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संजय असवाल "नूतन"

Others

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संजय असवाल "नूतन"

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घरेलू औरतें

घरेलू औरतें

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घरेलू औरतें,

सुबह तड़के जग जाती हैं,

झाड़ू उठा कर घर की गंदगी को

शीशे सा साफ करती हैं।

वो हर काम

जो उसके नाम ही दर्ज है,

सुध - बुध खोकर दिल से करती है,

गुंजाइश रह जाए काम में उनके

ऐसा नामुमकिन है,

वो  भूल जाती है अकसर खुद को,

उनके लिए

जिन्हें उसकी रत्ती भर फिक्र नहीं है,

फर्क भी नहीं पड़ता उन्हें

कि वो दिन भर क्यों उनके लिए खुटती है।

घरेलू औरतें,

अकसर जी बहला लेती हैं अपना

एक दूसरे से बात करके,

दूसरों के नज़रों में

अपनों की बढ़ाई करके।

घरेलू औरतें, 

दिल हल्का कर लेती हैं

किसी की चुगली करके,

या एक दूसरे से लड़ के।

घरेलू औरतें,

रोक नहीं पाती

अपने आंसुओं को,

अपने दर्द को,

छुपा नहीं पाती 

जिस्म पर लगे जख्मों को,

जब वो तन्हा होती है।

घरेलू औरतें,

सब चुपचाप सुनती है,

सहती है,

और ये कहने सुनने का सिलसिला,

ताउम्र चलता है,

उसके आत्मा में लगे 

घाव के साथ।


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