सहर के पहर में
सहर के पहर में
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सूरज को खिलते देखा
चिड़ियों को उड़ते देखा
सैर पर जाते लोगों को देखा
अख़बार फेंकते हाथों को देखा
ये देखा, ये सब देखा एक ही शहर में
सहर के पहर में
सुबह को जागा, दोपहर नहीं
हर क्षण को जागा, दो पहर नहीं
सुबह की मेहनत देखी, दोपहर की धूप नहीं
दिखी केसरी सूरज की, गुस्से में लाल गाल नहीं
ये देखा, ये सब देखा एक ही शहर में
सहर के पहर में
