जादू या रहमत
जादू या रहमत
भूली भटकी इस जीवन में
तेरा नाम बांके बिहारी मैं लेती गई
रास्ते मिलते गए
कांटे फूल बनकर राह में खिलते गए
जीवन में कटुता जाती गई
मधुरता और समरसता आ गई
तेरी नजर का असर है बिहारी जी
धोखा देने वाले जीवन में हटते गए
दुश्मन अब दूर होते गए
जो नजरों से कटाक्ष करते थे मुझे
उनकी नजरों से काफूर किया मुझे
ना जाने कैसा जादू है बांके बिहारी तेरा
मैं हर बार जाती हूं बिखर के तेरे चरणों में
और आती हूं हर बार निखर के सँवर तेरी चौखट से
बस अब तेरी कृपा ही बरसती है मुझ पर
यह जादू है या तेरी रहमत है बांके बिहारी
वरना उसी राह पर लाखों फिसलते गए
वहां तुमने मुझे थामे रखा आज तक।
