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एक मयान में दो तलवार

एक मयान में दो तलवार

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शादी की राजा ने जब दो दो बार,

फिर आई एक मयान में दो तलवार।

एक थी जो राजा के मन को भाए,

दूसरी बस उनका मन बहलाए।

वार नैनो का करें जैसे कोई कटार।

ऐसे रहती एक मयान में दो तलवार।


सुंदरता कहती की सौतन मुँह मोड़े,

फिर क्यो राजा उससे नाता जोड़े,

बनवा दो अब महल मेरा दुजे पार।

दुविधा में है एक मयान की दो तलवार।


राजा ने संगमरमर का महल बनाया,

सुंदरी के साथ खूब रासलीला रचाया।

और कहा नहीं मिलूंगा तेरी सौतन से,

भले बुलाए वो मुझे सौ सौ बार।


बरसो बाद फिर एक संदेशा आया,

वारिस हुआ खुश खबर है सुनाया।

राजा हुए फिर मिलने को बेकरार,

ये है एक मयान की दुसरी तलवार।


रूपवती अब मन को ना भाए,

गुणवती की बहुत याद सताए।

वारिस में बसे जिसका सारा संसार,

अब देखो कौन है मयान की तलवार।


राजा ने अब अपनी गलती सुधारी,

वापस जाने की आगे हुई तैयारी।

मिल गया अब बिछड़ा परिवार,

अब एक मयान में एक तलवार।


रूपवती अब बहुत फूटकर रोय,

विधी का लिखा भी न बदले कोय।

चाहे एक ओर हो जाए संसार,

भला कैसे रहे एक मयान में दो तलवार ?


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