पहला प्यार
पहला प्यार
रिया -"रीता! वह रोज मेरा पीछा करता है, ज्यों ही कक्षाएं पूरी होती है, जाने कब वह कहाँ से आ जाता है और पूरे घर के रास्ते तक साथ ही चलता है। समझ नहीं आता, आखिर वह ऐसा क्यों करता है?"
रीता -"ओ रिया! यह तो सचमुच में बहुत ही अजीब बात है। क्या वो लोफर लगता है ?"
रिया-" नहीं। बिल्कुल नहीं। "
रीता -"छोड़ो, इन सब बातों को। यह सब सोचकर कोई फायदा नहीं। "
समय पंख लगाए उड़ रहा था। यही सिलसिला चलता रहा। रिया बहुत परेशान थी, आखिर यह कौन है?
फिर एक दिन अचानक, उसकी नज़र कक्षा के एक विद्यार्थी पर पड़ी, जो सर के प्रश्नों का उत्तर दे रहा था, यह वही लड़का था, जो उसका रोज पीछा करता था। जब उसने देखा कि यह उसकी ही कक्षा का एक विद्यार्थी है, उसने उससे बात करने की सोची। मगर फिर वह ऐसा नहीं की।
फिर वही सिलसिला प्रारंभ हुआ। रिया पैदल चले, वे भी पैदल चलता और रिया साइकिल तेज चलाए तो वह लड़का भी साइकिल तेज चलाता। हर हाल में वे उसके साथ ही चलता।
एक दिन रिया ने अपनी उलझन को खत्म करने की सोची और उससे बात कर ही ली। अब लगभग रिया की रोज ही उससे बात होने लगी। कुछ समय बाद उसको पता चला कि कितने ही फैकल्टीज की छात्राएं उसकी दीवानी हैं। उसकी कक्षा की ही कितनी छात्राएं उसके आगे-पीछे घूमती हैं। रिया को खुद पर ही क्रोध आ रहा था कि उसने बात ही क्यों की। अब तो समय बीत रहा था, यही सब चल रहा था कि एक दिन अचानक राजकुमार ने उससे पूछ लिया, " आप ऐसे पुरुष से शादी करना चाहेंगी जो महीने का मात्र दो हज़ार कमाता हो?" रिया आश्चर्यचकित हो गई कि यह आखिर पूछ क्यों रहा है। उसने कहा, "नहीं। बिल्कुल नहीं। "
राजकुमार-" हाँ ठीक ही है। मेरी भी शादी भैया के साली से तय है, मैं उनकी मर्जी को ही पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध हूँ। उन्होंने ही मुझे पढ़ाया- लिखाया है और मैं उनके ही आदेश को मानूँगा। उनका कर्ज मैं नहीं चुका पाऊंगा। मैं ऋणी हूँ।
रिया बातों का इशारा समझ गयी और वो प्रेम का बीज जो अभी सींचने की बहुत जरूरत थी, उसे कदमों तले रौंद दिया। मगर वो ईश्वरीय प्रेम के आँसू जिसे वे घूँट-घूँट कर अकेले में पीती ही रही, उसे लगता है कि वह आँसू सागर है, जो खत्म ही नहीं होते और गाहे-बगाहे खुद को तन्हा पाकर आँखों से ढुलक ही जाते हैं। वो भले ही मिट्टी में मिल धूल हो जाए, मगर वो प्रेम के आँसू हमेशा के लिए ज़िंदा रहेंगे और अपने प्रिय की याद में बहते रहेंगे।
