरपेट भोजन कर सकते हैं। “

तभी राजकुमार को ऋषि द्वारा दिये गये गेहूँ के बीज याद आये । “ आपका देशप्रेम व राजा के प्रति आपका समर्पण देख कर मैं अभिभूत हूं। बाबा यह लीजिए ये गेहूँ के चमत्कारी बीज हैं । इन्हें खेतों में बोने का प्रबंध कीजिए । यह मुझे एक साधु ने दिये हैं जो उत्तम बीज बनाने पर शोध कार्य कर रहे हैं। शायद उन्हें आभास था कि मुझे इनकी आवश्यकता पड़ने वाली है इसीलिए उन्होंने मुझे यह बीज दिये । इन बीजों से पैदावार अच्छी होगी और अगली गेहूँ की नस्ल भी सुधर जाएगी। “ 

“पुत्र यह बीज तुम स्वयं चलकर राजा को सौंप देना वही इन्हें बोने का प्रबंध करेंगे। अभी तो चलो पहले कुछ खा लो । मैंने तुम्हें अपनी समस्याओं में इतना उलझा दिया कि तुम अपनी थकान भूलकर हमारे दुख में दुखी हो रहे हो ।“

राजकुमार ने बहुत आग्रह पर एक रोटी का टुकड़ा खा लिया और तुरंत वृद्ध के साथ राजा के पास पहुँचा । राजा किंचितमान स्वयं बहुत कमजोर व रोगी प्रतीत हो रहे थे । राजकुमार उनका त्याग देखकर अभिभूत हो गया । यदि इनके स्थान पर उसके पिता होते तो कभी प्रजा के लिए अपने भोजन का त्याग न करते । उसके पिता और भाइयों को तो मांसाहार बहुत भाता था। जबकि आरुणेन्द्र विभिन्न जीवों के प्रति प्रेम रखने के कारण बचपन से ही शाकाहारी था। आरुणेन्द्र ने राजा को बताया कि वह उनके खेतों के लिए चमत्कारी बीज लाया है जिनकी सहायता से अच्छी फसल उगाई जा सकती है । राजा ने पहले तो उसका विश्वास न किया पर जब उसने अपनी यात्रा का पूरा उद्देश्य व अपना पूरा परिचय दिया तो राजा ने उसकी बात मान ली । एक बड़े खाली पड़े खेत में वे चमत्कारी बीज बोये गये । राजकुमार फसल कटने तक वहीं रुका रहा व जितना हो सका गाँव वालों की सहायता करता रहा । इस बार फसल पहले से कहीं जल्दी पक कर तैयार हो गयी और चारों ओर खेत गेहूँ की बालियों से लहरा रहे थे । ये बीज अत्यंत उत्तम किस्म के थे जिनसे भविष्य में भी अच्छी फसल उगा सकने की आशा थी । नगर में उत्साह भर गया । जब राजकुमार नगर छोड़कर जाने को हुआ तो राजा अंतिम भेंट के लिए राजा के पास पहुंचा ।

“पुत्र तुमने कठिन समय में हमारे राज्य की बड़ी सहायता की । मैं तुम्हारे इस उपकार के बदले तुम्हें कुछ उपहार देना चाहता हूँ। “

“महाराज मैंने जो किया वह तो मेरा कर्तव्य था । इसके बदले मुझे किसी उपहार की आवश्यकता नहीं । “

“नहीं पुत्र मैं यह तुम्हारा उपकार उतारने के लिए नहीं बल्कि इस आशा से दे रहा हूँ कि कदाचित अपनी यात्रा में तुम्हें इसकी आवश्यकता पड़े । यह हमारे परिवार की खानदानी निशानी है जिसे कई पीढ़ियों से संभाल कर रखा गया है । “ राजा ने एक सूखा हुआ पुष्प राजकुमार को दिया जो देखने में स्त्री मुख के समान लगता था। इसे देखकर राजकुमार चौंका उसने ऐसा विचित्र पुष्प कभी नहीं देखा था। 

“मैं जानता हूँ तुम क्या सोच रहे हो? यही न कि एक राजपरिवार की पुश्तैनी निशानी हीरे जवाहरातों से बने आभूषण होने चाहिए पर यह तो सूखा हुआ पुष्प है । परंतु यह कोई साधारण पुष्प नहीं, यह पुष्प चमत्कारी है इसे देवी के आँसू और इसके वृक्ष को नेत्रनीरपर्णी कहते हैं। यह चमत्कारी पुष्प किसी के भी दुख व पीड़ा को हर लेता है । इसका सेवन करने से असाध्य से असाध्य रोग का कष्ट भी दूर हो जाता हैं। याद रहे यह रोग दूर नहीं करता बल्कि रोग का कष्ट हर लेता है । जाने क्यों मुझे आभास हो रहा है कि तुम्हें इसकी आवश्यकता पड़ने वाली है । “

“यह तो बहुत ही बड़ी बात है महाराज कि आप मुझे वो वस्तु भेंट कर रहें हैं जो आपके पूर्वजों की निशानी है । परंतु यह पुष्प कहाँ पाया जाता है और आपके परिवार को कैसे मिला ? यह जानने को मैं इच्छुक हूँ । “


8)अंधेर नगरी

“सुनो पुत्र मेरे पूर्वज तब इस छोटे से गांव के सरपंच हुआ करते थे। तब यह राज्य एक छोटी सी मानव बस्ती के रूप में था और इसके चारों ओर यह विशाल दीवार नहीं थी। मेरे परदादा को यात्रा करने में बहुत आनन्द आता था। एक बार वे मार्ग भटक गये और एक निर्जन नगर में प्रवेश कर गये जिसका नाम भी वे नहीं जानते थे । उन्होंने वह नगर पहले कभी नहीं देखा था। यहाँ प्रवेश करते ही उन्हें विचित्र सा अहसास हुआ । ऐसा जैसे संसार में दुख व पीड़ा नाम की कोई चीज नहीं वे स्वयं को बहुत सुखी व शांत महसूर कर रहे थे । जाने वह उस नगर के सम्मोहन में फँसे कितने दिनों तक वहाँ फंसे रहे उन्हें दिन या रात का कोई भान ही न था। आखिर एक दिन उन्होंने एक पौधे पर एक सुंदर पुष्प खिला देखा जिसका रूप किसी स्त्री के मुख समान था और उस पुष्प से जल की बूँदें कुछ कुछ समय में टपका करती थीं । ऐसा लगता मानो स्त्री रो रही हो । मेरे परदादा ने उस पुष्प को सूंघा तो अचानक उन्हें तेज दर्द व पीड़ा का अहसास हुआ । उन्होंने देखा कि उनके शरीर पर कई घाव थे और उन्हें बहुत ही जोर से भूख व प्यास भी लगी थी । उन्होंने नगर में स्थित तालाब के जल से घाव धोकर उस पर जड़ी बूटी का लेप लगाया व फल तोड़कर खाये । उन्हें याद आया कि वे कई दिन व रात से यहां रह रहे हैं परंतु इस बीच उन्होंने न कुछ खाया था न पिया था । वो समझ गये कि ये सब इस नगर के सम्मोहन के कारण था जो फूल सूंघते ही टूट गया ।


पर यह सम्मोहन कुछ ही समय में उनपर पुनः हावी हो गया क्योंकि अभी भी उन्होंने नगर नहीं छोड़ा था । इसी प्रकार पुनः कई दिन बीत गये । घूमते घूमते वे उस पुष्प के पास पहुंचे और उसके आकर्षण में बंधे परदादा जी ने उसे फिर सूंघा । पुनः वह सम्मोहन कुछ देर के लिए टूटा और वे दर्द व भूख प्यास महसूस करने लगे । उन्हें पिछली सारी बातें याद आ गयीं जैसे उन्हें इस नगर की माया का पता चला वैसे ही वे उसे छोड़कर बाहर भागे ।


 वे जंगल में बहुत दूर तक भागते रहे आखिर एक नदी तट पर पहुंचकर वे रुक गये और जी भरकर जल पिया । पेड़ों पर कन्दमूल फल लगे थे वे खाये । और जब उन्हें लगा कि अब वो उस नगर के सम्मोहन में नहीं फंसेंगे तो संतोष की सांस ली और कुछ देर विश्राम करने के बाद जंगल से बाहर निकलने का मार्ग तलाशने लगे । रात गहराने लगी वे आराम करने की सोच ही रहे थे कि तभी उन्हें एक सिंह दिख गया । 

सिंह ने उन पर आक्रमण कर दिया वे उससे बचने के लिए वो पलट कर भागे । सिंह कभी भी उन्हें पकड़ सकता था । पता नहीं मेरे परदादा जी में इतनी शक्ति कहां से आ गयी थी कि वे इतनी तेज दौड़ सके कि वह सिंह बहुत समीप पहुंच गया परंतु फिर भी अभी तक उन्हें पकड़ न सका। तभी उनकी दृष्टि एक नगर के बड़े से द्वार पर पड़ी उन्होंने सोचा कि यदि वे द्वार पार कर गये तो कोई न कोई द्वारपाल होगा ही जो उन्हें सिंह से बचा लेगा । यही सोच कर वो नगर में प्रवेश कर गये और इधर-उधर देखा पर वहां कोई भी द्वारपाल न था । वे डर गये और पलटकर सिंह की ओर देखा वह सिंह किसी भी समय नगर की सीमा के भीतर आ जाएगा और उन्हें खा जाएगा। वे सोच ही रहे थे कि अचानक सिंह नगर की सीमा के बाहर ही रुक गया। सिंह ने उनका नगर में पीछा नहीं किया और वापस लौट गया । पहले तो मेरे पूर्वज ने सोचा यह संयोग वश हुआ है वह सिंह कदाचित मनुष्यों के डर से चला गया पर जब वे नगर में आगे बढ़े तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गयी । क्योंकि वे पुनः उसी नगर में वापस आ चुके थे । इसका अर्थ यह था कि जंगल के जीव जन्तु भी इस नगर में प्रवेश से डरते थे। हां तभी तो नगर का द्वार खुला होने के बाद भी वहां कोई जानवर नहीं पाया जाता।

 नगर स्वादिष्ट फलों से सजा हुआ था वहां की भूमि अत्यंत उपजाऊ थी तथा वहां अनेक औषधीय पौधे स्वतः ही उगे थे । फिर भी वहां कोई नहीं रहता था । मेर परदादा उस नगर के सम्मोहन में पुनः बंध गये और । एक दिन पुनः उन्होंने पुष्प सूँघा तो उनकी तंद्रा भंग हुई और उन्हें पिछली बातें भी पुनः याद आ गयीं । उन्हें जोर से भूख महसूस हुई और शरीर पीड़ा से कराह उठा । उनके शरीर पर पुनः अनेक घाव थे जिनपर मक्खियाँ भिनभिना रहीं थीं । उन्होंने अन्न जल ग्रहण करके नगर के बाहर को दौड़ लगा दी । इस बार वे जंगली जानवरों से निपटने के लिए अपने साथ एक नुकीला लकड़ी का तना भी ले गये परंतु इस बार जंगली जानवर नहीं बल्कि दस्यु दल ने उन्हें पकड़ लिया । ये डाकू जंगल में छुपकर राहगीरों को लूटा करते थे । 


मेरे परदादा जी ने उनकी कैद में बहुत कष्ट उठाये । वे उनका भोजन पकाते वस्त्र धोते और उनका सामान ढोया करते । वे मेरे परदादा जी को भरपेट भोजन भी न देते और तरह तरह की यातनाएं दिया करते थे । परदादा जी ने अपनी पुस्तक में लिखा था कि उनके भयानक पीड़ादायक दंडों से घबराकर कभी कभी परदादा जी सोचते कि काश वो उस नगर से बाहर ही न आये होते । किसी प्रकार एक दिन अवसर पाकर वे वहां से भाग गये । रात का समय था सभी डाकू नशे में चूर निद्रामग्न थे और गलती से वे परदादा जी को बांधना भूल गये थे । जैसे ही परदादा जी को लगा कि सारे डाकू सो चुके हैं वे वहां से भाग निकले । कुछ दूर जाने पर उन्हें अपने पीछे पदचाप सुनाई दिया । डाकुओं को उनके भागने की सूचना मिल चुकी थी और वे कई गुटों में बंटकर उन्हें पकड़ने आ चुके थे। मेरे परदादा जी जान लगाकर भागे । डाकू दायें से आते तो वे बायें भागते और बायें से आते तो वे दायें भागते । इस प्रकार भागते हुए बेध्यानी में पुनः उसी नगर में प्रवेश कर गये । वे डाकू भी सिंह के समान ही नगर के बाहर से लौट गये । तब दादाजी को आभास हुआ कि ये मात्र संयोग नहीं था कि सिंह ने और फिर डाकुओं ने उन्हें नगर की ओर खदेड़ा बल्कि यह उस नगर के श्राप का ही परिणाम था।

मेरे परदादा को तब ज्ञात हुआ कि वे इस श्रापित नगर से बंध चुके हैं। और इस सबका कहीं न कही उस पुष्प से कुछ लेना देना था। न जाने वो कैसा पुष्प था जो कभी मुरझाता न था न झड़ता था बल्कि सदैव खिला रहता था । उस पौधे पर वह एकमात्र पुष्प खिला था । मेरे परदादा को लगा यही पुष्प सारे फसाद की जड़ है अतः उन्होंने पौधे पर से पुष्प को तोड़कर फेंक दिया पर यह क्या अगले ही क्षण वहां नया पुष्प उग आया था । जो पुष्प मेरे पूर्वज ने तोड़ा था वो विलुप्त हो चुका था। उन्होंने पेड़ उखाड़ने का प्रयास किया पर विफल रहे । परदादा जी तबतक पुनः सम्मोहित हो चुके थे। कई दिनों के पश्चात मेरे पूर्वज इस प्रकार तीसरी बार सम्मोहन से बाहर निकले और नगर छोड़ने का प्रयास किया परंतु एक भेड़ियों के झुंड द्वारा वे वापस नगर में खदेड़ दिये गये । इस बार वे सीधे उस पौधे के पास गये और समझ गये कि यदि उन्हें इस नगर में जीना है तो हर कुछ समय पर उस पुष्प को सूंघना पड़ेगा ताकि सम्मोहन टूटा रहे । वे हर कुछ समय पर पुष्प को सूंघते ताकि उन्हें दर्द व भूख प्यास का अहसास होता रहे । न वो सोते न विश्राम करते बस उस पुष्प को निहारते रहते । रात्रि में जागते रहने की उन्होंने यह युक्ति लगाई कि अपनी चोटी को एक डोरी की सहायता से पेड़ की डाल से बांध दिया करते थे। जैसे ही वो नींद से लुढ़कने लगते उनके बाल खिंच जाते और वे सतर्क हो जाते। 


फिर एक दिन चमत्कार हुआ। संध्या का समय था दादाजी सदा की तरह उस पुष्प के समीप बैठे उसे निहार रहे थे तभी वह पुष्प स्वयं डाली से नीचे गिर गया और मेरे पूर्वज के देखते ही देखते वो पौधा विलुप्त हो गया । पर वह पुष्प वहीं पड़ा था । मेरे परदादा ने उसे उठाया और सोचा कि अब तो पुष्प टूट चुका है शीघ्र ही नष्ट हो जाएगा और मिट्टी में मिलकर मिट्टी हो जाएगा । तब वे कभी भी सम्मोहन से बाहर नहीं निकल सकेंगे और इसी नगर में उनके प्राण पखेरू उड़ जाएंगे। यही सोचते हुए वे उस पुष्प को हाथ में लिए बहुत समय तक रोते रहे । रोते रोते उन्हें कब गहरी नींद आ गयी पता ही नहीं चला । जब वे उठे तो सुबह हो चुकी थी और उन्हें जोर से भूख लगी थी । उन्होंने फल खाया पानी पिया । और पुनः उस पौधे के पास पहुंचे पर पौधा वहां न था । उन्हें याद आया कि पिछली शाम को ही वह पौधा विलुप्त हो चुका था । तो क्या ये पौधा ही सम्मोहन का कारण था ? यदी ऐसा था तो पुष्प सूंघने पर सम्मोहन क्यों टूट जाता था ? अनेक प्रश्न थे जो उन्हें परेशान कर रहे थे । परदादा जी के अनुसार वे उस पौधे को उखाड़ने का प्रयास भी कर चुके थे वह वह मजबूती से भूमि में गड़ा था। अचानक उसका नष्ट होना और नगर का सम्मोहन खत्म हो जाना एक सुखद चमत्कार था जिसके लिए परदादा जी ने ईश्वर को धन्यवाद दिया । वह पुष्प वहीं भूमि पर पड़ा था । मेरे पूर्वज ने उसे उठाया व नगर से बाहर आ गये । इस बार न उन्हें शेर न भेड़िये न डाकू मिले बल्कि एक संयासी से भेंट हुई । ये देखकर वे समझ गये कि वे अब उस नगर के सम्मोहन से बाहर आ चुके हैं पर कैसे ? अनेक सवाल लिए वे संयासी के समीप पहुंचे और पुष्प उनके चरणों में रखकर उन्हें प्रणाम किया । 

9)श्रापित नगर की कथा


जब संयासी ने अपनी आँखें खोलीं तो मेरे पूर्वज ने उन्हें अपने साथ घटित हुई घटना बताई । तब संयासी ने बताया कि यह पुष्प देवी के आँसू कहलाता है और और जिस नगरी में वे फंस गये थे वह अंधेर नगरी के नाम से प्रसिद्ध है । ऋषि के अनुसार एक लाख वर्ष पूर्व उस नगर के लोगों ने एक बार बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया था जिसमें अनेक देवियों का आवाहन किया गया व उनका आशीर्वाद प्राप्त किया गया । तभी वहाँ मंत्रों से सम्मोहित होकर दुख , विषाद व पीड़ा की देवी यंत्रणा आ गयीं । लोग देवी को देखकर डर गये क्योंकि देवी अपने भक्तों को उपहार में दुख व पीड़ा देती थीं और मनुष्य दुख व पीड़ा नहीं चाहते थे । जब देवी को आभास हुआ कि वे वहाँ अवांछनीय अतिथि हैं तो वे अत्यंत दुखी हुई। धरती को असुरों से मुक्त कराने में देवी ने अपना महान योगदान दिया था और आज ये मनुष्य उनके उपकार को भूल चुके हैं । वे देवी से भय खाते हैं तथा उनका सानिध्य नहीं चाहते । देवी की आँखों से कुछ आँसू की बूँदें धरती पर गिरीं इन्हीं से नेत्रनीरपर्णी नामक पौधा उगा । देवी उस नगर से दुखी होकर सदा के लिए चली गयीं । 

जाते जाते उन्होंने नगरवासियों से कहा –“ यदि तुम सबकी यही इच्छा है कि तुम्हारे जीवन में कोई दुख व पीड़ा न रहे तो मैं सदा के लिए यहां से चली जाती हूं और अपने साथ यहां का सारा दुख व पीड़ा भी ले जाती हूं। फिर भी यदि किसी को पीड़ा का महत्व जानना हो तो नेत्रनीरपर्णी तुम्हारी सहायता करे ।“

 देवी के इतना कहते ही यह पौधा उन पुष्पों से भर गया जो देवी के आँसू कहलाये। फलतः नगर वासियों को दुख व पीड़ा का कोई आभास न रहा । वे जैसे थे उसी दशा में खुश थे । जब तक तुम्हें पीड़ा न हो तुम अपने घाव का उपचार क्यों करोगे ? जब तक भूख तुम्हें दुख न दे तुम भोजन क्यों ग्रहण करोगे ? अतः वहाँ के लोग अत्यंत सुखपूर्वक रहते हुए आखिर मृत्यु को प्राप्त हुए । उस नगर का सम्मोहन कुछ समय के लिए इस पुष्प को सूँघने कारण टूट जाता था । जो नगर वासी सम्मोहन टूटते ही बाहर जाने का प्रयास करते वे इसी प्रकार वापस आ जाते । यद्यपि यह पुष्प दुर्लभ है तथापि यह शापित भी है इसका सेवन करने वाला भूख, प्यास, नींद, दर्द का अहसास खो देगा ।

 हजारों वर्ष पूर्व राजा विक्रम ने उस अधूरे यज्ञ को पूरा कर देवी यंत्रणा का आवाहन किया और देवी ने प्रसन्न होकर उनसे उपहार मांगने को कहा । विक्रम ने उपहार स्वरूप इस नगर के श्राप का अंत मांगा । देवी ने कहा-“ तथास्तु जिस दिन इस पौधे से आखिरी पुष्प स्वतः ही गिर जाएगा यह पौधा और श्राप दोनों विलुप्त हो जाएंगे । आज के बाद नये पुष्प इस पौधे पर नहीं खिल सकेंगे परंतु कोई भी मनुष्य इन्हें स्वयं नष्ट भी नहीं कर पायेगा ।“

 विक्रमादित्य ने देवी को धन्यवाद दिया और एक पुष्प जो उसी समय गिरा था उसे अपने साथ ले गये । इसके पुष्प सैकड़ों वर्षों तक खिले रह सकते थे । इस शापित नगर के विषय में जो नहीं जानते थे वे भूले भटके यहां फंस जाते थे एक बार तुम नगर में प्रवेश करने से यहां के नागरिक हो जाते हो और देवी का श्राप तुमपर सवार हो जाता है । तुम सौभाग्यशाली हो कि आज ही इस श्राप का अंत होना था पौधे ने स्वतः ही अपने अंतिम पुष्प का त्याग कर दिया । वरना जीवित रहते तुम्हारा वहां से निकलना असंभव था । देवी ने जाते-जाते नगर वासियों को यह उपहार दिया कि वे चाहें तो अभी भी दुख को चुन सकते थे, वे इस पुष्प को सूंघकर दुख का महत्व जान तो जाते थे पर उस नगर के लोगों ने दुख के साथ जीने की अपेक्षा सुख से मरने को महत्व दिया । इस प्रकार अनेक कष्ट उठाकर कई माह के पश्चात् मेरे परदादा घर लौटे तो उन्होंने अपना अनुभव एक पुस्तक में लिखा जो हमारी पारिवारिक इतिहास की पहली पुस्तक है। यह पुष्प अत्यंत चमत्कारी परंतु शापित है । इसका सेवन करने वाला दुख, पीड़ा व अवसाद से मुक्त हो जाता है । यदि उसे चोट भी लगी तो पीड़ा न होगी फलतः वह उपचार नहीं करेगा, यदि उसे भूख लगी व खाने को कुछ न रहा तो भी वह भोजन की तलाश न करेगा क्योंकि उसे भूख की पीड़ा न होगी, यदि वह रोगी हुआ तो भी स्वयं का उपचार नहीं करेगा ।“ “

“ओह यह तो भयानक है । यह तो बहुत दुखद कहानी है परंतु यह अच्छा रहा कि श्राप समाप्त हो गया। धन्यवाद महाराज आशा है यह पुष्प मार्ग में मेरे काम आएगा । जैसे संयासी के दिये चमत्कारी बीजों ने इस राज्य की समस्या दूर की वैसे ही यह पुष्प किसी की समस्या सुलझाएगा। “ राजकुमार ने अपनी यात्रा प्रारंभ की । 

10)पीड़ा का अंत

चलते चलते राजकुमार एक छोटे से गाँव में पहुँचा । इस गाँव में वह एक घर में शरण मांगने पहुँचा और द्वार खटखटाया कुछ देर के बाद एक व्यक्ति जो करीब चालीस पैंतालीस वर्ष का था उसने द्वार खोला । राजकुमार को देखकर उसने अचानक चारों ओर दृष्टि घुमाई और धीरे से उसे भीतर बुला लिया। मानों किसी से भय खा रहा हो ।

“अजनबी तुम कौन हो और यहाँ क्यों आये हो ?” वह चिंतित दिख रहा था। 

राजकुमार ने अपनी यात्रा व आने का अपना कारण स्पष्ट कर दिया । इस बीच उसने घर पर दृष्टि डाला तो पता चला यह एक लोहार का घर था । यहाँ लोहे के कई औजार रखे थे । परिवार में मुखिया उसकी पत्नी व उसके माता पिता थे।

“ओह आओ कुछ खा पी लो और आराम कर लो । “ मुखिया की पत्नी ने सबके लिए भोजन परोस दिया । तभी द्वार पर किसी ने खटखटाया । मुखिया व उसका परिवार परेशानी से एक दूसरे का मुँह ताकने लगे मानो कोई अनहोनी हो गयी हो । द्वार खोलकर मुखिया द्वार पर ही खड़ा रहा कुछ इस प्रकार कि आगंतुक को भीतर का दृष्ट दिखाई न दे ।

“शंभूशन तेरे घर क्या कोई मेहमान आया है ? या कोई अजनबी है ?”

“न काका ये तो मेरा ममेरा भाई है । बड़े सालों बाद इधर से गुजरना हुआ तो मिलने आया है ।“

“फिर ठीक है । मैंने सोचा अजनबी हो तो कम से कम आज रात हम चैन से सो सकेंगे ।“

मुखिया ने द्वार बंद किया तो राजकुमार के चेहरे पर उसकी दृष्टि गयी । वह आश्चर्य से उसकी ओर देख रहा था कि लोहार ने उसे अपना ममेरा भाई क्यों बताया ।

“पथिक हमारे गांव में एक विशाल राक्षस कहीं से चला आया है । वह प्रत्येक रात्रि पीड़ा से कराहता है और तबतक शांत नहीं होता जबतक कि उसे एक मनुष्य खाने को न मिले । उसका क्रंदन इतना प्राणघातक होता है कि प्रायः वृद्ध लोग हृदयाघात से मर जाते हैं तथा बच्चे बहरे हो जाते हैं। जवान उसका क्रंदन सुनकर आक्रामक हो एक दूसरे को ही हानि पहुंचाने लगते है । उसे रोकने के लिए हमें उसे प्रतिदिन एक बलि देनी पड़ती है । एक दिन वह इस गांव में आया और हमें बताया कि उसे भूख लगने पर पेट में तीव्र पीड़ा होती है जो भोजन से ही शांत होती है । इसलिये उसने हमसे कहा कि हम प्रतिदिन उसके भोजन की व्यवस्था कर दें अन्यथा हम बहुत पछतायेंगे। पहले तो हमने उसे कोई महत्व नहीं दिया पर जब वह पीड़ा से क्रंदन करने लगा तो अचानक बुजुर्ग गिरने लगे बच्चे बहरे हो गये और जवान आक्रामक होकर एक दूसरे को ही मारने लगे । तब मुखिया जी ने सर्वसम्मति से एक बलि उसे दी। यह नियम प्रतिदिन माना जाता है । एक व्यक्ति उसे भोजन के रूप में भेज दिया जाता है ताकि उसे भूख की पीड़ा न सहनी पड़े। यदि इस गांव में कोई अजनबी आता है तो गांव वाले पहले उसी की बलि देते हैं। अन्यथा प्रतिरात्रि एक परिवार से एक व्यक्ति की बलि दी जाती है । आज रोगन चाचा के परिवार की बारी थी इसीलिए वो प्रसन्नता पूर्वक पता करने के लिए आये थे कि कहीं कोई अजनबी हुआ तो वो एक और दिवस जी सकेंगे । “

“ओह तो यह बात है । आपने मेरे कारण अपने गांववालों व पहचान वालों से झूठ बोला यह मुझे बहुत परेशान कर रहा है । कृपया गांव में कहलवा दीजिए कि आज मैं राक्षस का भोजन बनने जाऊँगा । “

“पर तुम मेरे अतिथि हो और अतिथि तो भगवान का रूप होता है ।“

“तो इसे भगवान की आज्ञा समझ लीजिए । मेरा विश्वास कीजिए । “ लोहार कुछ जवाब न दे सका और उसने गांव में ये कहलवा दिया कि आज दूसरे गांव से आया उसका ममेरा भाई राक्षस को अपने जीवन की बलि देगा । यह सुनकर कुछ लोग खुश थे तो कुछ आरुणेन्द्र के लिये दुखी हो रहे थे।

रात्रि होने से पूर्व राजकुमार उस राक्षस के पास पहुँच गया ।

“आहा आज तो बड़ी जल्दी भोजन भेज दिया गांव वालों ने ।“

“राक्षसराज प्रणाम मैं दूसरे गांव से आया हूँ आपकी पीड़ा के विषय में सुनकर मैं द्रवित हो उठा । सो आपके लिए यह औषधि लाया हूँ जिसे खाते ही आपका कष्ट दूर हो जाएगा । “ आरुणेन्द्र ने राक्षस को अपने वस्त्रों में छुपाकर रखा गया सूखा हुआ देवी के आँसू नामक वह पुष्प दिखाया।

“मैं अनेकोनेक गांवों में रहा हूँ और औषधियाँ भी खाईँ है परंतु यह पीड़ा नहीं गयी । सुन मैं तुझे यह कथा सुनाता हूं । हमारे परिवार में कई पीढ़ियों से मानव मांस खाना मना था । यद्यपि हम राक्षस परिवार से हैं जहां मानव मांस खाना एक परम्पार रही है पर फिर भी हमारा परिवार मानव मांस खाने से बचता रहा है । इसका कारण कदाचित यह है कि मेरे किसी पूर्वज ने मानव स्त्रि से विवाह कर उससे अपनी संतान प्राप्त की और इसी प्रकार हमारा वंश आगे बढ़ा । परंतु मुझे मानव मांस की गंध बहुत लुभाती थी। जब तक मैं अपने माता पिता के साथ रहा तबतक उन्होंने मुझे मानव मांस का आनन्द लेने न दिया परंतु उनकी मृत्यु के बाद मैं स्वतंत्र था । अतः मैंने मानव मांस खाने निर्णय लिया । और एक दिन जंगल में भटक गये एक पथिक को अपना ग्रास बनाया । बस फिर क्या था मुझे मानव मांस का ऐसा नशा चढ़ा कि मैंने मनुष्यों का शिकार प्रारंभ कर दिया । एक दिन मैं जंगल में भोजन की तलाश में भटक रहा था तभी मुझे एक पेड़ के नीचे ध्यानमग्न बैठा एक ऋषि दिखाई दिया । उसे देखकर मेरे मुंह में पानी आ गया । मैंने उस तपस्यारत ऋषि को उठाया और अपना ग्रास बना लिया । ऋषि ने मेरे मुख में प्रवेश करते समय मुझे श्राप दिया कि आज के बाद भूख मुझे असह्य पीड़ा देगी और मैं तब तक भोजन नहीं कर सकूंगा जबतक कि कोई मुझे स्वयं को समर्पित न करे । मुझे तब अपनी भूल का अहसास हुआ । मैंने ऋषि से क्षमा मांगी तो ऋषि मेरे पेट के भीतर से ही कहा तुम्हारा क्रंदन किसी न किसी को विवश कर देगा कि वह तुम्हारे पास मृत्यु की कामना लेकर आएगा । और तबसे मैं गांव गांव जाता हूं और लोगों से अपने इस रोग का इलाज पूछता हूं पर कोई वैद्य या ज्योतिषी इसका इलाज न कर सका । जब लोग मेरे क्रंदन से घबराकर मेरे पास स्वयं मृत्यु की इच्छा लेकर आते हैं तभी मेरी भूख मिटती है ।“

“ आपकी कथा बहुत ही विचित्र है । मैं समझ सकता हूं कि भारत के अनेक योग्य वैद्य आपके रोग का उपचार नहीं कर सके होंगे परंतु फिर भी चाहता हूं कि आप एक मौका मुझे भी दीजिए । मेरा विश्वास कीजिए मैं आपके इस रोग का उपचार जानता हूं। मेरे पास एक जड़ी बूटी है जो आपका यह रोग दूर कर देगी। “

राक्षस को राजकुमार पर भरोसा न था पर अचानक वह दर्द से चीखने लगा राजकुमार ने एक हाथ से वह पुष्प राक्षस की ओर बढ़ाया और दूसरे हाथ से एक कान बंद कर उसके क्रंदन से विचलित हो तड़पता रहा । राजकुमार ने अभी तक स्वयं को राक्षस के सामने समर्पित नहीं किया था अतः वह उसे खा नहीं सकता था । कोई मार्ग न देख उसने राजकुमार के बढ़े हुए हाथ पर रखा वह पुष्प खा लिया । पुष्प ने तुरंत असर दिखाया और राक्षस के मुख पर मुस्कान आ गयी ।

11)राक्षस की छेनी हथौड़ी

“वाह इसे खाकर तो लग रहा है मेरे ऊपर से कितना बड़ा बोझ उतर गया तुमने मेरी सबसे विकट समस्या का हल दिया है मैं तुमसे अत्यंन्त प्रसन्न हूँ और तुम्हें एक उपहार देने को इच्छुक हूं। लो यह छेनी हथौड़ी उपहार में लो यह चमत्कारी है छेनी हथौड़ी है। इसका प्रयोग करते समय यह मंत्र बोलना “भंगम् भग्नं कर्तुं” ।यह पर्वत को भी एक वार से तोड़ सकती है । मुझे ऐसा लग रहा है कि मेरा पेट भर गया है । मैं तुम्हें अपने दर्द का उपचार करने के लिए मुक्त करता हूं तुम स्वतंत्र हो । “


 “राक्षसराज मैं आपका आभारी हूं परंतु इस छेनी हथौड़ी की क्या कथा है कहिए मैं जानने को अत्यंत इच्छुक हूं कि यह आपको कहां से मिली ?”

“सुनों पुत्र लाखों वर्ष पूर्व धरती पर कई असुर राज करने के उद्देश्य से आये और उन्होंने मनुष्यों पर बहुत अत्याचार किये । ऐसा ही एक असुर था जो धरती पर आया तो उसका हृदय परिवर्तन हो चुका था वह धरती की एक स्त्री पर मोहित होकर सामान्य मानव के समान जीवन जीने लगा । एक दिन उसके एकमात्र पुत्र को कोई रोग लग गया जिसका उपचार देवियों के पास था जो पर्वत के दूसरी ओर रहतीं थीं । देवियां धरती को असुरों के आतंक से मुक्त कराने धरती पर आईं थीं यह सोचकर असुर उनके पास अपने पुत्र को ले जाने में सकुचा रहा था । उसे लगा कि देवियां उसकी सहायता नहीं करेंगी परंतु उसकी आशा के विपरीत देवियां कभी किसी का भला करने का मौका नहीं छोड़ती थीं । वे घृणा, बदला , ईष्या जैसे नकारात्मक शब्दों से अनजान थीं । असुर की पत्नी ने जब बहुत हठ किया तो असुर अपने पुत्र को देवियों के पास ले जाने को राजी हुआ । वह कई योजन यात्रा करके उस ऊँचे पहाड़ को पार कर देवियों तक पहुंचा । देवियों ने उसके पुत्र का उपचार कर उसे ठीक कर दिया ।

असुर ने देवी का धन्यवाद दिया तो देवी ने कहा –“ तुम सही समय पर इसे यहां ले आये यदि कुछ और घंटे बीत जाते तो हम इसे नहीं बचा सकते थे। तुम इतने शक्तिशाली और गतिशील हो जिस कारण शीघ्र यहां पहुंच गये और अपने बच्चे को बचा सके। पर जाने कितने ही मनुष्य हैं जो अपने प्रियजनों को यहां समय पर नहीं ला पाते और सदा के लिए उनसे बिछुड़ जाते हैं। यह पर्वत पूरा पार करने के बाद यहां लाते-लाते उनके प्रिय परिजन मर चुके होते हैं। हम मृत शरीर में पुनः प्राण नहीं डाल सकते यह मात्र ईश्वर कर सकता है ।“ 

तब असुर ने तय किया कि वह उस पर्वत के इस पार से उस पार तक एक कंदरा का निर्माण करेगा ताकि किसी को भी पर्वत पार करने के लिए उसका पूरा चक्कर न लगाना पड़े और कंदरा से होकर वे शीघ्र उस पार देवियों की नगरी में पहुंच सकें । उसकी लगन व उपकार की भावना देखकर देवी चमत्कारिता ने उसके लिए एक छेनी और हथौड़ी बनाई जो एक वार से चट्टान के बड़े बड़े टुकड़ों को तोड़ सकती थी। देवी चमत्कारिता मनुष्यों की साधारण वस्तुओं को असाधारण बना देने में कुशल थीं । उन्होंने अपने आप तलने वाली कढ़ाइयां , अपने आप बुनने वाली तीलियां , स्वयं लिखने वाली कलम, आकार बदलने वाली घोड़ा गाड़ी, उड़ने वाला रथ आदि बहुत से चमत्कारी यंत्र बनाये थे जो उस समय बहुत प्रचिलित हुए । इस छेनी हथौड़ी से वह असुर जो कि मेरे पूर्वज थे असुर शीघ्र ही उस पर्वत में कंदरा का निर्माण कर सके और देवी का यह उपहार उनकी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तान्तरित होता रहा । मुझे यह कथा मेरे पिता ने सुनाई थी और यह छेनी हथौड़ी मुझे दी थी परंतु मैंने कभी इसका प्रयोग नहीं किया । मेरी कोई संतान नहीं, कदाचित मेरे साथ ही मेरे वंश का अंत हो जाएगा , इसलिए मैं यह चमत्कारी छेनी हथौड़ी तुम्हें देता हूं। “

“हे राक्षसराज आपकी कथा सुनकर मुझे बहुत खुशी हुई और दुख भी हुआ । आपकी कहानी सुनने के बाद मुझे आपसे सहानुभूति हो रही है अतः मैं आपको इस पुष्प का रहस्य बताता हूं। असल में जो पुष्प आपने अभी खाया है वह नेत्रनीरपर्णी नामक पौधे पर उगने वाला देवी के आँसू नामक पुष्प है जो कि श्रापित है । इसके कारण ही आपको भूख , प्यास , दर्द आदि का आभास नहीं होगा और दिन प्रतिदिन आपका शरीर मृत्यु की ओर तेजी से बढ़ता जाएगा । “ राजकुमार ने उसे अपनी यात्रा का पूरा वृतांत कह सुनाया और उसके लिये खेद व्यक्त किया । 

“ सुनो आरुणेन्द्र इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं । असुर होने के कारण मैं प्रकृति से मांसाहारी था परंतु हमारे परिवार में मनुष्य का मांस खाने पर प्रतिबंध था यह मेरा दुर्भाग्य ही रहा कि मुझे नरमांस की सुंगध इतनी तीव्र आई कि मैं ऋषि को अपना ग्रास बनाने से स्वयं को रोक न सका । कदाचित यह ईश्वर की इच्छा से इसलिए हुआ कि मैं तुम्हें यह छेनी हथौड़ी दे दूं । अब मैं प्रसन्नता से इस संसार से विदा हो सकता हूं। धन्यवाद तुमने वास्तव में मेरा उद्धार किया है । देवी यंत्रणा की जय हो । देवी तुम्हें सफलता प्रदान करे । “


12)“भंगम् भग्नं कर्तुं”


 इस प्रकार गांव वालों को उस राक्षस से छुटकारा मिला । अब वह राक्षस मरते दम तक सुखी रहेगा । राजकुमार आखिर आन्द्रालया नामक उस नगर में पहुंचा जिसके विषय में देव ने बताया था । यह नगर चारों ओर से ऊँची दीवारों से घिरा था पर फिर भी वह चट्टान दूर से दिख रही थी जिसमें वह असुर बंद था जो देव का पिता था। नगर में प्रवेश कर राजकुमार ने द्वारपालों को बताया कि वह उस चट्टान को तोड़ना चाहता है । राजकुमार को राजा के पास हाजिर किया गया ।

“पथिक तुम उस बड़ी चट्टान को तोड़ दो जो हमारे राज्य का एक बड़ा भूभाग घेरे है तो हम तुम्हें पुरस्कार देंगे परंतु यह चट्टान जितनी तोड़ोंयह उतनी ही बढ़ती जाती है । इसलिये आज तक कोई भी इसे यहां से नहीं हटा सका है । तुम्हें क्या लगता है कि तुम यह दुष्कर कार्य कर सकोगे।”

“महाराज मैं प्रयास करना चाहता हूँ ।“

“ठीक है हम चट्टान तोड़ने के औजार मंगवाते हैं।“

“वो मैं साथ लाया हूँ ।“राजकुमार ने अपनी छोटी सी हथौड़ी और छेनी दिखाई तो दरबारी हँस पड़े ।

“महाराज मुझे तो यह कोई विदूषक लगता है , जो परिहास करके हमारा मनोरंजन करना चाहता है । भला इस औजार से वह चट्टान कैसे टूटेगी? हमारे कारीगरों ने तो अत्यंत परिष्कृत औजार प्रयोग किये थे परंतु फिर भी असफल रहे । यह बालक इस छोटी सी छेनी हथौड़ी से यह कार्य कैसे कर सकेगा?” महामंत्री ने कहा ।

“विदूषक यह कोई परिहास का विषय नहीं है । यह चट्टान हमारे राज्य की एक बड़ी गंभीर समस्या है हमें इसके विषय में परिहास पसंद नहीं आया । हम तुम्हें इसके लिए दंडित कर सकते हैं। “

“महाराज मैं परिहास नहीं कर रहा। मैं इसी औजार की सहायता से इसे रात भर में तोड़ दूँगा । मेरा विश्वास कीजिए। “

“और यदि न तोड़ सके तो ?” महामंत्री ने आग भड़काने का कार्य किया ।

“तो जो दण्ड आप देंगे मुझे स्वीकार होगा ।“

“तो ठीक है यदि तुम रात भर में चट्टान न तोड़ सके तो कल सुबह तुम्हें फाँसी दे दी जाएगी और यदि तोड़ दिया तो मैं अपनी एकमात्र पुत्री का विवाह तुमसे कर दूंगा । और तुम्हें अपना युवराज नियुक्त करूंगा । मेरे पश्चात् तुम मेरे राज्य के स्वामी होगे । “ राजा ने ऐसा कहा तो दरबार में लोगों ने हाँ में हाँ मिलायी । राजा की पुत्री का नाम मृगावती था जो बहुत सुंदर थी । राजकुमार आरुणेन्द्र उसे देखकर पहली दृष्टि में ही मोहित हो गया । राजकुमारी को भी आत्मविश्वास से भरा आरुणेन्द्र बहुत भाया। दोनों ने आँखों आँखों में ही एक दूसरे को पसंद कर लिया ।

रात में राजकुमार उस चट्टान को तोड़ने गया । वह नगर वासियों को डराना नहीं चाहता था । जब चट्टान टूट जाती तो उसमें से ताड़ के पेड से भी चार-पांच गुना ऊँचा असुर निकलता जिसे देखकर नगर वासी डर जाते अतः वह अर्धरात्रि होने तक धीरे- धीरे चट्टान तोड़ने का अभिनय करता रहा । आखिर गाँव वालों को लगा कि वह उनका समय बर्बाद करने के उद्देश्य से यहाँ आया है तो वे सभी उसका परिहास करते हुए एक-एक कर अपने-अपने घर चले गये । नगर के सो जाने के पश्चात् राजकुमार ने मंत्र पढ़कर चट्टान पर एक भरपूर वार किया और चट्टान को तोड़ दिया । उसमें से एक ताड़ के पेड़ से भी पाँच गुना ऊँचा असुर जो बहुत ही रुपवान था बाहर आया । उसने अपने हाथ पैर ऐंठकर अँगड़ाई ली । और इधर उधर दृष्टि डाली तो भूमि पर उसे आरुणेन्द्र दिखाई दिया । 

“वामन तुम कौन हो ? और देवी पाषाणवृंदा कहां हैं? मेरा पुत्र कहां है ? यह कौन सा युग है ?” असुर ने राजकुमार आरुणेन्द्र से पूछा । 

“देव मैं वामन नहीं अपितु मानव हूं। यह कलयुग है और मैं आपके पुत्र के विषय में ही समाचार देने आया हूं। “ ऐसा कहकर राजकुमार ने उसे पूरी कथा कह सुनाई । 

“ओह देवासुर संग्राम समाप्त हो चुका है । धरती असुरों से खाली हो चुकी है इसका अर्थ है कि देवियां भी अपने लोक लौट चुकीं हैं । तो अब मुझे भी अपने लोक लौटना होगा परंतु इससे पहले मैं स्वयं अपने पुत्र से भेंट करने को अत्यंत इच्छुक हूं। मुझे वह स्थान अपनी कल्पना में दिखाओं जहां मेरा पुत्र कैद है । मैं तुम्हें क्षणभर में वहां पहुंचा दूंगा। “

आरुणेन्द्र ने आँख बंद करके उस स्थान की और उसके आस पास की कल्पना की । असुर ने उसके मष्तिश्क से वहां तक पहुंचने का मानचित्र अपने मष्तिश्क में बनाया और उसे लेकर क्षण भर में ही देव की गुफा के सामने पहुँच गया । 

“यह लो आरुणेन्द्र यह मुद्रिका पहनो इसे दबाकर कहो “इष्टं आकारं ददातु” इससे तुम छोटे या बड़े आकार को प्राप्त कर गुफा में सरलता से प्रवेश कर सकते हो । “

यह कहकर उस देव ने अपना आकार छोटा किया और गुफा में प्रवेश कर गया । आरुणेन्द्र ने अँगूठी पहनी और उसे दबाकर मंत्र का उच्चारण किया और देव के पीछे पीछे गुफा में प्रवेश कर गया । उसका आकार इतना छोटा था कि वह इस संकरी गुफा में आसानी से चल सकता था। 

“असुरराज क्या यह मुद्रिका भी देवी चमत्कारिता ने बनाई थी ?” 

“हां तुमने सही कहा। ऐसी दो मुद्रिकाएं हमारे विवाह के अवसर पर उन्होंने हम दोनों को भेंट की थी । विवाह के समय हम दोनों ने इन्हें एक दूसरे को पहनाया था। मेरी पत्नी ने मुझे कैद करते समय अपनी मुद्रिका उतारकर मेरे मुंह पर मारी जो आज भी मेरे पास है जो मैंने तुम्हें दी वह मेरी मुद्रिका है। देवी क्रोध की दशा में किसी की नहीं सुनती थीं। तुम्हीं बताओ मैंने क्या गलत किया ? वह हमारे पुत्र को सदा के लिए कैद कर रही थी । मैं ऐसा कैसे होने देता ? वह मेरा एक मात्र पुत्र है मैंने उसे अपने बाजुओं में अठखेलियां करते देखा है । वह मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय है। मैं तो चाहता था कि मेरा पुत्र सम्पूर्ण धरती का स्वामी बने पर पाषाणवृंदा उसे तपस्वी बनाना चाहती थी। पता नहीं आज वह कैसा दिखता होगा ? “

“वह बहुत ही रूपवान हैं बिल्कुल आपकी तरह । बस आकार में आपसे चार पांच गुना कम होंगे ।“

“धरती पर जन्में असुरों के बच्चे उनके बराबर आयु व आकार प्राप्त नहीं करते थे। यद्यपि योग तप व साधना करके वे देवों के समान चिरायु हो सकते थे । परंतु आकार में वे सामान्य मनुष्यों के समान ही रहा करते थे। आज तो धरती पर चारों ओर वामन ही दृष्टिगोचर हो रहे हैं। क्या मानवों का आस्तित्व समाप्त हो गया ?” असुर ने नगर में छतों पर सोते मनुष्यों का आकार देखा तो उन्हें वामन समझ बैठा । 

“समय के साथ साथ मानवों की लंबाई कम होती गयी । सतयुग में मनुष्य ताड़ के पेड़ जितने ऊँचे होते थे पर आज कलयुग के मानवों के अनुसार मैं उचित लंबाई का स्वामी हूं। “ सकुचाकर आरुणेन्द्र ने कहा । उसे यह बात बुरी लगी कि असुर ने उसे बौना कहा। 

“ओह तो ये बात है । कदाचित कलयुग का ही प्रभाव है कि मानवों के पास अब पूंछ भी नहीं पायी जाती । “ असुर ने अपनी पूंछ को गर्व से देखते हुए कहा ।  

बातें करते हुए समय कब बीता पता ही नहीं चला । पिता पुत्र एक दुसरे से मिलकर बहुत खुश हुए ।

“पुत्र तुम जीवित हो ? परंतु धरती के वातावरण के प्रभाव से तो तुम्हें अल्पायु होना चाहिए था। असुरों के बच्चों को अधिक से अधिक पचास हजार वर्ष की आयु प्राप्त होती है। कलयुग का अर्थ है धरती पर तीन युग बीत चुके हैं जो करीब 20-32 लाख वर्ष के बराबर रहे होंगे । परंतु तुम आज भी जीवित हो यह देखकर मैं बहुत प्रसन्न हूं। यह चमत्कार कैसे हुआ ?“

“पिताजी यह स्थान समय के प्रभाव से मुक्त है इसलिये मुझे समय का भान ही नहीं रहता । मुझे तो आज भी यह कल की ही बात लगती है जब आप दोनों मेरे लिए लड़ रहे थे। आप तो जानते ही हैं कि मां चाहती थीं कि मैं तपस्या करके दीर्घायु बनूं । वो चाहती थीं कि मैं भी ब्रह्मा की तरह अनन्त काल तक तपस्या कर सतलोक में स्थान प्राप्त करूं । परंतु तपस्या करने के लिए मोह का त्याग आवश्यक है और स्वर्ण के प्रति मेरे मोह ने मुझे तपस्या नहीं करने दिया । कदाचित इसीलिए माता ने मेरी आयु बढ़ाने के लिए दूसरे उपाय अपनाये । धरती पर यह गर्भ ग्रह समय से परे है। माता स्वयं पर्वत रूप में यहां विद्यमान हैं और उनके गर्भ में समय के प्रभाव से दूर मैं और मेरा स्वर्ण यहां अनन्त काल के लिए कैद हैं। आप मेरी चिंता मत कीजिए । परंतु आपको अब अपने लोक लौटना होगा। माता की यही इच्छा है ।“

“ओह तो तुम अपनी माता के गर्भ में हो । कितना आश्चर्य कि पिता चाहकर भी मां से महान नहीं हो सकता । मैं भी चाहता था कि तुम चिरायु हो पर मेरा इतना सामर्थ्य कहां कि मैं तुम्हारे लिए इतना बड़ा त्याग कर सकूं। मैंने देवी को गलत समझा इसके लिए देवी से क्षमा चाहता हूं और अपने लोक जाने को तैयार हूं । कदाचित हम फिर कभी मिलें । विदा पुत्र।“

“विदा पिताजी ।“ दोनों पिता पुत्र बहुत देर तक गले लगे रहे । 

 कुछ देर बीती बातें याद करके असुर ने एक अंधकूप का निर्माण किया और अपने लोक की ओर चला गया और देव ने हीरामन को आरुणेन्द्र के साथ भेज दिया । राजकुमार अपने नगर पहुँचा तो पाया कि नगर में शोक छाया था । महाराज हृदयाघात के कारण जीवन की अंतिम सांसे ले रहे थे । यह देखकर राजकुमार अपने पिता के कक्ष में पहुंचा उसके कंधे पर हीरामन को देखकर सभी आश्चर्यचकित थे।

“पिताजी यह क्या हुआ ? वैद्य जी इन्हें बचा लीजिए । “

“राजकुमार यदि मैं ऐसा कर सकता तो अवश्य करता परंतु ...............”

“राजकुमार मेरे पास तुम्हारे पिता का उपचार है “ तभी हीरामन ने कहा । 

हीरामन ने तब अपने पंखों में छिपाकर रखा वह स्वर्णाम्र दिया जिसे उसने कुछ दिन पूर्व उनके उद्यान से चुराया था। 

“इन्हें स्वर्णाम्र के रस की कुछ बूंदे चखा दो ये तुरंत ठीक हो जाएंगे । परंतु इसके पश्चात् बचे हुए स्वर्णाम्र पर मेरा अधिकार होगा। “

“अवश्य हीरामन तुम्हारा यह उपकार मैं कभी नहीं भूलूंगा । यह स्वर्णाम्र तुम्हें भी जीवन देता है फिर भी तुम यह मेरे पिता के साथ बांट रहे हो । इसके लिए मैं तुम्हारा किस प्रकार धन्यवाद करूं? “

“राजकुमार तुम्हारे पिता का रोग ठीक करने के बाद भी मेरे पास पर्याप्त स्वर्णाम्र बचा रहेगा । फिर देवी कल्पफला भी तो हैं । भविष्य में कोई न कोई संयासी उनसे मेरे लिए स्वर्णाम्र ले ही आयेगा। इसलिये बिना हृदय पर बोझ लिये और शीघ्रतिशीघ्र इस स्वर्णाम्र के रस को राजा के मुंह में डालने का प्रबंध करो । “

वैद्य जी ने स्वर्णाम्र की कुछ बूंदे राजा के मुख में टपकाईं तो धीरे धीरे राजा की पीड़ा जाती रही । और वे स्वस्थ महसूस करने लगे । 

 पिता की चेतना लौटी तो राजकुमार ने उन्हें पूरी बात बताई और साक्ष्य के रूप में हीरामन तो साथ में था ही । स्वर्णाम्र की गुठली उपहार के रुप में हीरामन ने राजकुमार को दी जो स्वयं एक कीमती रत्न थी । राजकुमार यह रत्न अपने मुकुट में सजाने वाला था। राजकुमार ने राजा को बताया कि मार्ग में उसने विवाह योग्य कन्या भी देख ली है । शीघ्र ही राजकुमार की ओर से राजकुमारी मृगावती को रिश्ता भेजा गया । आंद्रालया में चट्टान तोड़ने वाले युवक के अचानक कहीं गुम हो जाने से वहां के लोग यही समझ रहे थे कि वह मृत्यु को प्राप्त हुआ परंतु जब उन्हें आरुणेन्द्र के पिता की ओर से विवाह प्रस्ताव आया तो उन्हें बहुत प्रसन्नता हुई । आरुणेन्द्र अपनी ससुराल नगर का राजा बना और उसने स्वर्णाम्र के बीज को अपने मुकुट में जड़वा लिया । संयासी की वाणी सत्य हुई आरुणेन्द्र को उसका भाग्य चंपकपुर से बहुत दूर ले गया ।

 

जय श्री हरि*



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