गुरुकुल
गुरुकुल
रात को सोहम थका हारा अपनी दादी के गोद में सर रखता है, तब सोहम की दादी भगवान के भजन गा रही थी। यह देखकर दादी बोली कभी न थकने वाला मेरा सोहम आज थक गया ऐसा लग रहा है। सोहम बोला, "क्या करूं दादी आज के टीचर्स न जाने क्या-क्या करवाते रहते है। दादी को यह बात खटकी तो उसने कहाँ, थकान मिटाने के लिए एक कहानी सुनोगें। नींद तो आ नही रही, तो आप कहानी ही सुना दिजिये।
दादी कहानी की शुरुआत करती है," पुराने समय की बात है जब राजा महाराजा हुआ करते थे। वह लोग अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए एक गुरु के पास गुरुकुल भेजते थे। तो एक बार एक राजा अपने लड़के को पढ़ने के लिए गुरूकुल भेजता है जहाँ आसपास के कई राजा रजवाड़ों के राजा और बड़े-बड़े मंत्री और धनवानों के बच्चे पढ़ते थे। उस राजा का एक वफादार मंत्री था जिसका एक बेटा था जो की शारीरिक रूप से उस आयु के बच्चों से कमजोर था। कमजोर होने की वजह से वह जल्द थक जाता था, चाहे वह कुछ भी करे वह थक कर बैठ जाता था। मंत्री को जब यह बात पता चली की राजा अपने लड़के को गुरुकुल भेज रहे हैं तो उनसे बात करके अपने लड़के का भी दाखिला गुरुकुल में करवाता है।
राजकुमार और श्याम (मंत्री का बेटा) दोनों ही गुरुकुल पहुंचते है। पहुंचते ही दोनों गुरु के चरणस्पर्श करके आशिर्वाद लेते है। उसके साथ दोनों सारे बच्चों से मिलकर उनके साथ अभ्यास शुरू करते है। एक सप्ताह में गुरु अपने शिष्यों की प्रतिभा को जान जाते है। श्याम की कमजोरी को देखकर वह उसे हिसाब किताब की पढ़ाई करवाते है और बाकी समय अपने साथ रखते है।
लेकिन श्याम की एक अच्छी आदत थी की वह आज्ञाकारी था। जैसा उसके गुरु कहते थे, ठीक वह वैसा ही करता था। इससे उसके गुरु भी श्याम से खुश रहते थे। उन सब से अगर थोड़ा समय बच जाता तो वह दूसरे विषयों की भी पढा़ई करता। अगर कुछ नही मिलता तो गुरु को देखता रहता, वह जो कहते उसे याद रखता, जैसा करते वैसा करने की कोशिश करता।
समय बीतता गया। अपने विषय में सर्वश्रेष्ठ तो नही बन पाया लेकिन गुरु को देख देखकर इतना सिख गया की किसी से पीछे ना रहे। उधर बाकी बच्चे भी अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे। कई बच्चें तो कई विद्या में पारंगत होने तक पहुँच गए।
पढ़ाई बस खत्म होने ही वाली थी, थोडे़ ही दिन बचे थे। तभी कई राजा और मंत्री जिनके बच्चे यहाँ पढते थे वह आ पहुंचे। बच्चों की पढ़ाई की बातें की। पता नही क्यों सबको अचानक से कहीं जाना पड़ा। सब लोग गुरु के साथ वहाँ के लिए निकल गये। रात को सब बच्चे सो गये। सब को सोये हुए थोड़ी देर ही हुई थी की अचानक वहाँ कोई भागता हुआ आया, और जोर-जोर से दरवाजा पीटने लगा। सारे बच्चे जाग गये। वह कोई सिपाही था लेकिन देखने से ऐसा लग रहा था मानो कहीं दूर से भागकर आ रहा हो, इसलिए इसकी सासे चड्डी हुई थी और कुछ बोल नही पा रहा था। सारे बच्चे गुरुकुल में सिखे शिष्टाचार दिखाते हुए पानी देते हैं, और पूरी बात जानते हैं।
बात यह थी कि वह पास ही के गांव का सिपाही है और उनके गांव के राजा सहित सारे बड़े अधिकारी गांव छोड़कर पलायन कर चुके है। और गांव में अगर यह बात पता चली तो हाहाकार मच जायेगा। इसलिए मदद मांगने आया है।
अब तक तो सब ठीक चला। सारे बच्चे आपस में इस विषय पर बात करने लगे। किसी ने कहा गांव की बात गांव के लोग सुलझाये तो अच्छा। किसी ने कहा जब हमारे यहाँ से कोई सिपाही आयेगा तो हम अपने राज्य को संदेशा भिजवा देगें। राजकुमार ने कहा पिताजी थोड़े समय के बाद आयेगें तब तक रुकते है। सबने उस सिपाही से कहा रात हो चुकी है विश्राम कर लिजिये। तभी श्याम को गुरु की बात याद आती है और वो कहता है पहले हमें परिस्थिति समझनी चाहिए, मदद करना या नही उसको देखने के बाद तय करते हैं। श्याम की यह बात राजकुमार और गुरुकुल के विधार्थी को अच्छी लगी और उन्होंने गांव की स्थिति देखने का मन बनाया। और सिपाही के साथ निकल पड़े।
सुबह होते होते वह लोग गांव पहुंच गये। गांव में देखा तो अफरातफरी मची हुई थी, गांव के सब लोग वह बात पता चल चुकी थी। कोई रो रहा था। कोई सामान समेटने में लगा था। गांव में भगदड़ का माहौल था। कोई कोई तो लूटपाट पर उतर आया था।
गुरु की धैर्य बनाये रखने की बात याद आयी तो श्याम ने उस पर अमल किया और सिपाही से सब सिपाही को एकजुट करने के लिए कहा। सब सिपाही एकजुट हुए। जितने भी बच्चे आये थे उन्होंने जितना भी पढ़ा था उसमें जो ठीक लग रहा था उस पर आपस में चर्चा करने लगे। अंत में निर्णय लिया पहले जिस तरह चल रहा था वैसे चलाया जाये। सब ने वही किया सब शांत होता दिखा। लेकिन लूटपाट अभी जारी थी, उस पर शिष्यों ने गुस्सा होकर ताकत से कुचलने की कोशिश की।
लेकिन परिणाम सोच से विपरीत आया। विद्रोह होने लगा। "तुम यहाँ के नही हो हम तुम्हारी बात क्यों माने। जो राजपरिवार से थे उन्होंने अपना परिचय दिया। "होगे तुम तुम्हारे राज्य के राजकुमार। हमारा तुमसे कोई लेना-देना नहीं है, इसलिए यहाँ से चुपचाप चले जाओ।" इन सब बातों से राजकुमारों को गुस्सा आया और लडाई पर उतर आए। थोड़ी देर में एक सिपाही भागता आया और बोला डाकू हमला करने के लिए आ रहे हैं।
यह सुनकर सारे शिष्य जाने की तैयारी कर ने लगते है लेकिन श्याम रुकता है उसे गुरु की बात याद आती है कभी भी किसी काम को अधूरा मत छोड़ो। श्याम उस सिपाही को कहकर, गांववासी को लेकर किसी सुरक्षित जगह के निकलता है।
गांव से निकलने ही वाला होता है की सामने वो डाकू आ जाते है। श्याम और सारे शिष्यों, सिपाही गांव वासियों को सुरक्षित निकालने के लिए अपनी तलवार निकालते हैं तभी डाकुओं में से एक डाकू आगे आता है और अपना चेहरा दिखाता है। वह और कोई नहीं बल्कि उनके गुरु होते है और यह सब उनकी परीक्षा होती है।
सारे शिष्यों के प्रर्दशन से सब खुश होते है। गुरु की सिखाई बातों से श्याम और बाकी सब इस परिस्थिति से निपट पाये।
दादी अपनी कहानी खत्म करती है। और सोहम को उस कहानी की सिख देते हुए कहती हैं,
"कोई कुछ सिखा रहा है तो उसे सिख लेना चाहिए।"
