बालिका मेधा 1.26
बालिका मेधा 1.26
पापा अपने लैपटॉप पर ऑफिस का काम करने चले गए थे। दादी, आंटी एवं मम्मी अब भी बात कर रहीं थीं। पीयूष को मैं अपने कमरे में ले गई थी, हमने 20 मिनट कक्षा 10 के पाठ्यक्रम के बारे में बातें की थीं। तब मम्मा ने हमें आवाज दी थी। दादी और आंटी जाने के लिए तैयार दिखीं थीं।
दरवाजे पर विदा करने के समय पापा भी आ गए थे। सब ने आपस में हाथ जोड़कर अभिवादन किया था। पीयूष, अपनी दादी और मम्मी के साथ चली गई थी।
रविवार को अगर विशेष काम न हो तो मम्मा दोपहर में कुछ देर सोना पसंद करती हैं। आज तो वैसे भी अतिथियों के सत्कार के लिए उन्होंने अधिक काम किया था। अतः उनके जाने के बाद वे सोने के लिए अपने शयनकक्ष में जा रहीं थीं। तब मैं भी उनके साथ हो ली।
मम्मा ने बिस्तर पर लेटे हुए मुझे अपने से लगा लिया था। शायद मम्मा पहले और मैं कुछ मिनट बाद सो गई थी। जब मैं उठी तो बिस्तर पर अकेली थी। लेटे हुए ही अंगड़ाई ले रही थी तब मम्मी आईं थीं। उन्होंने कहा मेधा "बहुत सो लिया अब उठो। मैंने तो पापा के साथ चाय भी पी ली, तुम बिस्तर ही नहीं छोड़ पाईं। तुम्हारे लिए क्या बना दूँ?
मैंने मम्मा का हाथ पकड़कर अपनी ओर खींचा और उन्हें बिस्तर पर बैठा कर उनकी गोदी में अपना सिर रख लिया फिर कहा "मम्मा, मुझे अभी कुछ नहीं चाहिए, आपसे बातें करना चाहती हूँ।
मम्मा ने मुझे प्यार से देखा, साइड टेबल पर जल भरा गिलास उठाकर, मुझे दिया मैंने अधलेटे होकर पिया था। फिर खाली गिलास साइड टेबल पर रखते हुए कहा -
मम्मी, मैथ्स टीचर के साथ वाले प्रकरण में जब सब लड़कियाँ, पीयूष से दूर हो रहीं थीं तब मुझे आपने उससे दोस्ती बढ़ाने की कहकर बहुत अच्छा काम किया था।
मम्मी ने कहा "मुझे तुम पर विश्वास था और है।
मैंने कहा "हम नहीं जानते थे, पीयूष अपने वीर पापा की लाड़ली बेटी है। उसके अब पापा नहीं हैं। ऐसी एक बेटी की हमने अनायास ही अच्छे समय चिंता की है।
मम्मा ने कहा "हाँ मेधा, पीयूष और तुम जब तुम्हारे कमरे में चलीं गईं तब पवित्रा जी ने और भी बातें बताईं थीं।"
मैंने कहा "मम्मी, मुझे सब बताओ।"
मम्मा ने बताया "अमृतपाल जी ने पीयूष को छावनी के सुरक्षित वातावरण में आधुनिक विचारों के साथ बड़ा करते हुए पाला पोसा था। पीयूष अपने पापा को सबसे अधिक प्यार करती थी। जब अमृतपाल नहीं रहे तब वह 12 से कुछ छोटी थी। वह सदमे में चली गई थी। उसे अवसाद से बाहर निकालने के लिए, दादी और पवित्रा जी ने, उसकी हर सही बुरी इच्छा मानना आरंभ किया था। कुछ महीनों में पीयूष सदमे एवं अवसाद से तो निकली मगर ऐसी हो गई कि घर में बच रह गईं दोनों स्त्रियों के नियंत्रण में नहीं रहती थी। तब दादी और पवित्रा जी यही मनातीं थीं कि भगवान उसे सद्बुद्धि प्रदान करे। "
मम्मा चुप हुई तो मैंने कहा "शुरू में जब मेरे क्लास में आई तब पीयूष कुछ इसी प्रकार की थी।"
मम्मा ने मेरे सिर पर चूमने के बाद कहा "पवित्रा जी ने आगे बताया कि फिर पिछले लगभग छह माह में पीयूष में अच्छे परिवर्तन आना शुरू हुए। पीयूष का इस बार का परीक्षा परिणाम भी बहुत अच्छा आया है। पवित्रा जी ने पीयूष से कहा, पियुषी तुमने इस बार बहुत अच्छा किया है। तो पता है मेधा, पीयूष ने उन्हें क्या कहा?"
मैंने कहा "जी मम्मा बताइये।"
मम्मी ने बताया "पीयूष ने कहा, ‘मुझमें यह चमत्कारी परिवर्तन मेरी नई बनी फ्रेंड, मेधा के कारण आया है’।"
मैंने कहा "मम्मा मगर पीयूष ने मुझसे ऐसा कभी कुछ नहीं कहा है। हाँ यह अवश्य है कि अब उसे, मेरा साथ नहीं होना, अच्छा नहीं लगता है।"
मम्मा ने कहा "यह तो पीयूष में और भी अच्छा गुण है। हमारे मुँह पर तो सच्ची-झूठी प्रशंसा करने वाले कई मिलते हैं। किंतु सच्ची प्रशंसा वह होती है जो हमारे सामने (ही) नहीं, पीठ पीछे (भी) की जाती है।"
अब पापा, हम दोनों को तलाशते हुए आ गए। पापा ने कहा "मेरी प्रियाओं, पत्नी और बेटी में क्या चल रहा है।
मैंने कहा "पापा, हम दोनों आपकी बुराई कर रहे हैं।"
पापा ने हँसकर कहा "मुझमें जब बुरा होने जैसा कुछ है ही नहीं तो तुम दोनों को ऐसा क्या मिल गया।"
मम्मी और मैं पहले हँसी। फिर मम्मी ने सच बताया "हम दोनों पवित्रा जी एवं पीयूष की बात कर रहे थे।
सुनकर पापा गंभीर हुए। उन्होंने कहा - मैंने माँ एवं पवित्रा जी से जैसा कहा कि ‘अब से मैं एक नहीं दो बेटी का पापा हूँ’ वह पूरी सच्चाई से कहा है। मेरे इस सच को निभाने में आप दोनों माध्यम रहेंगे।
मम्मा ने पूछा "आप जो कह रहे हैं, उसे अधिक स्पष्ट करते हुए कहिए ताकि हमें सही समझ आ सके।"
पापा ने कहा "पवित्रा जी, हमारे राष्ट्र रक्षा के लिए बलिदानी हुए वीर अमृतपाल की पत्नी हैं। जो 3 वर्ष से अधिक होने पर भी दूसरा विवाह नहीं कर रहीं हैं। अभी उनके साथ माँ जी हैं। किसी दिन वे भी नहीं रहेंगी। यह समाज अकेली रहती माँ एवं युवा हो रही बेटी के लिए कई बार कठिनाई उत्पन्न करता है। इसलिए बलिदानी अमृतपाल के प्रति कृतज्ञता अनुभव करते हुए, मैं उनकी बेटी के लिए वह करना चाहता हूँ जो अमृतपाल जीवित रहते तो करते।"
मैंने कहा "पापा आपकी भावनाएं कितनी निर्मल हैं। मम्मा और मैं आपके लिए इस दायित्व में कैसे सहायक हो सकते हैं?"
पापा ने मम्मा को देखते हुए कहा "मैंने उन्हें बहन जी कहा है। ऐसे मुँह बोले बहन-भाई में भी गलत कुछ हो जाता है। समाज इसलिए इसे भी शंका से देखता है। मैं पवित्रा जी की पवित्रता पर ऐसे किसी संदेह का कारण नहीं बनते हुए, उस परिवार की सहायता करना चाहता हूँ। मैं बिरले ही अवसर पर उनसे भेंट करते हुए उनकी आवश्यकताओं को तुम दोनों के माध्यम से समझ कर, पीयूष का मेधा के जैसा पापा होना चाहता हूँ।"
पापा को हम दोनों ने स्नेह और आदर से देखा। मम्मा ने कहा "जी हमें आपकी यह बात स्मरण रहेगी। हम कोई कमी नहीं रहने देंगे।
(क्रमशः)
