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Raashi Shah

Others

5.0  

Raashi Shah

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गुड़िया

गुड़िया

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कालचक्र का यह नियम है अनिवार्य​,

जो छोटा है, उसे तो होना है बड़ा,

चाहे कर ले कुछ भी कार्य​।

परंतु एक चीज़ है,

जो इस नियम को करती है भंग​,

जब हम छोटे थे,

तो खेलते थे इनके संग​।

नहीं होती यह चीज़ कभी बड़ी,

केवल रहती है,

मुस्कुराते हुए खड़ी।

वह छोटी-सी आँखे,

जो हमारे अनुसार​,

कभी रोती हैं,

तो कभी माँगती हैं, दया की भीख​।

सदा रहती है हमारे साथ​,

चाहे हो बीमार या ठीक​।

वो छोटे-से, गुलाबी होठ​,

ञो हमारी कल्पना के मुताबिक​,

कभी मुस्कुराए,हँस पड़े,

तो कभी रूठ जाए।

और वो दो छोटे कान​,

जो जानते हैं,

हमारी सारी बातें, सारे राज़​,

फिर भी किसी को नहीं बताते,

नहीं करते कोई आवाज़​।

और वो छोटे-से हाथ और पैर​,

जो मासूमियत से हिलकर​,

हमें कभी पुचकारते हैं,

तो कभी छटपटाते हैं।

जी हाँ, गुड़िया!

वो छोटी-सी, प्यारी-सी गुड़िया,

जो हमारे बड़े होने के उपरांत भी,

सदैव छोटी ही रहती है,

और हमारे बचपन की,

नादानी-भरी यादें स्मरन करवाती है।

वो बचपन​,जब गुडियों के संग​,

खेले थे कई खेल​,

जाए थे क​ई गान​,

जिनका न था आपस में कोई मेल​।

परंतु यह बचपन तो आने से रहा,

चाहे किसीने की हो बहुत​-सी दुआ,

कुछ कहा,

या सच्चे दिल से बचपन को चाहा।

इसलिए, इसकी यादों से ही,

अपना मन भर लेते हैं,

और उन गुड़ियों से खेलते हैं,

जो बचपन की मधुर यादें स्मरण करा,

हमें मुस्कुराने की वजह देती हैं।


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