गोल गोल दुनियाँ
गोल गोल दुनियाँ
भाग-1
बात ज्यादा पुरानी नहीं है। शायद उन दिनों की रही होगी जिन दिनों मुझे समाज और समाज में रहने वाले तरह तरह के जीव जंतुओं के बारे में अधिक जानकारी नहीं थी।
कॉलेज पास करके उन दिनों शहर के ही एक स्कूल में पार्ट टाइम पढ़ाने जाने लगा था। अब पिताजी से पैसे मांगने में कुछ संकोच होने लगा था। फिर ये भी सोचा कि अगर अपना ख़र्चा खुद उठाया जाये तो बेहतर रहेगा। घर का कुछ भार भी कम होगा और अपना भी आत्मविश्वास बढ़ेगा। वहीं काम करने के दौरान मेरी मुलाकात एक सज्जन से हुई (आज भी दुख होता है कि क्यों हुई)। नाम था अनुभव शर्मा, लोग प्यार से हनी बुलाया करते थे (ऐसा उनका कहना था वरना ना मुझे उन पे कभी प्यार आया और ना ही मैंने उन्हें हनी बुलाया)। नाम के अनुरूप ही उनके अंदर अनुभव का भंडार था (ये राय उनकी स्वयं के बार में थी) बात चाहे किसी भी क्षेत्र से सम्बंधित क्यों ना हो उनके पास उससे जुड़ी अपनी राय और अपना अनुभव ज़रूर होता था।
मैं उनसे जब से मिला था तब से ही बड़ा प्रभावित था, कारण था उनके अंदर के दो खास सद्गुण। पहला इधर की बात उधर ना करना और दूसरा कभी झूठ ना बोलना (ऐसा उन्होंने स्वयं ही मुझे बताया था ये कहते हुए कि अगर मुझे कोई बात परेशान करे तो मैं बेझिझक उनसे कह सकता हूँ)। जल्द ही उनके पहले सद्गुण से मेरा वास्ता पड़ गया।
मुझे पढ़ाते हुए शायद दो महीने ही हो पाये थे। पर उनसे मित्रता अच्छी हो गई थी। कच्ची बुद्धि के चलते मैं उन पे भरोसा भी करने लगा था।
एक दिन अचानक मेरा फोन चलती क्लास के बीच में बज उठा। फोन घर से था। परिस्थिति कुछ ऐसी बनी कि मुझे क्लास छोड़ कर घर के लिये निकलना पड़ा। दरअसल मेरी मौसी के बेटे ने प्रेम प्रसंग के चलते फिनायल पी लिया था। उसे लेकर तुरंत शहर के बड़े अस्पताल जाना पड़ गया। अब ये बात मैं सब से कहने में संकोच महसूस कर रहा था तो अनुभव भाई साहब के अनुभव पे भरोसा करते हुए मैंने उन्हें सारी बात बता दी, और 2-4 दिन के लिये मेरी क्लास सम्भालने के लिये भी कह दिया। उन्होंने भी पूरी ज़िम्मेदारी के साथ अपना काम किया। उन्होंने ना सिर्फ़ प्राचार्य से कह कर मेरी छुट्टी मंज़ूर करा दी बल्कि मेरी क्लासेस की ज़िम्मेदारी भी खुद ले ली। इसके अलावा वे समय समय पर मुझे फोन कर के मुझे अपनी सह्रदयता का परिचय भी देते रहते थे। उनके इस व्यवहार ने उनकी मैत्री को ले कर मेरे मन में श्रद्धा और भी बढ़ा दी। लेकिन जल्द ही मेरी श्रद्धा को तगड़ी चोट लगी।
जिस दिन मैं सारी परेशानियों से मुक्त हो कर स्कूल पहुँचा तो मुझे एहसास हुआ कि हर कोई मुझे सवालिया नज़रों से घूरे जा रहा है। मुझे लगा शायद मेरा भ्रम होगा पर घर जाने से पहले मेरा सामना वास्तविकता से हो ही गया जब गुप्ता मैडम ये पूछने मेरे पास आईं कि मेरे भाई की तबियत अब कैसी है?
मेरे ‘ठीक है’ कहने के बाद उन्होंने सारी राम कहानी मेरे सामने खोल कर रख दी। उन्होंने कहा कि अनुभव सर ने सबको बताया कि मेरे ऊपर कैसा विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा है, और उस विपत्ति का जो घनघोर विस्तृत वर्णन उन्हें सुनाया गया था उसे सुन कर तो मेरी रूह कांप गई। हाँ कुछ बातें तो मैंने ही उन्हें बताई थीं पर...
