द्वेष , दर्प बचपन क्या जाने
द्वेष , दर्प बचपन क्या जाने
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कितनी प्यारी बातें बचपन की ,
सुलभ सरल बातें उनके मन की !
निश्छल सा होता है हर बालक ,
न रखता मन में कोई माया जालक !
द्वेष-दर्प को बचपन क्या जाने ,
नन्हा मन प्रेम भाव को ही पहचाने !
निश्छल सा जगता निश्छल ही सोता ,
नन्हा बचपन भूख लगे तो ही है रोता !
पर जैसे-जैसे वह बड़ा होता जाता है ,
धन का जुनून और स्वार्थ उर पे चढ़ता है !
स्वाद प्रभाव का ज्यों ही उसे मिलता है ,
उसका वाणी व्यवहार सब बदल सा जाता है !
