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दयाल शरण

Others

3  

दयाल शरण

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समसामयिक

समसामयिक

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लेखनी है मौन 

क्या यह शब्द का

उपवास है

मन मे उपजे 

सैकड़ों प्रश्नों का

उपहास है।


बढ़ते जाने की जिद

और बेखयाली 

इस कदर

क्या यही इक

बिन बुलाई 

मौत से यलगार है।


सूने से हैं वार अब

सूने पड़े 

त्यौहार सब

जिंदगी की चाह में

यह कौन सा प्रतिकार है।


आज की करनी को

कथनी सी 

पढ़ेंगी पीढियां।

कौन से रंग रच बसोगे

यह आपको अधिकार है।


मन मे उपजे 

सैकड़ों प्रश्नों का

उपहास है।

लेखनी है मौन 

क्या यह शब्द का

उपवास है।।



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