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vijay laxmi Bhatt Sharma

Others


3.5  

vijay laxmi Bhatt Sharma

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डायरी १४वाँ दिन

डायरी १४वाँ दिन

3 mins 273 3 mins 273

प्रिय डायरी लॉक्डाउन का १४वाँ दिन है, और ये वैश्विक महामारी कारोना एक भयंकर रूप ले चुकी हैहर तरफ़ हाहाकार मचा है, कल क्या होगा इस आशंका मे जी रहा है सारा विश्वहर कोई लगा है की जल्दी इस महामारी की दवा बने तो राहत की साँस लें विश्व भर मे अर्थव्यवस्था चरमरा गई है, कोई भी शुभ संकेत नहीं मिल रहेघर में रहना ही एकमात्र हल है परन्तु कब तक, हज़ारों ऐसे लोग हैं जिनके घर का चूल्हा रोज कमाने से ही जलता है, उनके लिए तो रोज कुआँ खोद कर पानी निकालने जैसी स्थिति होती है फिर वो कैसे इतने दिन अपने आप को सम्भाल पाएँगे चिंता का विषय है बच्चों की पढ़ाई, उनके पेपर, उनके भविष्य का सवाल है... क्या हम इस स्थिति से उभर पाएँगे और इस नुक़सान की भरपाई कर पाएँगे ये तमाम सवाल हैं जिनका कोई जवाब नहींआने वाला कल क्या क्या चुनौतियाँ लाएगा किसी को नहीं पता... आज भी चुनौतियों से कम नहीं, बहुत से काम चाह के भी नहीं कर पा रहे हमकहीं कहीं पर तो लोग मानसिक रुग्ण हो रहे हैं अन्दर रह रहकर, कई ऐसे भी हैं जो ये सदमा बरदास्त नहीं कर पा रहे की वो भी इस महामारी की चपेट मे आ गए हैं और खुदखुशी का आसान रास्ता अपना रहे हैं

प्रिय डायरी हालत अच्छे नहीं और मन को विचलित करने वाले हैंपता नहीं कब परिस्थियाँ बदलेंगी और हम सामान्य जीवन जी सकेंगेऐसे मे भी जब कुछ लोग थोड़ा सा राशन दे अपनी फोटो पोस्ट कर रहे हैं तब ज़्यादा ग्लानि हो रही है कितनी बार कहा वो हालत के मारे हैं भिखारी नहीं फिर भी पता नहीं लोगों को क्या खुशी मिलती है ये सब दिखा कर मिलकर खाने से ही संतोष मिल जाता है फिर ये दिखावा क्यूँ, क्या ये सब हम आत्म संतुष्टि के लिए कर रहे हैं या फिर दिखावा करने के लिए मैं अभी तक इन लोगों को समझ नहीं पाई हूँ और इनके दान को मैं दान ना कहकर दिखावा कहूँगी प्रिय डायरी ये दुनिया ही दिखावा हो गई है, हर इनसान मुखौटे पहन घूम रहा है सुख दुःख से कुछ लेना देना नहीं सिर्फ चर्चा में रहना चाहते हैं प्रिय डायरी आज का दिन मंथन में ही निकल गया की हम इस मुसीबत के समय मे भी कैसे स्वार्थी हो सकते हैं, जरा सी प्रसिद्धि के लिए किसी के स्वाभिमान को दाँव पर लगा देते हैं... ईश्वर से प्रार्थना है सबको एक समान बनाए ताकि सबके पास खाने को दो जून की रोटी ज़रूर हो और हर इंसान स्वाभिमान से जी सके। प्रिय डायरी आज इतना ही ... बेहतर कल की उम्मीद पर इन पंक्तियों के साथ विदा लेती हूँ....

सबको मिले समानता का अधिकार

सबका रहे जीवित पूर्ण स्वाभिमान।


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