Deepak Kaushik

Others


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अवसान के पल

अवसान के पल

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रजनीश बाबू ने अपनी धुँधला चली आँखों को जोर से भींचा। दो-तीन बार पलकें भी झपकायीं और आँखें फाड़ कर देखने की कोशिश की। मगर उन्हें कुछ भी स्पष्ट दिखाई नहीं दिया। दिखाई दिया कुछ अंधेरा। और कुछ साये। पता नहीं अपने थे या पराये। बलात् देखने की कोशिश करने के कारण उनकी पलकें भारी होने लगीं। उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं। बंद आँखों से उन्हें दिखाई दिया अपना जन्म। अपनी मूर्छित पड़ी माता। स्वयं का पालने में पड़े रोना चिल्लाना। चिकित्सालय के कक्ष में माता की देखभाल करती नर्स। डाक्टरों की आवाजाही। कक्ष के बाहर रोगियों और उनके परिजनों की भीड़। कुछ समय बाद माता की तंद्रा टूटने पर उनका ममता भरी आँखों से उन्हें निहारना। माता द्वारा प्रथम स्तनपान। सब कुछ देखा रजनीश बाबू ने। समय बदला। रजनीश बाबू पांच वर्ष की अवस्था में पहुंच गए। गाँव की अपनी विशाल पुश्तैनी हवेली में अपने नन्हे-नन्हे पाँव से दौड़ते-भागते, शरारतें करते रजनीश बाबू। हवेली के दास-दासियों के झुंड का उनकी परिचर्या में रत् रहना। घर के बड़ों का संरक्षण।


रजनीश बाबू ने पुनः अपनी आँखें खोली। इस बार अंधेरा और भी गाढ़ा था। पहले दिख रहे साये अंधेरे में घुल-मिल गए थे। रजनीश बाबू ने पुनः अपनी आँखें बंद कर लीं।


किशोरवय के रजनीश बाबू अपनी मित्र मंडली के साथ गाँव की सीमाओं से बाहर निकल कर शहर में अध्ययन करने आ गये थे। रजनीश बाबू मेधावी छात्र थे। अध्ययन के अतिरिक्त तमाम तरह की सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लिया करते थे। विद्यालय के शिक्षार्थियों से लेकर शिक्षकों तक में समान रूप से लोकप्रिय थे। क्रमशः विद्या के सोपानों को पार करते स्नातक की परीक्षा से पूर्व ही घर वालों ने एक सुंदर-सुशील कन्या से उनका विवाह कर दिया। परास्नातक की पढ़ाई पूरी करने के पश्चात रजनीश बाबू ने आगे की पढ़ाई नहीं की। चाहते तो अच्छी नौकरी पा सकते थे। देश ब्रिटिश शासन के अधीन था। उस समय परास्नातक की पढ़ाई बहुत मायने रखती थी। आसानी से शासन तंत्र का हिस्सा बन सकते थे। परंतु रजनीश बाबू ने नौकरी करने के बजाय अपनी जमींदारी का काम देखना शुरू किया। अपनी देखरेख में जमींदारी को आगे बढ़ाया। रजनीश बाबू के परिवार में धार्मिक वातावरण था। लोग सज्जन प्रकृति के थे। परिवार के वातावरण का प्रभाव रजनीश बाबू पर भी पूरा पूरा था। धर्म में आस्था और प्रजाजनों के संरक्षण की अपनी विरासत को रजनीश बाबू ने आगे बढ़ाया। चालीस की वय तक आते-आते रजनीश बाबू पांच संतानों के पिता बन चुके थे। प्रथम- पुत्र अमरनाथ। द्वितीय- कन्या शांति देवी। तृतीय- पुन: पुत्र ह्रदय नारायण। चतुर्थ- पुन: कन्या उमावती। पंचम- पुनः पुत्र ओंकार प्रसाद। इन पांच के पश्चात उनकी अन्य संतान नहीं हुई। इस प्रकार उनके अपने तीन पुत्र और दो कन्याएं। अपने दो अन्य भाइयों की सात संतानें। कुल मिलाकर बारह बच्चों के भरे-पूरे परिवार के मुखिया थे रजनीश बाबू। इन बारहों में भी पर्वों के अवसर पर उनके अन्य दो भाइयों की आठ संतानों का योग और जुड़ जाता था, जो अन्य शहरों में जाकर अपने-अपने व्यवसाय में लगे थे।। तब तो हवेली में हर समय महाभारत का सा वातावरण बना रहता था। समय आने पर रजनीश बाबू ने अपनी और अपने भाइयों की संतानों का भी विवाह आदि किया। अपनी पांचों और अपने भाइयों की चार संतानों का विवाह निपटाने के बाद उन्होंने अपनी भार्या को भी कंधा दे दिया।


रजनीश बाबू ने पुनः अपनी आँखें खोली। इस बार अंधकार छंटना शुरू हो गया था। साये भी कहीं दिखाई नहीं दे रहे थे। मगर इस बार उन्हें कुछ चमकीले तारे से दिखाई दे रहे थे। झिलमिल करते तारे। जिनकी चमक क्रमशः बढ़ती जा रही थी। रजनीश बाबू ने पुनः अपनी आँखें बंद कर लीं।


रजनीश बाबू अपने उत्तरदायित्वों से मुक्त हो चुके थे। परिवार में एका था। इस बात का उन्हें संतोष था। उनके बाद उनकी सम्पत्ति को ले कर उनकी और उनके भाइयों की संतानों में कलह होगा इस बात की संभावना नहीं थी। फिर भी उन्होंने अपने जीते जी सम्पूर्ण सम्पत्ति का न्यायोचित रूप से बंटवारा कर दिया। जिसे उनकी संतानों, उनके भाइयों और भाइयों की संतानों ने बिना हिचक स्वीकार कर लिया। अपने भाइयों की चार अन्य संतानों का विवाह निपटाने तक उनका शरीर जर्जर हो चुका था। एक दिन हवेली की सीढ़ियों से उतरते समय उनका पैर फिसला और वे लाचार हो गये। परंतु वे किसी पर बोझ नहीं बने। पैर फिसलते ही उन्हें ह्रदयाघात हुआ और अब वे इस अवस्था में थे।


चमकीले हो चले सितारों ने देवदूतों का रूप ले लिया था। जो उन्हें अपने साथ ले जाने के लिए आये थे। सारे परिजन तिरोहित हो चुके थे। रजनीश बाबू भी देवदूतों के साथ जाने को तैयार थे। रजनीश बाबू हवा में उठ गये। अब उन्होंने अपने शरीर को देखा, जो आज तक उनका घर था। उन परिजनों को देखा जो कुछ समय पूर्व तक उनके सम्बन्धी थे। मगर अब नहीं। अब उनका इन सबों से कोई सरोकार नहीं था।



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