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vijay laxmi Bhatt Sharma

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vijay laxmi Bhatt Sharma

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सरसराहट

सरसराहट

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खामोशी में भी 

कानों में रस घोलती

ये सरसराहट पेड़ों की

कहती कानों में

चुपके से एक बात


खुश हूँ मैं बहुत

मेरे तने लदे हुए हैं

पत्तों से भरे हुए हैं

डरता हूँ मैं

पतझड़ होने से

नग्न देह पर

शूल सी चुभती हैं

तेज सूर्य किरणें

बढ़ा देती हैं दर्द मेरा


टप टप बरसती बूँदे

अस्तित्व विहिन मैं

नहीं नाचता तब

ना ही होती है कोई

सरसराहट सी मुझ में

खोखला हो जाता हूँ मैं

शायद बूढ़ा हो जाता हूँ मैं

नई कोपलों के फूटने तक

उनके पत्ते बन झूमने गाने तक

यही चक्र चलता रहता है

वर्षों मेरे मिट्टी में मिल जाने तक।


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