Rajesh Chandrani Madanlal Jain

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Rajesh Chandrani Madanlal Jain

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बेटे का विवाह …

बेटे का विवाह …

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किशनचंद्र, अपनी पत्नी प्रेमा से रोज रात, अपने 35 वर्षीय अविवाहित बेटे कनक की शादी न हो पाने के कारण दुःख जताया करता था। 

वह, अक्सर कहा करता - 

प्रेमा, मुझे नहीं लगता कि हम जीते जी, अपने बेटे की गृहस्थी बसते देख पाएंगे।

इकलौता पुत्र कनक, इनके अति लाड़-दुलार में पालन-पोषण के कारण उद्दंड प्रवृत्ति का हो जाने से, पढ़ लिख कर विशेष उपलब्धि प्राप्त नहीं कर सका था। कनक को ऐज बार होने के पूर्व जैसे तैसे, प्राथमिक शाला में शिक्षक की नौकरी मिल पाई थी। 

नौकरी मिलते तक ही कनक की उम्र, 30 हो गई थी। अतः कनक को, पहले नौकरी नहीं होने के कारण, रिश्ते नहीं मिल पाते थे। फिर कनक के लिए, उसकी उम्र बढ़ते जाने से यदा कदा ही रिश्ते आते थे। वे रिश्ते, कनक सहित किशनचंद्र एवं प्रेमा को जमते नहीं थे। ऐसे में अब कनक 35 का हो गया था। 

आज किशनचंद्र ने अपनी यही व्यथा, दोहराते हुए प्रेमा से कहा - 

प्रेमा, हम दोनों 60 के ऊपर हो गए। ना तो हमारे जीवन का भरोसा बचा है और ना ही अब यह भरोसा होता है कि कनक का विवाह हो सकेगा। 

प्रेमा ऐसे समय में अब तक, जिस बात को कहने से स्वयं को रोक लिया करती थी, उसे कहने से वह आज अपने को नहीं रोक पाई थी। प्रेमा ने पति पर दोष लगाते हुए कह दिया - 

सुनो जी, आपने, कनक के बाद, मेरे गर्भ में आई, एक के बाद एक, तीन बेटियों को परीक्षण के बाद, जबरन गर्भपात कराकर मार दिया था। जिसके बाद मेरे भीतर आ गई खराबी से, आपके चाहा गया, दूसरा पुत्र नहीं हो सका। तीन बेटियों की ऐसी हत्या का पाप, हमारे कारण, कनक को भुगतना पड़ रहा है। 

किशनचंद्र और समय होता तो खुद को, ऐसे आरोपित किये जाने पर प्रेमा की, खूब खबर लेता मगर वृद्धावस्था के कारण ठंडे पड़ गए तेवर ने, उसे सोचने को विवश किया। प्रेमा की बात से वह पश्चाताप में भर गया। फिर कुछ क्षण सोचने के बाद यही कह सका - 

प्रेमा, तुम सच कहती हो। मेरी तरह और भी कई घरों के किशनचंद्रों ने अपनी बेटियों के भ्रूणों की हत्या करवाई हैं। इससे लड़कियों की कमी होने के कारण आज, हमारे कनक के विवाह के लिए लड़की नहीं मिलती है। मुझे समझ नहीं आता कि हम, अपनी इन भूल का प्रायश्चित कैसे करें?

इस बात पर प्रेमा चुप रही थी। फिर किशनचंद्र रौशनी बंद करने के बाद सोने की कोशिश कर रहा था तब उसकी आँखों में अविरल आँसू बह रहे थे। जिन्हें अंधेरा होने से प्रेमा देख तो नहीं पाई थी मगर अनुभव कर रही थी। 

अब प्रेमा मन ही मन खेद कर रही थी कि व्यर्थ ही उसने, पति के पाप को उघाड़कर, उन्हें अनुभव करा दिया था। तीर तो मगर चल चुका था, पति के दुःख कम करने में अब वह निरुपाय थी। 

इसके 15 दिन बाद कनक, प्रेमा से बोला - 

माँ, हमारे स्कूल में, नई शिक्षिका, तनया आई है। कल रविवार है, मैंने उसे अपने घर पर, दोपहर के भोजन का न्योता दिया है। 

प्रेमा ने पूछा - बेटा, तनया अकेली आएगी?

कनक ने बताया - वह और उसकी माँ आएगी। 

प्रेमा ने मन ही मन खुश होते हुए कहा - 

बेटा, तू सब्जी-भाजी और मावा ले आ, मैं उनको अच्छा भोजन खिलाऊंगी। 

फिर कनक ने, माँ से समझा था और बताई गई सामग्री लाने के लिए बाज़ार चला गया था। 

उस रात खुश होकर प्रेमा ने यह बात, पति को बताई। किशनचंद्र भी आशय को समझकर खुश हुआ। दोनों की रात मन के लड्डू खाते हुए, घर में बहू के आगमन की आशा से कटी थी। 

अगले दिन सुबह से ही रसोई में प्रेमा के साथ, सहायता के लिए किशनचंद्र भी लगा था। 11 बजे कनक, तनया और उसकी माँ को लेकर घर आया तो, तीव्र धड़कते हृदय सहित प्रेमा ने दरवाजा खोला था। 

दरवाजे पर ही, प्रेमा का रात संजोया सपना बिखर गया था। सामने खड़ी तनया, सुंदर तो थी मगर तनया और उसकी माँ की गोद में लगभग 1-1 साल की दो अबोध बेटियां थी। 

प्रेमा ने बुझे मन से मगर प्रकट में खुश दिखते हुए, उनका स्वागत किया था। भोजन के दरमियान हुई बातों से उन्हें, पता चला कि तनया का पूर्व पति गबन के आरोप में सजा काट रहा है। 

जेल जाने के पूर्व ही अपने अपराध एवं दो जुड़वाँ बेटी के पैदा होने की कुंठा में वह (पूर्व पति) हिंसक हो गया था। तब गृह हिंसा के आधार पर तनया ने उससे डिवोर्स लिया था। 

बाद में तनया ने शिक्षिका का जॉब शुरू किया है। तनया की बेटियां छोटी होने से, उसकी माँ यहाँ साथ आई हैं जबकि तनया के पापा, उसके भाई के परिवार के साथ अन्य शहर में रहते हैं। 

भोजन के उपरांत तनया की माँ ने चिंता से कहा -

समझ नहीं आता बहनजी, दो बेटियों के साथ तनया के भविष्य के लिए कैसे खुशहाली सुनिश्चित हो?

तसल्ली देते हुए प्रेमा कहा - भगवान जरूर कुछ करेंगे, बहनजी। 

फिर वे चलीं गईं थीं। तनया और उसकी माँ के जाने के बाद कनक ने, दोनों से कहा - 

माँ, बाबूजी, मैं और तनया शादी करना चाहते हैं। 

यह सुन प्रेमा सोच में डूब गई थी तब उसने पति को, कनक से कहते हुए सुना - ठीक है, बेटा हमें भी तनया पसंद आई है। 

उस रात प्रेमा ने, किशनचंद्र से एतराज से कहा - आपने, दो बच्चों की माँ के साथ, कनक का रिश्ता कैसे मंजूर कर लिया? 

किशनचंद्र ने उत्तर दिया - 

प्रेमा यह ईश्वर का न्याय है। उसने, हमारे द्वारा की गई तीन बेटियों (भ्रूण) की हत्या के, प्रायश्चित के लिए तनया को, हमारे कनक के जीवन में भेजा है। तुम तनया को हमारी बड़ी बेटी की जगह एवं उसकी जुड़वाँ बेटियों को हमारी दो छोटी बेटियों के रूप में देखो तो, तुम्हें भी इस रिश्ते में कोई एतराज दिखाई नहीं देगा। 

पहले कुछ क्षण के लिए प्रेमा सोच में पड़ गई। फिर आत्मविश्वास से दृढ़ स्वर में बोली - 

हां, आप ठीक कहते हो। तनया के आने के बाद, मुझे भगवान के घर जाने में डर नहीं लगेगा। ऐसे प्रायश्चित से, भगवान, हमारी खोटी करनी को अवश्य क्षमा कर देंगे।  



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