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Rajiva Srivastava

Others


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" दीदी - दीदी "

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आप में से भी कइयों के साथ ऐसा हुआ होगा, जिन रिश्तों या संबंधों को शुरुआत में बेमन से या ऐसे कहें कि एक तरह से बोझ मान कर शुरू किया जाता है वो ही एक उम्र के बाद सच्चे साबित होते हैं।

बात कुछ ज्यादा ही पुरानी है। मैं पन्द्रह सोलह साल की थी। घर की अकेली लड़की। कोई भाई बहन थे नहीं। मुझे तो नहीं लेकिन मां को ये बात बहुत कचोटती थी। खास करके रक्षा बन्धन के मौके पर।' एक भाई होता तो कम से कम उसे राखी तो बांध सकती हमारे बाद मायके के नाम पर क्या रह जाएगा?' जब तब जिस किसी से भी मां अपना दुखड़ा रोती रहती। मैं सुन सुन कर कुढ़ती रहती। भाई या बहन नहीं है तो नहीं है, इस बात का रोना क्या? मां ऐसे ही इस रक्षा बन्धन पे भी अपना रोना काम वाली बाई राधा बाई के सामने रो रहीं थीं कि अचानक राधा बाई बोल पड़ी 'बीबी जी अगर आप बुरा न मानें तो बिटिया हमारे लल्लन को राखी बांध दे, हमारे बिटवा का भी त्योहार मन जाई।' मां तो जैसे ऐसे किसी प्रस्ताव के लिए पहले से ही तैयार बैठी थीं, तुरन्त तैयार हो गईं। मुझसे पूछने की भी जहमत नहीं की। रक्षा बन्धन की सारी तैयारी खुद ही कर लीं, राखी, मिठाई और तो और लल्लन को देने के लिए गिफ्ट का भी इंतज़ाम कर लिया। राखी के दिन सुबह सुबह अपना फरमान जारी कर दिया 'आज से मालती लल्लन को हर साल तू राखी बांधेगी।' मैं तो एक दम से बिफर पड़ी, ' मैं नहीं बांधती किसी ऐरे गैरे को राखी, कोई मज़ाक है क्या?' बहुत देर तक बहस की फिर पापा ने मां की तबियत का हवाला देकर मुझे मना ही लिया। मैं बेमन से ही सही लेकिन लल्लन को राखी बांधने को तैयार हो ही गई। पहली बार देखा लल्लन को आठ एक साल का दुबला पतला लड़का लाल कमीज़ और काली निकर पहने हुए था। दरवाज़े से छुपा खड़ा था। मां ने अंदर बुलाया तो डरते डरते आया, कुर्सी के बिलकुल सिरे पे बैठ गया। मैंने बिना किसी उत्साह के राखी बांध दी। मिठाई देने से पहले ही उसने मिठाई एक तरह से छीन ली और मुंह भर लिया। अब भी उसकी नज़रें मिठाई के डब्बे पे टिकी थी, मां ने कहा पूरा डिब्बा उसके लिए है तो जैसे उसे यकीन ही नहीं हुआ। मां ने मिठाई का डिब्बा और गिफ्ट उसे दिलवाया। राधा बाई ने कहा ' दीदी के पैर तो छू'। उसने तुरन्त मेरे पैर छुए।

इस बात को आज करीब चालीस साल बीत गए हैं। कुछ ही साल बाद मां की मृत्यु हो गई। लेकिन मां का बनाया वो रिश्ता तब तक अपनी जगह बना चुका था। मां को अपने अंतिम समय में इस बात का संतोष था। 

लल्लन ने भी इतने सालों में रिश्ते को पूरा मान दिया। तब से रक्षा बंधन पे या तो वो खुद आता है नहीं तो अगर कहीं दूर हो तो समय रहते बोल देता है ' दीदी, इस बार राखी भेज देना।'

अब तो पिता जी भी नहीं रहे लेकिन लल्लन ने कभी मायके की कमी महसूस नहीं होने दी। मेरी शादी में दिन रात बिना थके लगा रहा था। सोमेश, मेरे पति का तो लाडला है लल्लन। पिछले साल जब इन्हें दिल का दौरा पड़ा, लल्लन एक पैर पे खड़ा रहा। मुझे बिलकुल अकेला महसूस नहीं होने दिया। बेटा तो बैंगलोर से बाद में पहुंच पाया। जब तक तो सोमेश को वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया था।

मैं अभी ये सोच ही रही थी कि सोमेश की आवाज़ आई, ' अरे राखी आने में है राखी जल्दी भेजो नहीं तो आ जायेगा साला, दीदी दीदी कहते।' मैं ने गुस्सा दिखाया तो बोले 'साले को साला नहीं तो और क्या बोलते हैं?'


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