sushil pandey

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सरकार की मंशा समझने मे असमर्थ हूं !!!

सरकार की मंशा समझने मे असमर्थ हूं !!!

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मैने बहुत ज्यादा पढ़ाई तो नहीं की पर इतना नागरिक शास्त्र तो मैने भी समझा है कि किसी भी क्षेत्र में निजी कंपनी को उतारने की अनुमति सरकार प्रतिस्पर्धा को बढ़ाने के नियत से देती है वो भी नागरिकों की सुविधाओं को ध्यान मे रखते हुये।

मैं नागरिक शास्त्र तो फिर भी समझ गया, पर सरकार की मंशा समझने में असमर्थ हूं सरकार हर आने वाले वर्ष में विनिवेश का लक्ष्य बढ़ाती क्यों जा रही है?

2014 मे 24000 करोड़ से अभी 84000 करोड़ तक तो पहुंच गई है।

 विनिवेश तो मजबूरी होती है इसे आय का जरिया न बनाये श्रीमान।

BPCL, CONCOR, AIRINDIA, COAL INDIA, और अब आंशिक रूप से RAILWAYS सबको निजी क्यों करती जा रही है सरकार?

मेरी चिंता ये नहीं है कि लाखों लोगो की नौकरीयां जायेंगी और न मेरी चिंता ये है कि मालिकाना हक बदल जायेंगे।

सन 1974 मे 20 दिन की हड़ताल ने देश की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दिया था बकौल तत्कालीन रेलमंत्री ललित नारायण मिश्र, मतलब देश की अर्थव्यवस्था को इतना प्रभावित कर सकने की क्षमता वाली भारतीय रेल कैसे अब नुकसान देने लगी जबकि 1974 मे भारतीय रेल से प्रतिदिन 70 लाख लोग यात्रा करते थे और 6 लाख टन माल ढोया जाता था और कर्मचारी थे 17 लाख, अब 2019 मे 230 लाख लोग यात्रा करते हैं, 33 लाख टन माल ढुलाई होता है जबकि कर्मचारी 3 लाख कम हो गए। फिर नुकसान कैसे हो रहा है की बेचने की नौबत आ जा रही है? या फिर सरकार का काम Governance करना है धंधा करना नहीं, वाली कहावत को चरितार्थ करने का लक्ष्य है?

पर जरा बताइए तो प्रधानमंत्री जी क्या रेल का भाड़ा भी उतना ही रहेगा जितना अभी सरकार ले रही है?

हाँ ये ठीक है की सुविधायें अच्छी हो जायेंगी पर श्रीमान जो चेन्नई से चालू डब्बे में बैठकर पटना तक की यात्रा करते हैं क्या उनका ख्याल रखना आपकी जिम्मेदारी से परे हैं?

क्या उनको घर जाने के लिए अब लोन लेना पड़ेगा बैंकों से?

देश के करीब-करीब 80 करोड़ लोग जो सरकारी 05 किग्रा अनाज पर निर्भर हैं वो अच्छी सुविधाजनक यात्रा खोजते हैं या सस्ता किराया? आपने तो गरीबी देखी है सर?

अच्छा आपको क्या लगता है देश को ज्यादा, सरकारी रोडवेज की जरूरत है या निजी हाईक्लास वोल्वो बसों की?

ज्यादा चालू डब्बे वाली रेलगाड़ी की या बुलेट ट्रेन की?

एक देश के मुखिया के तौर पर सरकार मे रहते हुये, देश के नागरिकों के हितों का ख्याल रखना भी सरकार की जिम्मेदारी का अहम हिस्सा होना चाहिए मुझे ऐसा लगता है?

जब हम एक ऐसे दौर मे हैं जब स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को पूरा कर पाने मे सरकार असमर्थ है और सच भी है ऐसे अचानक से फैलने वाली महामारी मे अमेरिका, यूरोप तक असफल हुए तो अपनी बात करना बेमानी सी होगी।

पर श्रीमान आपके दरबार तक शायद बात ना पहुंची हो कि अब भारत मे मध्य और निम्न वर्ग मे किसी के कोरोना संक्रमित होने की स्थिति मे परिवार के सदस्य उसे मरा समझकर क्रिया-कर्म की व्यवस्था कर रहे है...

पता है क्यों?

क्योंकि सरकारी अस्पताल मे भर्ती होने के लिए जगह का आभाव है और निजी अस्पताल का खर्च उन्हे कोरोना से पहले मार देगा।

मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि ऐसा कौन सा उपचार कर रहे हैं ये लोग कि प्रतिदिन करीब-करीब 1 लाख मतलब 14 दिन का...??

शासकीय उपक्रमों को निजी करते हुये क्या सीमित लाभ कमाने जैसी भी कोई शर्त रखी जाती है या उन्हे जनता को लूटने के लिए स्वतंत्र रूप से छोड़ दिया जाता है?

चली तो बाजी ठीक थी तुमने, पासा भला क्यों फेंक दिया?

शपथ विकास की गई कहां, क्यों खुद ही रास्ता रोक दिया?

देश की चिंता घोर है तुम को, पर आभास नहीं क्यों होता है?

ये तो बताओ हाकिम घुटने, क्यों सेठों के आगे टेक दिया?


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