Vidya Sharma

Others


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वैदेही

वैदेही

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शाम होने को आई पर वैदेही का कहीं कुछ पता ना चला। मोबाइल भी घर पर था तो कोई और रास्ता नहीं नजर आ रहा था। पूरा घर मानो ठहर सा गया था।

25 सालों से सुबह 5:00 बजे से रात 11:00 बजे तक उसकी आवाज हर किसी की जिंदगी में दस्तक देती रही थी। किसी की टाई नहीं मिलती, किसी का नाश्ता लेट होता, किसी की दवाई, तो किसी का टिफिन। हर जुबान पर एक ही नाम वैदेही - वैदेही।सुबह 5:00 बजने से पहले ही घर में उसकी स्वरलहरियां बिखर जाती, कभी किसी का जगाना तो कभी किसी का चाय का वक्त।और आज वह नहीं है तो मानो पूरा घर साय -साय कर रहा था।वैदेही के पति हार कर पुलिस स्टेशन की ओर चल दिए। अब तक वैदेही की बेटी चारु भी शाम होते-होते घर आ पहुंची थी। बेटा अभी और बहू सिमरन पहले से ही मौजूद थे।

बेटी की शादी हुआ अभी एक महीना हुआ था जबकि बेटे अभि की शादी पिछले साल ही हुई थी और वह अपनी पत्नी के साथ बेंगलुरु में रहता था। सब हैरान परेशान सबकी जुबां पर एक ही सवाल था वैदेही कहां गई और क्यों गई।

ना कोई लड़ाई, ना झगड़ा ना किसी से कोई अनबन। ऐसी कोई बात नहीं निकल कर आ रहे थे जिससे कुछ पता चलता। परिवार के सभी लोग इकट्ठा थे, उसी की बातें, उसी की अच्छाइयों को याद कर रहे थे।इतने सालों में कभी किसी से कोई झगड़ा नहीं, सरस बहुत गुस्सैल स्वभाव के थे पर वैदेही कभी सरस से नहीं झगड़ती , चुपचाप सुन लेती छुप कर रो लेती।बच्चों को भी बड़े प्यार से पाला, सारी गृहस्थी को, हर रिश्ते को बड़े प्यार से संभाला ,कोई शिकायत का मौका नहीं दिया पर आज अचानक से जाने क्या हो गया किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था।वहां पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट लिखाने पहुंचे वैदेही के पति पुलिस ने कुछ औपचारिक सवाल पूछे जैसे कि उनका आपस का कोई मनमुटाव या किसी बाहरी व्यक्ति से कोई झगड़ा तो नहीं उसने ना में सिर हिला दियावह किसी बुत की तरह खड़े रहे।

वैदेही के पति सरस वैसे तो दिन में कई दफा,, वैदेही को लेक्चर दे देते थे कभी वजह होती थी और कभी बेवजह ,वैदेही किसी और के गुस्से का शिकार हो जाती। पर आज वह निशब्द हो गए थे, समझ नहीं पा रहे थे कैसे रियक्ट करें। उन्हें आज भी वैदेही पर बहुत गुस्सा आ रहा था पर करे भी तो क्या।

घर में पसरा सन्नाटा उनके मन में विचारों का चक्रवात उठा रहा था। अनायास ही उसके मन में पिछले साल बेटी की शादी से पहले की घटना याद आ गई।

उस रोज़ सरस बहुत गुस्से में आ गया था और वैदेही पर हाथ उठा दिया था बात बस इतनी थी कि सरस के कपड़े प्रेस नहीं थे।बोलते बोलते वह आपे से बाहर हुआ जा रहा था और वैदेही सिर झुकाए डबडबाई आंखों में आंसू भरे खड़ी सब चुपचाप सुन रही थी ।उसका हाथ उठाना उसे अंदर तक तोड़ गया था।

कुछ देर तक वह अपनी हिचकियों को अपने ही गले में दबाती रही, फिर अपने जख्मी दिल को संभाल कर बोली "मैं कमजोर नहीं हूं, ना डरती हूं ,बस ईश्वर ने कुछ जिम्मेदारियां दी हैं उनके पूरा होते ही मैं आपके जीवन से चली जाऊंगी ,"उसके शब्द आज भी उसके कानों को सुन्न कर रहे थे।

सरस.चिल्ला उठा !उसने कहा था वह चली जाएगी , उसने कहा था,,

उसकी इस हरकत से सभी लोग परेशान होगये, सब को लगा कि वैदेही के जाने का सदमा लगा है।सरस को धीरे-धीरे सब समझ आ रहा था ,

कि उस वक्त वैदेही ने क्या कहा था।तब तो शायद उसके अहम ने उसेनजरअंदाज कर दिया था ,पर आज उसे सब साफ-साफ और ठीक से समझ आ रहा था,कि अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो उसे छोड़ कर जा चुकी थी। पर उसका अहकारी पुरुष मन यह.स्वीकार करने को तैयार ना था।ऐसा कर वैदेही ने उसके अधिकार और अहंकार दोनों को चुनौती दी थी। बेटे अभि की नौकरी पिछले साल ही लग गई थी और शादी भी हो गई थी। और अब एक महीने पहले बेटी चारु की शादी कर वैदेही अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो गई थी।

सरस फिर से चिल्लाया "नहीं वैदेही तुम नहीं जा सकती, अभी तुम्हारी जिम्मेदारी नहीं खत्म हुई मेरी जिम्मेदारियां कौन लेगा मैं तो अकेला हो गया, मैं तो तुम्हारे सहारे था।क्यों गई मुझे छोड़कर ,"आज सरस.को एहसास हो रहा था कि वैदेही के बिना वह कितने अकेले हैं।पुरुष रोते नहीं इस मर्यादा को तोड़ा सरस किसी अबोध बालक की तरह रो पड़े। दोनों बच्चे सरस को इस तरह रोता देख परेशान हो गए। और इसी तरह बैठे अतीत के पन्ने पलटते रहे, वैदेही की बातें याद करते रहे,।

इसी तरह 2 दिन बीत गया और वैदेही का कुछ पता नहीं लगा।आज पुलिस ने सरस को पुलिस स्टेशन बुलाया था वहां से लौटते समय रेड लाइट को एक अनाथ बच्चा मिला जो पैसे मांग रहा था सहसा सरस का चेहरा उम्मीदों से भर गया ।वह उस बच्चे को पैसे देकर बड़ी तेजी से घर की ओर भागे और आते ही कमरे की ओर दौड़ पड़े। सब हैरान थे कि क्या हुआ। सरस अलमारी में कुछ ढूंढने लगे। एक-एक कर सारा सामान उलट पलट दिया। बड़ी कोशिशों के बाद उसे एक छोटा सा लिफाफा मिला, जिसे देखकर ऐसे खुश हुए मानव वैदेही ही मिल गई हो।

उसमें एक अनाथालय का पता लिखा था। सरस को याद आया कि कई साल पहले वैदेही ने कहा था कि वह अनाथ बच्चों के लिए कुछ करना चाहती है, उनकी मदद करना चाहती है ,पर सरस ने उसका मजाक उड़ाते हुए उसकी मदद करने से भी इनकार कर दिया था, और कहा था चुपचाप जिस तरह चल रहा है चलने दो और घर गिरस्ती संभालो ।इन तमाम के पचड़ों में मत पड़ो, यह सब तुम्हारे बस की नहीं है ।वह वह उन बातों को याद कर आसुओं से सराबोर हो गए और वैदेही को याद करने लगे।अभि और चारू ने पूछा पापा क्या हुआ मां का पता चला क्या?वह बिना कुछ कहे घर से बाहर निकाल गए ।

किसी को कुछ समझ नहीं आया। करीब 2 घंटे बाद सरस का फोन आया...

पापा कहां हो, पता है हम सब कितने परेशान हो गए हैं उधर से सरस की आवाज आई बेटा मैं मुंबई जा रहा हूं जल्दी लौटूंगा परेशान मत हो, इससे पहले अभि कुछ पूछता फोन कट गया उसने फिर से मिलाया तो फोन स्विच ऑफ बताने लगा ।दो दिन का सफर तय कर सरस लिफाफे में लिखे पते पर पहुंच गए।

यह पता था मुंबई की एक अनाथालय का खुशी ,घबराहट, डर और जाने कितने भाव उसके चेहरे पर एक साथ आ- जा रहे थे, पर सरस की बेचैनी कुछ ही देर की थी क्योंकि थोड़ी देर में ही वैदेही दिख गई, वह कुछ बच्चों को पढ़ा रही थी जो कि उसी अनाथालय के थे। उसे देखकर सरस का दिल खिल गया ,जैसे किसी बच्चे का खिलौना उसे वापस मिल जाए ,पर अगले ही पल उसके चेहरे पर डर के भावउभर आए ।पता नहीं वैदेही उसे माफ करेगी कि नहीं पर उसे अपनी गलती का एहसास हो चुका था ।इसलिए वैदेही की हर सजा मानने को तैयार था।उधर वैदेही को जब पता चला कि सरस आया है तो उससे मिलने आई ।आज सरस को एक अलग ही वैदेही दिखाई दे रही थी ,आत्मविश्वास से भरी हुई, हर कदम निडरता से उसकी ओर बढ़ रहे थे। आते ही वैदेही ने कहा"" आपको इतनी तकलीफ उठाने की क्या जरूरत पड़ गई, अब यही मेरा घर है और मेरी जिंदगी भर की जिम्मेदारी।

"पूरे 25 साल इंतजार किया है मैंने यहां आने के लिए""

सरस मुस्कुरा दिए ,बोले "हां वैदेही और इतना लंबा इंतजार तुम हीं कर सकती हो।"

मुझे माफ कर दो तुम्हारे इस जज्बात की ना तो कभी कदर की, ना कभी समझा ।पर अपने सपने कि इस बीज को तुमने 25 साल अपने दिल में जिंदा रखा।वैदेही मैं बहुत अकेला हो गया हूं। अधूरा हूं तुम्हारे बिना ।।

वैदेही बीच में ही बोली-- "सरस मैंने आपके बच्चों की अच्छी परवरिश की और उनकी शादी, नौकरी सब कुछ पूरा किया, अब यह मेरी जिन्दगी, है मैं वापस नहीं जाऊंगी।"

सरस मुस्कुराते हुए बोले-- "जानता हूं पर इस अनाथालय में मुझे भी रहने की मंजूरी दे दो क्योंकि आज तुम्हारे बिना मैं भी अनाथ हो गया हूं।मैं भी यही रहूंगा।" यह कहते कहते सरस का चेहरा आंसुओं से सराबोर हो गया उसको रोता देख वैदेही की आंखें भी बरस पड़ी।

सरस ने अभि को फोन कर बताया तुम्हारी मां मुंबई में है ,मैं भी यहीं हूं परेशान मत होना,हम दोनों अब यही रहेंगे ।

तुम सब अपनी जिंदगी जिओ ,जब मन करे मिलने आ जाना।हम दोनों मिल गए ,यह सुन अभि खुश हुआ ।अब सरस और वैदेही दोनों ही उस अनाथालय में रहने लगे ।और बच्चों की सेवा करने लगे जो कि वैदेही हमेशा से चाहती थी, पर परिवार की जिम्मेदारी और सरस के गुस्से की वजह से कभी ना कर पाए ।।

क्योंकि सरस.हमेशा कहते कि घर की जिम्मेदारी तो पूरी होती नहीं उनका भला क्या करोगी?तुम्हारे बस का नही कुछ और वह मन मार के रह जाती।पर मन ही मन उसने फैसला ले लिया था।।

आज वैदेही के साथ दोनों थे उसके सपने भी उसके अपने भी और यह सब मुमकिन हुआ वैदेही के साहस और विश्वास की वजह से...!



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