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कुछ खास

कुछ खास

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कुछ खास कभी भी नहीं थी मैं, पर हाँ बनना ज़रूर चाहती। सपने भी खास नही थे पर खुल के जीना था मुझे। पर समय इतनी तेजी से बढ़ा कि रफ्तार ही नहीं पकड़ पाई। जहाँ से शुरुआत की कोशिश की थी वही खड़ी रह गई। पर हिम्मत नहीं हारी और अपने तमाम अवगुणों के साथ बढ़ रही हूँ।


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