आज भी फाड़ रहा हूं लकड़ियां
आज भी फाड़ रहा हूं लकड़ियां
बड़े ध्यान से देखा करता था कुल्हाड़ियां।
लोहे के टुकड़े से निर्मित लोहार की दुलारी,
न जाने कितने बेजुबान सूखे की थी हत्यारी।
जो मजा है सूखों की हत्या करने में, वो सुख कहां मिलेगा जीवितों की हत्या करने में।
तनिक सा वार किया जीवितों पर, लगे छट-पटाने, मर गया - मर गया, मार डाला- मार डाला रे।
लेकिन वह हो चुका पक्का घट्ठआह, विस्मृत है कभी उसने किसी के पीठ में कटार भोंकी, आंतें फाड़ा था रे
अबे तू तड़फड़ाता क्यूं है, मैं तो तुझे मुक्ति प्रदान करने को हूं और तू मुझ पर आंखें तरेरता है रे।
तभी तो बचपन से लेकर आज तक लकड़ियां ही फाड़ रहा हूं,
आखिर यह मानव समाज भी तो एक लकड़ी है वह भी कच्ची नहीं सूखी है।
यदि जीवित होती संवेदनशील - भावनाओं का भण्डार होती
भावना उस बालक, किशोर, युवाओं, वयस्कों, वृद्धों की क्यों होती?
मिटाने की ठानी है दानवता मानव समाज की,
तभी तो बचपन से लेकर आजतक लकड़ियां ही फाड़ रहा हूं।
बार बार मानव की योग्यता पैसों से आंकी जाती है, सत्य धर्म की चमड़ी उधेड़ी जाती है,
छल-कपट मददगार है पैसे कमाने में।
आठवीं भी पास नहीं, व्यस्त हैं संविधान मरोड़ेंगे, रक्त रंजित हाथ जीवों पर दया दिखाएंगे,
व्यस्त हैं शिक्षितों को इशारे पर उठक - बैठक कराने में।
इसी लिए तो मैं बड़े प्यार से लकड़ियां फाड़ रहा हूं।
बन गए हैं वेतन भोगी सफेद नकाबपोश बिल्कुल एक सूखी लकड़ी की तरह,
न कोई दर्द न कोई अहसास बस फट जाए काले नकाबपोश।
तभी तो फाड़ रहा हूं लकड़ियां जिनका
कैसा कर्तव्य और कैसा दायित्व वे बंधे हैं अशिक्षितों के लोकतंत्र नागपाश में,
सूरत बदल जाएगी घुनों की ढेर में।
जैसे ही प्रहार होगी सूखे लकड़ी पर कुल्हाड़ी प्यारी से, वह उफ्फ तक न करेगा,
घर - बाहर से भी छलनी है, सारे सगे-संबंधियों के वार से।
शैशव काल से ताने सुन-सुनकर पकड़ मजबूत हो गई निष्ठुर कुल्हाड़ी पर,
किसी ने भी नहीं समझा मुझे इन्सान, मुझसे कुछ नहीं होगा कह-कहकर खून के आंसू रूलाया।
कब बसंत गुजर गया और आज तो पतझड़ में लकड़ी थामे, कच्ची नहीं सूखी थी।
अनुभूति नहीं, ऋतुएं आई चली गई, मानव से समाज ने दानव बनाया।
प्यार हो गया कुल्हाड़ी हत्यारी से और आवेग में फाड़ने लगा लकड़ियां।
तभी तो आज भी लकड़ियां फाड़ रहा हूं।
