मुज़फ्फर इक़बाल सिद्दीकी

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3.7  

मुज़फ्फर इक़बाल सिद्दीकी

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परदेशी (कहानी)

परदेशी (कहानी)

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"सिमरन तेरा मोबाइल दिखाना ज़रा। पहले तो तेरे पास दूसरा हैण्ड सेट था? फिर नया ले लिया क्या?"

नहीं चाची वही पुराना है। मैंने तो केवल कवर चेंज किया है।

"अरे तो दिखाने में की हर्ज है।"

दरअसल सिमरन चाची को वह सेट दिखाना नहीं चाहती थी। लेकिन इसके चेहरे की खुशी इस चोरी को छिपा भी नहीं पा रही थी।

तू क्या समझती है। हम इतने बुढ्ढे भी नहीं हुए हैं कि इसे समझ ही न पाएँ। दिखा तो सही। कौन सी कंपनी का है?

चाची ने एक झटके में इसके हाथ से ले लिया। सिमरन और नमृता का ननद-भौजाई का रिश्ता नहीं था। थी तो चाची ही। बचपन से ही उसे गोद में खिलाया था। जगवीर भी अपनी भतीजी को बहुत चाहते थे। कभी-कभी तो इन्हीं के कमरे में सो जाती थी।

दरअसल सिमरन बहुत दिन बाद इस घर मे नन्हा सा मेहमान बनकर आई थी। बड़ी ख़ुशियाँ लुटाई गई थीं। बहुत प्यारी सी पूरे घर की लाडली थी, सिमरन।

वक़्त का पता ही न चला और कॉलेज में पहुँच गई। संयुक्त परिवार में वीर जी के साथ जगवीर और नम्रता शरू से ही इकट्ठे रहते आए थे।

चाची भी सिमरन को अपने बच्चों से बढ़ कर चाहती थी। बस फर्क इतना कि इसका प्यार माँ से एक डिग्री ऊपर था। मतलब दोस्ती का भी था। जो बात घर में किसी को न बताना होती। चाची को ज़रूर बता देती। चाची को तो अपनी सहेली मानने लगी थी। लेकिन चाची जब चाहती, माँ से भी बड़ी बन जाती और चोरी पकड़ी जाने पर, दीदी को बताने की धमकियां भी दे डालती।

अरे वाह .... ये तो आई-फोन है। अच्छा तो अब समझ आया। ये क्यों छिपाया जा रहा था, सबसे?

अब तो चाची डबल रोल में थी। देख सच-सच बताना नहीं तो पूरे घर में हल्ला कर दूँगी।

अरे चाची, मैं आपको बताने ही वाली थी कि आपने पूछ लिया। वह युवराज है न, मेरा दोस्त। कल ही आया है, कनाडा से।

अच्छा तो, तू मिल भी आई और मुझे बताया भी नहीं। देख सब समझती हूँ। जब इंसान के दिल में चोर होता है तो ऐसे ही छिपाता फिरता है, अपने आपको और उस चोर को, जो दिल में छिपा कर रखा है।


दरअसल प्यार-मोहब्बत का फलसफा ही दुनिया से छिप-छिपा कर शुरू होता है। दीवाने पहले तो अपनी मोहब्बत को दुनिया से छिपाते फिरते हैं। लेकिन उनको नहीं पता होता कि इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते। इसकी खुशबू पकड़ में आई ही जाती है। जब कोई बस नहीं चलता तो बागी हो जाते हैं। कभी घर से तो कभी पूरे सिस्टम से।

अगर तेरे दिल में उसके लिए कुछ-कुछ होता है न, तो बता दे। दीदी से बात करती हूँ। सिमरन मिन्नतें करने लगी। चाची प्लीज आप किसी को नहीं बताएंगी। ये तो उसने ऐसे ही दिया है, गिफ्ट में।

इधर नम्रता ने उस मोबाइल को अपने हाथ में लिया। और अपने अतीत की दुनिया में पहुँच गई। कॉलेज के ग्रेजुएशन पूरा होते-होते जगवीर से उसकी दोस्ती प्यार में बदल चुकी थी। तभी जगवीर को नौकरी के सिलसिले में दुबई जाना पड़ा।

फिर क्या था खुश्बूदार लेटर पैड पर खत लिखे जाते और पोस्ट करने के साथ ही शुरू हो जाती जवाब की प्रतीक्षा। दो-चार दिन तो ऐसे ही निकल जाते थे।

जगवीर जब पहली बार वापस आया तो हमारी कुड़माई हो गई। घर वाले मान गए थे। अब तो इंतज़ार की घड़ियां और लंबी हो गईं।

इसी बीच वक़्त बदला और गाँव में सबसे पहला टेलीफोन जागीरदार के यहाँ लगा।

मुझे अच्छी तरह याद है, पहली बार जागीरदार के यहाँ से कारिंदा खबर लेकर आया था।

- बीबी जी, जगवीर बाबू का आधे घंटे बाद टेलीफोन आयेगा। आप आ जाना।

कितनी खुशी हुई थी मुझे। मेरा दिल तो जैसे काबू में ही नहीं था। चुप-चाप से दीदी को साथ ले गई। जब फ़ोन अटेंड किया तो सब लोग चारों तरफ खड़े देख रहे थे। थोड़ी देर में तो पूरे गाँव को खबर हो गई थी कि आज जगवीर ने नम्रता को फोन किया था।

जब जगवीर शादी के वास्ते आया तो घर में टेलीफोन लगवाकर ही गया था। मैं भी अड़ गई थी कि तेरा टेलीफोन अटेंड करने जागीरदार के यहाँ नहीं जाऊंगी। वहाँ सब आँखें फाड़-फाड़ कर जो देखते हैं।

और अब की बार तो मैं ने ज़िद ही पकड़ ली। या तो तू मुझे साथ ले चल या मैं तुझे जाने नहीं दूँगी। कोई फोन के सहारे भी ज़िन्दगी कटे है?

वादा कर के गया था - "नम्रता बस तू छः महीने और दे दे। सारा बोरिया बिस्तर समेट कर आ जाऊँगा। फिर हम जीवन भर साथ रहेंगे।"

"अरे चाची आप कहाँ खो गईं।"- सिमरन ने अपना मोबाइल झट से ले लिया।

तभी घंटी बजी देखा तो युवराज का वीडियो काल था।

उसने अटेंड किया और चाची से भी बात करा दी।

सिमरन तू ने पहले क्यों नहीं बताया। ये तो बहुत अच्छा लड़का है। आज ही वीर जी और दीदी से बात करती हूँ।

"सिमरन नम्रता की बात सुनकर शर्मा गई।"

कोई जवाब नही दिया।



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