पतझड़ और बसंत।
पतझड़ और बसंत।
जीवन में आते ही रहते हैं,
पतझड़ और बसंत।
पतझड़ क्रूर करो से बन को,
कर देता है बिरस महान।
पर मधु- ऋतु के झोंकों से फिर,
खेल उठता है सुखद बिहान।
मनमोहक नव अरूणिम पत्ते,
लह लहाते हैं अनंत।
अनल सरिस ताते ते दिवसों में,
चातक जल में रहता रीता।
पर पावस की मादक ऋतु में,
स्वाति बूंद है कुछ तो पीता।
मन में नहीं निराशा लाता,
कभी ना कहता हन्त।
वर्षा में वर्षा की बूंदें,
है मग में कीच विछाती।
पर शारदीय गर्मी पाकर,
झट नमी शुष्क हो जाती।
मुक्ता मणि चूर्ण सा निर्मल,
सब और दीखता पंथ।
सुख-दुख ही तो बतलाते हैं,
एक अन्य की सच्ची सत्ता।
और बिना उसकी इच्छा के,
हिलता नहीं एक भी पत्ता।
परिवर्तन को बुरा न कहते,
जो है स्वभाव से संत।
