Rajesh Chandrani Madanlal Jain

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Rajesh Chandrani Madanlal Jain

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मैं, तुम्हें देख लूँगा … (संस्मरण)

मैं, तुम्हें देख लूँगा … (संस्मरण)

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मुझे, नौकरी करते 5-6 वर्ष हुए थे। उस समय हर बात में मेरा तर्क यह रहा करता था कि मैं, नौकरी किसी बॉस की नहीं करता हूँ, एक सरकारी विभाग की सर्विस होने से मैं जनता की नौकरी करता हूँ। जो नियम हैं एवं जो कार्य जनहित के हैं वह मुझे करने हैं। बॉस की किसी सनक में दिए गए निर्देशों का पालन करना मेरी बाध्यता नहीं है। 

ऐसे विचार होने से मेरे पिछले कार्यपालन यंत्री से, मेरी बनती नहीं थी। जब उनका स्थानांतर हुआ तब उनकी जगह आये नए कार्यपालन यंत्री को उन्होंने (पिछले बॉस ने), ड्रिंक्स के बीच मेरे बारे में जो भी बताया था, उसे लेकर, मेरे नए बॉस मेरे प्रति बायस्ड (पूर्वाग्रह ग्रसित) हो गए थे। 

तब मैं, सहायक अभियंता था। साथ ही मैं, अपनी माँ एवं बाबूजी की मुझसे अपेक्षा के कारण, अपना खान पान (आज भी) शुद्ध रखता था।

नए कार्यपालन यंत्री अकेले ही आये थे। उनकी पत्नी (एवं बच्चे) अन्य शहर में जॉब में होने से साथ नहीं रहते थे। ऐसे में मेरे नए बॉस को हर रात्रि ड्रिंक्स की तलब होती थी। तब, आरंभिक कुछ दिनों में मैंने, मद्य-त्यागी (नॉन ड्रिंकर) रहते हुए भी उनके साथ निभाने की कोशिश की थी। 

हमारे कार्य क्षेत्र में, हमारा कार्य बिजली प्रदाय को निर्बाधित रखने का होने से, विद्युत प्रदाय भंग होने पर रात में भी किसी भी समय, मेरा कार्य शुरू हो जाता था। अतः प्रतिदिन बॉस का ऐसा साथ, मुझ पर एक अनावश्यक भार था। अतः यह क्रम मुझे तोड़ना पड़ा था। 

वे बायस्ड पहले ही थे, ऐसे में मेरा उनकी पार्टी में ना होना, उन्हें अच्छा नहीं लगा था। एक रात करीब एक बजे कॉलबेल बजने से, मेरी नींद खुली थी। वैसे तो किसी फीडर या ट्रांसफार्मर के ब्रेकडाउन/फेलुअर की सूचना मुझे, दूरभाष पर प्राप्त होती थी। तब मैं, यह सोचते हुआ उठा था कि शायद इनकमिंग कॉल की रिंग, नींद में मुझसे अनसुनी हो गई है। इसलिए कोई कर्मचारी सूचना देने, स्वयं आया है। 

दरवाज़ा खोलने के पहले मैंने बाहर का बल्ब जलाया था। फिर दरवाज़ा खोला तो मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि मेरे बॉस, दरवाज़े पर खड़े हैं। उनका गोरा चेहरा ड्रिंक की अधिकता में लाल हो रहा था। वे खड़े रहने के लिए दीवार का सहारा ले रहे थे। उनकी इस हालत में, उन्हें देर रात्रि घर के भीतर बुलाने का कोई औचित्य नहीं दिखा था। मैंने उनसे पूछा -

सर, क्या परेशानी है आप इतनी रात आये हैं?

उन्होंने नाराज़गी से लड़खड़ाते स्वर में कहा - तुम बहुत बकबक करते हो मैं तुम्हें देख लूँगा। 

अब स्पष्ट हो गया था कि उनका, मेरे प्रति बायस्ड होना साथ ही अधिक नशा कर लेना उनके ऐसे अजीब तरह से मेरे दरवाज़े पर आने का कारण है। मैंने कुछ पल सोचा फिर कहा - 

सर, रात अभी बहुत हो गई है। आप, सुबह मुझे देख लेना। अभी घर जाकर आराम कीजिये। 

यह कहने के साथ ही मैंने, उनके सामने खड़े रहते ही दरवाज़ा बंद कर दिया था। उनका क्वार्टर मेरे से, लगभग 50 मीटर दूर था। कोई सामान्य बात होती तो उनकी नशे की हालत में मैं, उन्हें, उनके घर तक सहारा देकर छोड़ आता। उनका यह कार्य लेकिन मुझे, स्वयं के लिए अनावश्यक उत्पीड़न सा अनुभव हुआ था। मैं, उस दिन ऐसी उदारता नहीं दिखा पाया था। 

उस रात वापिस सोने की चेष्टा करते हुए मेरे मन में विचार था कि इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ते हुए हमें, अपने एक साल सीनियर का भी रेस्पेक्ट करना सिखाया जाता है। मगर यहां मैं, 10 साल सीनियर बॉस का रेस्पेक्ट नहीं कर पाया था। 

अगली सुबह नियमित रूप से मैं आठ बजे ऑफिस पहुँच गया था। मैंने, विद्युत प्रदाय अवरोध की लंबित रह गई शिकायतों का, रजिस्टर से अवलोकन किया था। तब अपने अधीनस्थ तकनीकी कर्मियों एवं वाहन को रखरखाव तथा निर्माण कार्यों के निर्देश एवं सामग्री प्रदान करते हुए विभिन्न स्थानों के लिए रवाना किया था। उस समय लगभग 9.30 बजे, दूरभाष पर, मेरे बॉस का फोन आया। वे कह रहे थे -

जैन साहब, आप मेरे ऑफिस आ जाइये। 

उनका संभागीय कार्यालय, मेरे उपसंभाग कार्यालय से लगभग एक किमी दूर था। मैंने उनके निर्देश पालन में कोई देरी नहीं की थी। कोई दस मिनट में, मैं उनके सामने पहुंच गया था। रास्ते में मैं, सोचता आया था कि वे क्या क्या कह सकते हैं और मेरे जवाब क्या होने चाहिये। 

बॉस, उस समय डॉकपैड देख रहे थे। रात के विपरीत इस समय वे पूरे होश में दिख रहे थे। मुझे देख कर उन्होंने, मुझे सामने कुर्सी पर बैठने का इशारा किया था। मैं बैठ गया था। 

वे इनवर्ड डॉक पढ़ने में व्यस्त थे। मैं, प्रतीक्षा में था कि वे कुछ कहें। तब उन्होंने कुछ कहने के स्थान पर घंटी बजाई थी। चपरासी के आने पर उसको, चाय लाने को कहा था। 

हम शांत ऐसे ही आमने सामने बैठे हुए थे। चाय आई थी। उनके कहने पर मैंने, उनके साथ ही चाय ली थी। चाय की चुस्कियों के बीच भी मुझसे, उन्होंने कुछ नहीं कहा था। चाय के बाद मैंने, कुछ मिनट और उनके कुछ कहे जाने का इंतजार किया था। उन्हें पेपर्स ही देखने में मगन देखकर आखिर मैंने उनसे पूछा था -

सर, मुझे कुछ जरूरी काम देखने हैं मैं, अब जाऊँ?

उन्होंने अब मेरे तरफ सीधे देखा था फिर कहा - हाँ, ठीक है। 

मैं वापसी में सोच रहा था कि ऐसे अनूठे ढंग से उन्होंने, मुझे देख लिया था। शायद वे यह परीक्षण कर रहे थे कि रात की घटना के बाद, उनका सामना करने का साहस मुझ में है भी या नहीं!

तब मेरा तर्क यह था कि मैंने, कुछ गलत किया ही नहीं तो मुझे सिर्फ इस बात से क्यों डरना कि बॉस नाराज़ होकर मेरा कुछ बिगाड़ करेंगे। मैं, उनके प्रति उत्तरदायी तब तक ही तो हूँ जब तक वे मेरी ड्यूटी एवं जन सेवा के लिए मुझे निर्देश देते हैं। 

अंत में मेरा यह लिखना उचित होगा कि ऐसे मुझे देख लेने के बाद उन्होंने, उस साल की मेरी कॉन्फिडेंशिअल रिपोर्ट में, अपना दर्ज किया ग्रेड मुझे दिखाया था। मेरी सर्विस में वह शायद पहली बार था, जब मुझे A+ मिला था। 

मेरे वह बॉस दिल के अच्छे आदमी थे बशर्ते, जब वे नशे में नहीं होते थे। 


(नोट- नाम/स्थान आदि का उल्लेख मैंने, जान बूझकर नहीं किया है। मेरे उन बॉस को, सेवानिवृत्त हुए दस वर्ष हो गए हैं। अब वे सीनियर ही नहीं सीनियर सिटीजन भी हैं। मेरे द्वारा, अपनी छवि बनाने के प्रयास में, उनके सम्मान में कमी करने का कार्य उचित नहीं होगा)  



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