सालों बाद
सालों बाद
वक्त की पन्नों में खो गया है, जो था अब वो मिट चुका है
क्यों ढूँढे रे मन उस पल को, जो बहती धारों सा बह चुका है
अक्सर याद आता है वो घर, जहाँ मैं इस जहां में आया था
कल जहाँ मेरा बचपन गुजरा, आज वो जगह बदल चुकी है
वो जमीन जो कभी हमारी थी, हाथ परायों के चली गयी
धूल जिसे बदन पे बोलता था, आज सातवीं परायी हो गयी
क्या गीला क्या शिकवा उससे, जब छोड़ा था उसको हमने ही
कल मुझसे प्यार जो करती थी, आज मुझसे धोखा खा गयी
उस आँगन की मिट्टी भाती थी, जरा सी बारिश से महकती थी
खाने को जी मेरा ललचाता था, ज्यों खाया त्यों माँ भड़कती थी
वहीं लेट रोता तमाशा करता था, अम्मा के एक ही तमाचे पे
फिर वो आँगन गोद में सुलाती थी, क्यों की दुसरी माँ वो मेरी थी
आज वहाँ एक इमारत उठ चुकी है, हक दुसरों की जम चुकी है
न जाने आज वहाँ की मिट्टी कैसी है, बूढ़ी या जैसी की वैसी है
उसके करीब जाकर खबर लूँ क्या, के कैसे गुजरें है इतने साल
क्या वो दुसरों सा मुझे भुला चुकी है, या आज भी मुझे जानती है।
