सोज़ ए वतन
सोज़ ए वतन
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निःशब्द हूँ स्तब्ध हूँ सोज़ ए वतन के हाल पर,
यूँ सहा जाता नहीं अब मौन हर एक बात पर,
ख़ौफ ए ज़िगर से कब तलक़,
यूँ ज़िंदगी होगी बसर,
कब तलक़ हम यूँ बटेंगे,
इन किन्नरों की चाल पर,
हम नहीं हिंदू-मुसलमाँ हम नहीं सिख या ईसाई,
है हमारा एक मज़हब हम सभी आपस में भाई,
हैं सभी खुदगर्ज़ जालिम,
कर रहे हम पर सियासत,
वे हमारा मर्म छूकर,
भर रहे हममें बग़ावत,
आओ मिलकर हम सभी इनके इरादे तोड़ दें
ऐसा कुछ करके दिखाएं मंसूबों पर पानी फेर दें।
