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Sanjay Aswal

Others


4.3  

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फिर आना गांव -३

फिर आना गांव -३

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गांव में बच्चों के साथ दिन मौज मस्ती में गुजर रहे थे, कभी खेतों में उन्हे ले जाता, कभी पास के जंगल में हम सब गाय चराने जाते, गांव के कुल देवता के मंदिर में घंटों समय बिताते, मै तिमले(पहाड़ी फल) के पेड़ से ढेर सारे तिमले निकालता और नमक के साथ खाता, बचपन में मैं अक्सर घर से नमक की पुड़िया बना कर तिमले खाने चला आता था, वो याद भी यहां आकर ताज़ा हो गई। 

आज बच्चों और धर्म पत्नी जी के साथ पास के गदन ( पहाड़ी नदी) में जाने का मौका मिला, वहां बच्चों के संग पानी में खूब अठखेलियां की, मछलियां पकड़ कर उन्हें फिर से पानी में डालना, पानी में पांव से छप छप करना, खूब सारी बेर, हिसर तोड़ कर खाना, सच बचपन की एक एक याद जेहन में आज ताज़ा हो रही थी। 

गांव में जब से आए तब से धर्म पत्नी जी ने भी सास की सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ रखी थी उन्हें किचन में जाने ही नहीं देती, खाना बनाना, गायों को पानी देना चारा भूसा देना, खुद करती तो मां डांटती कि ऐसी आदत मत डलाओ मुझे, बाद में तुम लोगों के जाने के बाद तो खुद ही करना है तो धर्म पत्नी जी कहती जब तक यहां हूं तब तक सेवा करने का मौका हाथ से नहीं जाने दूंगी। 

मैं भी बच्चों को लेकर पिताजी के साथ खेतों में चला जाता, गेहूं की खरपतवार कटाई छटाई करने, मेढों को ठीक करने, टूटी दीवारों को बनाने, उधर बच्चे खेतों में भागते उछल कूद करते बहुत खुश दिख रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे बरसों के बंधन से मुक्त हो गए हो। 

मैं खुद काम की व्यस्तता से खुद को आजाद पा रहा था। शरीर में एक नई ऊर्जा का संचार हो रहा था। किसी चीज की कोई चिंता ही नहीं थी, गांव में सब व्यस्त होते हुए भी खुश थे। बच्चों को लेकर गांव में जाना रिश्तेदारों की कुशल क्षेम पूछना मिलना मिलाना होता, जहां जाते वहीं चूडे(कुटा हुआ चावल) का स्वाद लेते, अरसे खाते कहीं दूध कहीं मठहा खाने पीने की कहीं फिक्र ही नहीं होती जिनके घर जाते वहीं खाना खा कर आ जाते,गांव में अब भी बहुत अपनापन है, सभी आपस में रिश्तेदार भी हैं कोई चाचा कोई ताऊ कोई भाई। पिताजी बताते हैं कि हम सब के पुरखे एक ही थे जो बाद में बढ़ते बढ़ते गांव बन गया।

समय भी गांव में घूमते मौज मस्ती में कब गुजर गया पता ही नहीं चला, आज हमें गांव में पूरे एक महीने हो गए हैं और ऐसा लग रहा है जैसे कल ही तो आए हो। बच्चे भी पूरी तरह से गांव के जीवन में ढब गए थे, गांव में ही उनके बहुत दोस्त बन गए जिनके साथ दिन भर गांव में घूमते मस्ती करते, कभी पंधेरे ( गांव का पनघट) में जाकर पानी लाते, दादी दादा संग हंसी ठिठोली करते उनके साथ सगोडे ( किचन गार्डन) में जा कर सब्जियां तोड़ते, दादी मम्मी के साथ गाय दुहाने छनी ( गौशाला) में जाते बस ऐसे खुशी ख़ुशी में दिन उनके दिन बीत रहे थे।

कल दोनों बच्चे अपनी दादी और मम्मी संग पास के गांव के मेले में जाने का प्लान बना रहे हैं तो मैंने भी चलने को हामी भर दी। मुझे भी एक अरसा बीत गया मेले देखे हुए(बचपन में खूब मेले देखे थे मां पिताजी संग)। आज सभी नहा धोकर मेले के लिए तैयार हो गए ,गांव के कुछ लोग भी मेले में चलने को तैयार थे। सभी कच्ची पगडंडियों से नीचे उतरते पहाड़ी रास्तों से होते काफी चलने के बाद भगुलिनाथ मंदिर पहुंच गए, यही पर हर साल मेला लगता है। सबने पहले भोलेनाथ के दर्शन किए, यहां की बड़ी मान्यता है कि यहां सभी की मन्नतें पूरी होती हैं। फिर सभी पास के मेले में पहुंचे, बड़ी भीड़ थी, आस पास के गांव से भी लोग आए थे, चरखी झूला, बहुत छोटी छोटी दुकानें सजी थी, कहीं लोग चाट खा रहे थे कहीं कोई खरीदारी कर रहे थे, बच्चे अपने लिए खिलौने ले रहे थे, धर्म पत्नी जी बहुत खुश थी उन्हें उनकी पुरानी दोस्त मेले में मिली जो पास के ही गांव में रहती थी, उनसे मिल कर धर्मपत्नी जी बहुत नम थी, वो मुझे बता रही थी कि शादी के बाद नई नई बहुएं इस मेले में आती तो उनसे मिलने उनके मायके वाले आते वो अपनी बेटियों के लिए कलेवा, भारा कंडा लेकर आते, धर्म पत्नी जी जब ये सब हमें बता रही थी तो अपने पुराने दिनों में खो गई थी, आज इस मेले ने उनकी पुरानी याद ताजा कर दी। इसके बाद फिर सबने मेले में जलेबी समोसे, मिठाइयां खरीदी, और खाई। मैंने अपनी मां के लिए एक चिमटा और एक डालिया खरीदा। मेले की रौनक देख कर बड़ा मज़ा आ रहा था। काफी समय बिताने के बाद हम सभी ख़ुशी खुशी गांव लौट गए। गांव में बिताए ये अनुभव मेरी जिंदगी के पन्नों पर हमेशा के लिए छप रहे थे जिन्हें आने वाले समय के लिए मैंने इस दिल में संजोए रख दिया था।


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