जादू भरी नजर
जादू भरी नजर
जादू नजर नजर का अब चलता नहीं,
बिन मौसम के पेड़ फलता नहीं,
ये अलग बात बादल तू छिपाता अपनी ओट,
वैसे बिन संध्या के सूरज ढलता नहीं।
जादू भरी नजरों का ठिकाना ढूंढता,
दिल अकेला होकर जमाना ढूँढता,
मिले जो नये निभा सके नहीं दोस्ती,
इसलिए अब दोस्त मैं पुराना ढूँढता।
होगा जिसे अपना कहे जादू भरी आँख,
देखने को देखती है दुनिया बात लाख,
हम तो पढ़ लेते कौन वफा करेगा,
कौन करेगा हमको मुहब्बत के बाद खाख।
जरूरी नहीं जो बात समझे जादू भरी कोई,
बात भला क्यों करें बेकाबू भरी कोई,
हमारे पास जो हैं वो बांट देते हम,
बस लेने वाला मिले हमें काबू भरी कोई।
जादू जो औरों पे किये वो कम था क्या भला,
जो छोड़ कर चला गया बेरहम था क्या भला,
हमें ही देख लो चुका रहे कसम पुरानी,
वो गया भला गया उसका गम था क्या भला।
