ऋतुएं भारत भूमि के
ऋतुएं भारत भूमि के
हम तो आएंगे हम तो जाएंगे भारतीयों का मन बहलाएंगे,
नई परिवर्तन नई शक्ति से नित-नित नया भारत बनाएंगे।
अहरा सूखे नदियां सूखी, उत्तप्त हवाओं का शोर।
तन मन झुलसे तरूओं के तरुपत्र भी कुम्हलाए,
ढोरों के भी खूर फटे मिले ना तिनका दूब का,
थका हुआ गोधन बैठा वट बाबा के छाजन तले निश्चिंत पगुराए।
मेहनत करना छोड़ - छाड़ कर स्वेदन से लड़ श्रमिक छांह तले आए।
प्रचंड ताप से धरती फटी फटी अश्रु नयनों से बहाए।
कब आओगी बरसा बहना? अपनी अमृत जलधारा से सबकी प्यास बुझाओ।
हंसती हुई मुस्कराई बरखा कहे, अजी क्या बात है हमारे।
हमें देख-देख मानव अपने को संवारे, चातक तो चातक है पपीहा भी मुझे पुकारे।
है वक्षस्थल नीला नीला झिलमिल करते तारे।
भ्रमित होते अपने कुन्तल पर मेघों के झुण्ड सारे।
कभी कभी आंख मिचौली अगले पल हीं चमके बिजली।
वन-बाग तरु प्रांतों कांपे खुली पलकें होगी काली।
केका केका कहकर सहस्त्र लोचन फैलाया मोर।
बारह मास की प्यास बुझाने चातक मचाये शोर।
मात्र हुंकार भरूं तो टूट जाएंगे निश्छल तरंगिणी के तीर।
मानव ढोर फसलों के स्वर्ण रेणु बह जाएंगे गांवों के नीड़।
सबकी व्यथा क्रंदन सुन-सुनकर मैं भी हो जाती हूं निर्जीव।
अभी बीते कल की बात भुवन भास्कर के मार्तण्ड तेज से आकुल होते जीव।
कोई बात नहीं काली चादर विध्वंस की, हमने अब समेटी।
नूतन कोमल कोमल दूब मुस्काए, पाकर नई-नई माटी।
नव केतन में नव प्रातः जागा, जागा अम्बर में खगवृन्दों की उड़ान।
मातृ वंदना करने वाले कर्म के साधक, हल लेकर निकला किसान।
बाढ़ -बीमारी -बदहाली को पीछे छोड़ा, आगे करना है विश्व कल्याण।
आ गई झूमते - झूमते शारद, बोली आगे बढ़ो-बढ़ाओ सबको।
कभी उबकाई लाती गर्मी व्योम का रंग नीला पल भर में ही मोती।
कनक शस्य से पटेगी धरती, समृद्धि का स्वर्णिम आंचल देखो।
चहूं ओर खुशहाली छाई गणपति दुर्गा काली शक्ति के संग।
अच्छे-बुरे का भेद नहीं, उंच नीच को भूला, एक साथ उत्सवों के उमंग।
इसके आगे कुछ और भी, ठंड से ठिठुरते कांपते तन मन।
झोपड़ियों का मजाक उड़ाती मचल मचल के हवा बहे शन शन।
कहीं हिमपात कहीं शीतलहरी का दानव रुपी शासन।
सायबेरियन पवन की सखी सहेली तुहिन कणों की सज गई बनबाग।
फैशन का हलचल रंग बिरंगे जाड़े में वायु- शब्द प्रदूषण वनभोजन की भागम भाग।
एक एक कर पत्ते झड़ते वन-प्रांतर पर सजी कफन।
रुखे टहनी पल्लव हीन शाखें, जिस पर घुघु की मातृभक्ति स्वत: नेत्र हो जाती नमन।
फर फर, टप टप, लेट गया शिशें कंचन धान की।
उस पर पौष मास में सिना भेदे, दुम दबाकर बाघ मांद में, पछुआ चले जब माघ की।
निराश करूं न जीव जगत को, कर्णप्रिय कोकिला कूके।
मंजरी डोले हौले-हौले, खेतों में सरसों के पीले पीले फूल।
तरुवर का उल्लास उमंग सूरज देखें सात रंग में रंगीन यह धरती।
नये कपोलों की किलकारियां गुंजी, रंग फाग ले आई बसन्ती।
नित नित नई बहारें आई, गाओ मंगलयान, चहूं ओर कीर्ति पताका फहराई चांद पर पहुंचा चन्द्र यान।
जीवन जीने की कहानी थमना मृत्यु के समान।
हम ऋतुएं भारत भूमि के भारत का मान बढ़ाएंगे,
बहुत जल्द ही चूमेगा मार्तण्ड पृष्ठभूमि का अपना आदित्य यान।
