Read #1 book on Hinduism and enhance your understanding of ancient Indian history.
Read #1 book on Hinduism and enhance your understanding of ancient Indian history.

Moumita Bagchi

Others


3  

Moumita Bagchi

Others


क्वेरेन्टाइन का पाँचवा दिन

क्वेरेन्टाइन का पाँचवा दिन

3 mins 130 3 mins 130

मैं हूँ गोविन्द त्रिपाठी, उम्र सत्तर वर्ष। मैं तरुण का पिता हूँ। तरुण मेरा सबसे छोटा पुत्र है। मैं और मेरी पत्नी बीस फरवरी को अपने बेटे के घर आए थे। नहीं घूमने नहीं, बेटे ने बुलवाया था।

फरवरी के अंत से टिया बिटिया की स्कूल की छुट्टियाँ शुरु हो रही थी, इसलिए।

बहू ऑफिस जाती है तो टिया के लिए किसी का घर में होना जरूरी था। हम दोनों बुजुर्ग वैसे भी बेकार ही घर पर बैठै रहते हैं, सो हमें बुलवा लिया गया।

मेरी अभी इतनी उम्र हो गई है कि खेती बाड़ी ठीक से संभाल नहीं पाता हूँ। जरा आराम तलब भी हो गया हूँ, शायद।

और कितना काम करूँ? साठ वर्ष तक बैंक में नौकरी की है। चार बच्चों को पढ़ाया लिखाया। उनकी शादी करवाई। साथ-साथ पुश्तैनी खेती का काम भी संभालता रहा। मुझे भी तो आराम करने का हक है कि नहीं?

यह लाॅकडाउन एक तरह से अच्छा ही हुआ है।

बेटे के यहाँ

भरपूर आराम है। दिन भर खायो-पियो, दो अखबार पूरा पढ़ लेता हूँ, सुबह सुबह। और फिर दिनभर टिया दीदी के साथ खेलो। हमने टेरैस में कुछ पौधे भी लगवाए हैं।

हाँ, मैं अपनी पोती को दीदी कहता हूँ, क्योंकि वह मुझे दादा कहती है, इसलिए।

सिर्फ एक ही मुश्किल हैं, यहाँ।

चुपके से तुम्हें बता दूँ ,मेरी डायरी। सास और बहू के बीच बहुत मनमुटाव है। कोई किसी को मुँह पर नहीं कहता । परंतु अंदर ही अंदर दोनों रोश से भरे रहते हैं। मैं सब समझता हूँ।

मंजू अकेले में जब बड़बड़ाती है। सब तो मुझे ही सुनना पड़ता है।

अब मंजू बेचारी भी क्या करें ? पढ़ी-लिखी और कामकाजी बहू को कुछ कह नहीं पाती। उसकी सासगिरी यहाँ बिलकुल नहीं चल पाती! तरुण ढाल बनकर अपनी बीवी की रक्षा करता है।

वह बेचारा भी क्या करें?अपनी पसंद की लड़की से शादी जो की थी।

जानती हो डायरी, मैं तरुण के इस व्यवहार से बहुत खुश हूँ, चाहे मंजू को कितना भी बुरा क्यों न लगे? हम कभी अपनी बीवी के पक्ष में एकबार भी न खड़े हो पाए थे। वह समय ही अलग था!

माता-पिता के खिलाफ एक भी शब्द कहना उस जमाने में संभव न था।

यहाँ की सुख साधनों को देखकर मंजू को भी अपने कष्टमय जीवन की जब तब याद हो जाती है। वह तब तुलान्मक हो जाती है। उसकी बड़बड़ाहट और बड़ जाती है।

" हमारे समय में ऐसा कहाँ होता था।"

वह अकसर कहती हुई सुनी जाती है।

पर, सच ही तो कहती हैं!

सुनो, एक अच्छी बात भी हुई है, लाॅकडाउन से।  अब

सारा परिवार इकट्ठे रह पा रहे हैं। सुबह- सुबह नाश्ते में वही छोले पूरियाँ खाने को मिल रही है। और खाते हुए डाइनिंग टेबुल में वही पुरानी बातों का सिलसिला, पुराने दिनों की याद ताजा कर देती हैं।

वरना, अरसा हो गया था, तीन पीढ़ियों का यों एक साथ मिलकर हँसी- मज़ाक करना !


Rate this content
Log in