उलझन
उलझन
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वह मौन खड़ी थी
पैसे हाथ में दबाए
मना कैसे करे पिता को
कि ये रस्में ना निभाएं
बचपन में जिस पिता से
ज़िद करती,
छोटा सी हथेली देती थी फैला
शादी के उपरांत,
ना हथेली छोटी थी ना नोट
यही बात करती थी मन मैला
पर कैसे कह दे कुछ भी,
रस्में हैं आखिर
शादी का ये साल था पहला
जानती है, कर्ज़ में दबे कंधे
अगली बार फिर मिलने आएंगे ,
ढोकर नेग का थैला
