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Devashish Tiwari

Others

4  

Devashish Tiwari

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जिंदगी

जिंदगी

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अनपढ़ थी,पर खुश थी,

ऐ जिंदगी तूने मुझे क्यों पढ़ना 

सिखा दिया..............


नहीं पता था की ये आंसू क्या है गम क्या है

जख्म क्या है मरहम क्या है

क्यों ये रात होती है, क्यों बरसात होती है

क्यों ये बादल गरजते है, क्यों तारे चमकते हैं

क्यों फूल खिलते बागों में, क्यों तितलियां

मंडराती हैं क्यों खुश्बु हवा में बिखर जाती,

क्यों भौंरे आते जाते हैं

अनपढ़ थे कुछ समझ ना पाए

बेतुक बातों में क्यों खुद को उलझाए


इस मिट्टी से हमने गुड्डे गुडिया बनाए

फटी पुरानी कपड़ा फिर उनको पहनाए

नहीं जानते थे की मिट्टी ही है हम

नही जानते थे की मिट्टी से है जीवन

अनपढ़ थे हम कुछ भी न खबर था

मिट्टी से ही बना मेरा छोटा सा घर था


पतंगों को समझा महज़ एक खेल

न समझा उलझ जायेगी इसके डोर की

तरह जिंदगी

पानी में सिर्फ नाव कागज़ की बहाए

न सोचा इनकी लहरों में बह जायेगी हर खुशी


सबको हँसता देख मैं भी थी हसती 

किसी को रोता देख थोड़ी मैं भी रो लेती

नही पता था इस हसने की कीमत

नही जानती थी आंसू का मतलब

अनपढ़ थी,कुछ भी ना पता था

ये जिंदगी हमें क्यों है सताता


तारों को गिनते,चांद को मामा कहते

इसी को पनाह में बचपन बिताई

नहीं था खबर इससे शिकवा करेंगे

नहीं जानती थी इसकी दूंगी दुहाई


न किसी की बातो में पड़ना,ना उसपे गौर करना

न दिल की बेचैनी न किसी से प्यार करना

मैं अनपढ़ थी पर रोज रोती न थी

उदासियो में कभी ऐसे खोती न थी


ना सोचा था राते होगी इतनी लम्बी

ना तन्हाई का मुझे मतलब पता था

किताबो से मैने सिर्फ लफ्जों को पढ़ा

इन लफ्जों में भी कोई कहानी छिपा था

क्या सोचा था मैंने की मैं भी पढूंगी

किताबो की दुनिया में उलझी रहूंगी


नही जानती थी मैं भी इसका हिस्सा बनूंगी

जमाने के लिए एक किस्सा बनूंगी

ऐसी ही कहानी कभी मैं भी लिखूंगी

टूटे आइना सा इक दिन मैं भी दिखूंगी


दुनिया को पढ़ा,जिंदगी को पढ़ा

फिर हर मोड़ क्यों नाकामयाबी खड़ा

सुनो पढ़कर मुझे हासिल क्या हुआ

अपना ही वजूद मिला बिखरा हुआ


अनपढ़ थी पर कोई गम न था

हमेशा यूं रहूंगी बस ये वहम था

वहम था जवानी भी बचपन सा होगा

लबों की हसी दर्पण सा होगा

अब यूं लगता है.....


अनपढ़ थी पर खुश थी

कुछ दर्द ने इल्म से ही लड़ना सिखा दिया

ऐ जिंदगी तूने मुझे क्यों पढ़ना सिखा दिया।



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