औरत
औरत
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औरत को अक्सर हमने पानी की तरह आकार बदलते देखा है।
कभी बर्फ सी ठंडी फुहार, कभी गुस्से से उबलते देखा है।
हर रिश्ते में रंग भरने के लिये, खुद को उस रंग में रंगते देखा है।
सबकी खुशियां इकट्ठा करने के लिये इक बांध भी बनते देखा है।
सब्र खत्म होने पर उस बांध को टूटते भी देखा है।
झरनों की झरझर, नदियों की कल कल में बलखाते देखा है।
सब करती है वो दूसरों के लिये,
अपने लिये अक्सर अकेले में आँखों से खारा पानी बहाते देखा है।
जब हद होती है जुल्म की तो उसी पानी में सब कुछ बहाते देखा है।
