जाल
जाल
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बहुत बार देखा है मकड़ी के जाले को
इतनी कारीगरी से बुने ताने बाने को
कितनी मेहनत से बनाती है इस जाले को
मर जाती है गर फँसा ले जाल इसको।
कुछ ऐसी ही कहानी है इंसान की
बुनता है जाल अपने चारों ओर
अपनी अनबुझी प्यास की तृप्ति के लिए
फँस जाता है एक दिन अपने ही जाल में।
चाह कर भी नहीं निकल पाता फिर
नहीं सुन पाता मन की आवाज
अब शुरू होता है चिंतन मनन
पर पछतावे के बिना नहीं आता हाथ।
