बालिका मेधा 1.38
बालिका मेधा 1.38
हमारी ग्रीष्मकालीन अवकाश चल रहे थे। पीयूष और मैं क्लास 12 में आ गए थे। इसके बाद ही हमें अच्छे कॉलेज के लिए प्रवेश परीक्षाएं भी देनी थी। अतः हम अभी अवकाश में भी कोचिंग क्लास जा रहे थे। अगले दिन कोचिंग के बाद पीयूष मेरे साथ, मेरे घर आ गई थी। पीयूष को मुझसे अपनी मम्मी (पवित्रा आंटी) के विवाह को लेकर विचार विमर्श करना था। मैंने दो गिलासों में फ्रिज में बनी रखी लस्सी निकाली थी। जब हम लस्सी पीने लगे तब पीयूष ने कहा -
"मेधा, तुम्हें याद है एक बार आंटी ने हमें बताया था कि “प्राणियों में पेट की भूख जैसे ही एक शारीरिक भूख भी होती है। शारीरिक भूख, स्त्री-पुरुष के मिलन से मिटती है”।
मैंने कहा - "हाँ, मुझे याद है। यह बात उन्होंने शायद शबनम के प्रसंग में कही थी।"
पीयूष ने कहा - "तब तो तुम्हें यह भी याद होगा कि उनकी इस बात पर मैंने तुमसे पूछा था “अगर यह आवश्यकता है तो मेरी मम्मी बिना इसके कैसे रहतीं होंगीं”?
मैंने कहा - "हाँ, बल्कि यह भी मुझे याद है कि मम्मा ने आगे यह बताया था “इसकी जितनी आदत बनाओ उतना ही जरूरी होता है। जो इसकी अधिक की आदत डाल लेते हैं वह ज्यादा बार समागम करते हुए तृप्त/अतृप्त रहते हैं”।
पीयूष ने कहा - "एक्जैक्टली, मेरी मम्मा को चूँकि इसकी अतृप्ति नहीं है और इसी कारण यह समस्या है कि उन्हें फिर विवाह के लिए कैसे मनाया जाए।"
मैंने कहा - "हाँ, मुझे आंटी की कही बात का स्मरण है। आंटी ने तुमसे कहा था, “मैं तुम्हारे पापा की विशेष जगह पर, किसी और को नहीं देख सकती हूँ। दादी और तुम्हें, मैं अपने से दूर नहीं कर सकती हूँ। कोई ऐसा हो जो तुम दोनों को भी मेरे साथ स्वीकार करे, तब भी नहीं। क्योंकि मैं किसी की ऐसी पत्नी बन ही नहीं सकती, जैसे तुम्हारे पापा की रही थी। अगर ऐसा होते हुए, मैं किसी से पुनर्विवाह करूँ तो यह उसके साथ मेरा अन्याय होगा”।
पीयूष ने कहा -" हाँ मेधा, जब वे पुनर्विवाह के प्रश्न पर ऐसा सोचतीं हैं तब मुझे संदेह है कि कर्नल पीयूष को अच्छा मानते होने पर भी, वे उन पर इस प्रकार से (अ)न्याय करेंगी। अर्थात वे विवाह के लिए राजी नहीं होंगी। जबकि मैं, मम्मी एवं कर्नल दोनों के लिए इसे सर्वथा उचित मान रही हूँ। मुझे समझ नहीं आ रहा है की मम्मी को उनसे विवाह करने के लिए कैसे राजी किया जाए।"
मैंने कहा - "मेरी मम्मा, ऑफिस से बस आने ही वाली होंगी। मुझे लगता है उनसे इस हेतु मार्गदर्शन लेना ठीक रहेगा। वे अवश्य इसका कुछ न कुछ मार्ग बताएंगी। "
पीयूष ने कहा - "हाँ हम उनकी प्रतीक्षा कर लेते हैं।"
मम्मा ऑफिस से आईं तो पीयूष को देख खुश हुईं थीं। वॉशरूम एवं चेंज करने के बाद जब वे लिविंग रूम में सोफे पर आईं तब मैंने उन्हें लस्सी का गिलास दिया था। जब वे लस्सी पी रहीं थीं तब आज हमारी हुई चर्चा, पीयूष ने उनसे कह सुनाई थी। अंत में उसने मम्मा से पूछा - "आंटी, हम सभी चाहते हैं कि मेरी मम्मी, (रि.) कर्नल पीयूष से विवाह करें। हम कैसे उन्हें इस निर्णय पर पहुँचने में उनकी सहायता करें? जबकि उन्होंने पुनर्विवाह नहीं करने का निश्चय कर रखा है।"
मम्मा ने कुछ पल विचार किया फिर कहा - "पीयूष, आपके पापा ने और (अब रिटायर्ड) कर्नल पीयूष जी ने साथ ही कारगिल युद्ध, शूरवीरता से लड़ा था। पवित्रा जी ने अमृत जी के बलिदान से, असमय ही अपना पति एवं तुमने अपने पापा को खो दिया है। मैं सोचती हूँ, इस महान बलिदान के बदले में कर्नल सहित आप तीनों को, इस देश - समाज से, अपने लिए कुछ अच्छा मिलना ही चाहिए। किसी समय कर्नल पीयूष, अपनी चाहत (प्रेमिका) को पत्नी नहीं बना पाए थे। इसके बाद वे अविवाहित ही रह गए थे। अब जब वे पवित्रा जी को अपनी पत्नी देखना चाहते हैं तब उनकी यह इच्छा अधूरी रह जाना कदापि अच्छी बात नहीं होगी।"
पीयूष ने कहा - "जी, यही नहीं वे मेरी मम्मी से विवाह करते हुए, मुझे भी अपनी बेटी के रूप में अपनाना चाहते हैं। अर्थात मेरी मम्मी को उनकी जिम्मेदारी सहित पत्नी का पद देना चाहते हैं। उनकी यह इच्छा अधूरी रहना, उन पर अन्याय होगा और अनायास ही (अब) ऐसे अन्याय का कारण मेरी मम्मी नहीं होनी चाहिए।"
मम्मी ने कहा - "इस प्रस्ताव में गौर करने वाली बात यह भी है कि पीयूष जी, कर्नल पद से सेवानिवृत हैं और आज कोल्ड स्टोरेज के मालिक भी हैं। वे चाहें तो अपनी से कई वर्ष छोटी और कुँवारी, किसी लड़की को भी पत्नी के रूप में पा सकते हैं। ऐसा होने पर भी वे एक सैनिक विधवा, पवित्रा जी के पति होने की कामना कर रहे हैं। राष्ट्र रक्षा का कर्तव्य निभाने के बाद, अब वे समाज दायित्व का भी एक उत्कृष्ट उदाहरण देना चाहते हैं। ऐसे सज्जन पुरुष की यह शुभ भावना अवश्य ही साकार होनी चाहिए।"
मैं कर्नल पीयूष के आदर्श आचरण को मम्मा की दृष्टि से देख पा रही थी। तब पीयूष ने कहा - "जी आंटी आप सही कह रहीं हैं। मेरी मम्मी एवं पीयूष सर, अभी जो है निश्चित ही उससे अधिक पाने के अधिकारी हैं। कोई साधारण व्यक्ति, विवाह भी अपनी कामनाओं को प्रमुख रखकर करता है। पीयूष सर किसी ऐसे व्यक्ति से सर्वथा अलग हैं। वे अपने से अधिक इस बात को महत्व दे रहे हैं कि एक बलिदानी (मेरे पापा) की छूट गईं जिम्मेदारियाँ, मेरी मम्मी एवं मेरी कैसे सहायता करें।"
मम्मा ने कहा - "हाँ, पीयूष यही वह कारण है जिससे हमने, पवित्रा जी के पूर्व निश्चय के जानकार होने पर भी, इस प्रस्ताव के बारे में उनसे कहा और विचार का अनुरोध किया है। दादी के जाने के बाद उन्हें उनकी कमी लग रही है। तुम सोचो कि जब तुम्हें पढ़ने बाहर जाना पड़ेगा तब वे कितनी अकेली अनुभव करेंगी।"
पीयूष ने कहा - "आंटी, आपके इस चर्चा में दिखाए पक्ष ही, मेरी मम्मी के लिए सही निर्णय लेने हेतु सही तर्क हैं। मैं आज उनसे यही सब कहूँगी।"
मम्मा ने कहा - "शुभ काम जितना शीघ्र संभव हो उतनी जल्दी किया जाना अच्छा होता है। पवित्रा जी इसे सहमत करें एवं शीघ्र विवाह करें यही अच्छा होगा।"
फिर पीयूष चली गई थी। उसी रात उसने आंटी से बात की थी। आंटी ने अपने विवाह से, अपनी बेटी की खुश देखकर, कर्नल पीयूष से विवाह की बात, स्वीकृत कर ली थी।
चार दिन बाद के अवकाश में मम्मा, पापा एवं मैं, फिर पवित्रा आंटी से मिलने गए थे।
तब आंटी ने पापा को बताया - मेरे मायके पक्ष में कोई अति निकट संबंधी कोई नहीं है। मैंने इस बारे में अपनी तीनों ननद से अनुमति माँगी है। उनमें दो ने विरोध नहीं किया है जबकि एक सहमत नहीं हैं।
मम्मा ने कहा - "यह पुराने समाज चलन के कारण है। कठिनाई यह है कि जिन्होंने अपने पति को खोया नहीं होता है, वे किसी खो देने वाली पत्नी की मुसीबत को अनुभव नहीं कर पाती हैं। आप अभी इसे अनदेखा कीजिए। आपके विवाह करने के बाद वे भी निश्चित ही आपको नए रूप में देख कर खुश हो जाएंगी।"
संकोच सहित आंटी ने इसे स्वीकार किया था। तब उसी समय, पापा ने कर्नल पीयूष को यह शुभ समाचार दिया था। कर्नल ने पापा से, पवित्रा आंटी एवं पीयूष से बात कराने के लिए कहा था।
(क्रमशः)
