युक्ति
युक्ति
अभी अपनी कहानी की ज़मीन तैयार ही कर रही थी कि बाहर से ज़ोर की चीख सुनाई दी "कोई बचाओ सहायता करो।" मैं समझ गई आज फिर गार्ड बाबू पीकर घर में खुराफात कर रहे हैं, अब यह तो आये दिन का तमाशा था। पहले लोग दौड़ जाते थे लेकिन गार्ड बाबू उनकी ऐसी लानत-मलामत करते कि सब मुँह लटकाये वापिस आ जाते। उसके बाद लोगों ने जाना ही छोड़ दिया।
मैं पुनः अपनी कहानी कि ज़मीन तलाशने लगी। अचानक दरवाज़े कि कुंडी खड़की मैंने दरवाज़ा खोला देखा गार्ड बाबू की छोटी बिटिया थी उसने घबराते हुए कहा "आंटी जल्दी चलिए मम्मी को कुछ हो गया है" मैंने सोचा ठाँव-कुठाँव लग गई क्या। दरवाज़ा बंद कर तेजी से उनके घर पहुँची, तय करके गई थी कि आज गार्ड बाबू की खबर ज़रूर लूंगी पर जैसे ही घर के अंदर गई वहाँ का दृश्य देखकर अचल रह गई। गार्ड बाबू हाथ जोड़े खडे़ थे और उनकी बीबी तडा़तड़ उनपर चाँटों की बौछार किये जा रही थी और बोल रही थीं, "अरे सुरेशा बचपन की मार भूल गया क्या मैं तुम्हारी दादी हूँ मर गई तो क्या मेरा ध्यान तुम सब पर अभी भी है। मैं तुम्हें वैसी ही सजा देने बाली हूँ।" बेचारे गार्ड बाबू जब काफी मार खा चुके तब दादी ने गरम जलेबी और समोसे लाने को कहा गार्ड बाबू जान बचा कर जलेबी और समौसा लाने दौडे़। मैंने उनकी पत्नी की तरफ देखा वे हँस रही थीं, उन्होंने कहा "कल गार्ड बाबू ने उनपर हाथ उठाया और मारते हुये कहा कि "बस दूनिया में अपनी दादी से ही डरता हूँ।" बस आज मैं दादी बन गई। तभी गार्ड बाबू जलेबी -समोसे लेकर आ गये दादी की मृतात्मा ने कहा "याद रखना सुरेशा दोबारा यह ग़लती की तो इससे भी ज्यादा मार पडे़गी।" सुरेशा गर्दन झुकाये हाथ जोडे़ खड़ा था और दादी जलेबी -समोसे से उदरपूर्ति कर रही थीं।
मैं घर आ गई और सोचने लगी अच्छी युक्ति निकाली गार्ड बाबू की पत्नी ने अंधविश्वास तो था पर भलाई भी थी।
