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पेड़ हूँ बेहाल हूँ
पेड़ हूँ बेहाल हूँ
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© Alka

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पार्क से उड़ता धुआं देख कर हमने सोचा हो आएं
क्या बात है पता लगाएं
वहां जल रहा था कचरा
आयी एक आवाज़ हमें बचाओ हमें बचाओ
हमने पूछा कौन है हमें बताओ
पास जा कर देखा रो रहा था एक पेड़
बोला हमारी पिट गयी है रेड़
हमने पूछा कैसे
बोला यह इंसान पार्क में ही घूमने आते हैं
पार्क में ही कचरा जलाते हैं
ये भूल जाते हैं पार्क में पेड़ भी लगाए जाते हैं
धुऐं से हो जाता हूँ बेहाल
सूख जाते हैं पत्ते गिर जाते हैं पत्ते
काट-काट कर हमें ले जाते हैं
चूल्हा जलाते हैं न मुझ पर रह जाते हैं फूल और फल
रह जाता हूँ बन के एक ठूंठ बेजान-सी आकृति
हमें बचाओ हमें बचाओ
कोई उपाय कराओ
अब एक बेजान लकड़ियों का कंकाल हूँ
मैं पेड़ हूँ बेहाल हूँ

जब इंसान प्रकिति की अनुपम देन पेड़ को नष्ट करता है तो वो यह नहीं जानता वह कितना बड़ा नुक्सान कर लेता है पेड़ अपनी व्यथा सुना रहा मेरी कविता में

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