एक जवान की डायरी से
एक जवान की डायरी से
हाँ, यह सच है मैं शिवा सीआरपीएफ का एक जवान हूँ और परिवार से भी बहुत पहले मैंने माँ भारती को ही हृदय में स्थान दिया है। मेरे खून के हर एक कतरे में माँ भारती का ही नाम लिखा है ।
मैं अपने संग हर जगह अपनी एक डायरी और कलम जरूर रखता हूँ। जब मुझे कोई बात सताती है या किसी की याद आती है, ऐसे में ये डायरी 'पृथ्वी' मेरे ग़म के भार को सहती है। डायरी छोटी रखता हूँ, एक यदि कहीं खो जाए, छूट जाए या गिर जाए, तो जीवन के कुछ पल ही समय की गोद में समाए। वरना मैं चाहता हूँ ये 'पृथ्वी' भी भारत माँ की सेवा में सदा जागती रहे।
फिलहाल, जब तक मैं अपनी मंज़िल तक नहीं पहुँच जाता हूँ, मैं अपनी डायरी से ही बातें कर लेता हूँ। इस वक्त हमारी बस जिधर से गुजर रही है ,उस जगह का नाम पंवनगाम है और जिसे कश्मीरी लहजे में 'पुलवोम' कहा जाता है। यहाँ अत्यधिक दुग्ध- उत्पादन होता है और इसी कारण इसे 'कश्मीर का आणंद' या कश्मीर का दुधा-कुल भी कहा जाता है। यहाँ अत्यधिक धान की खेती होती है ,इस कारण यह 'धान का कटोरा' की भी उपाधि से नवाजा गया है। यह कश्मीर घाटी के श्रीनगर और अनंतनाग के मध्य राष्ट्रीय राजमार्ग 44 पर स्थित है।
ये तो पुलवामा को देखने का कुछ अलग दृष्टिकोण था ।कुछ अलग तरीके से कहूँ तो यह कश्मीर को कुदरत का नायाब तोहफा भी कह सकते हैं ।यहाँ के झरने, घाटियाँ व पहाड़ियां सभी मेरे अंदर निरंतर ऊर्जा का समावेश कर रहे हैं। अगली बार मैं यहाँ अपनी पत्नी को घुमाने जरूर लाऊंगा, ये एक ख़ूबसूरत टूरिस्ट डेस्टिनेशन है। ऊँचे- ऊँचे देवदार के वृक्षों के बीच से झाँकते हुए झरने मधुर- मधुर संगीत लिए सच में मुझे बहुत लुभाते हैं। अब शायद हमारी मंज़िल क़रीब है। बस की गति कुछ धीमी हो रही है। मैं क़लम को अभी यहाँ विराम देता हूँ। सामने से गाड़ी आ रही है ।
वंदे मातरम् 14 फरवरी
( और तभी हमलावरों ने विस्फोटक भरी कार से सीआरपीएफ काफिले की बस को टक्कर मार दी। धमाका इतना भयंकर था कि बस के परखच्चे उड़ गए ।इसके बाद भी आतंकियों को चैन न मिला ।उन्होंने जमकर अंधाधुंध फायरिंग भी की।)
