माँ
माँ
माँ वो आँचल याद है मुझको
धूप में जो छाया बनती थी
गोद में तेरे आते ही
कंपकंपी ठंड की रुक जाती थी
तेरी बाँहों में छुपते ही
हर डर गायब हो जाता था
माथे पर स्पर्श हाथ का
स्वप्न लोक में ले जाता था
कभी तू झूला बन जाती थी
कभी रेल चलाती थी
रूठी मुझे मनाने को
खुद गुड़िया बन जाती थी
माँ हर पल है याद मुझे तू
तुझसे ही ये काया है
तुझसे जीवन पाया मैंने,
हूँ तेरी ही छाया मैं ।
जो ममता दी है माँ तूने
मैंने भी एहसास वो पाया
मेरे आँचल में भी एक
नन्हा सा जीवन है आया
माँ अब मुझमें भी एक माँ है
जो है तेरे ही जैसी
हुआ धन्य मेरा भी जीवन
माँ, बनूँ मैं माँ तेरे जैसी
माँ हर पल है याद मुझे तू
हूँ तेरी छाया मैं।
